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विश्व शांति महायज्ञ और भव्य शोभायात्रा के साथ संपन्न हुआ श्री सिद्ध चक्र महामंडल विधान
भोपाल,(म.प्र.)
भोपाल में आठ दिवसीय धार्मिक आयोजन का समापन, मुनि संभव सागर ने दिया संयम, जीवदया और पर्यावरण संरक्षण का संदेश
राजधानी भोपाल में पिछले आठ दिनों से चल रहे श्री सिद्ध चक्र महामंडल विधान का रविवार को भव्य और आध्यात्मिक माहौल के बीच समापन हो गया। अंतिम दिन आयोजित विश्व शांति महायज्ञ और भगवान जिनेंद्र की विशाल शोभायात्रा ने पूरे क्षेत्र को भक्तिमय वातावरण से सराबोर कर दिया। सुबह से ही मंदिर परिसर और आयोजन स्थल पर श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ने लगी थी। धर्म, भक्ति और संयम की भावना से ओतप्रोत इस आयोजन में बड़ी संख्या में जैन समाज के लोगों के साथ अन्य श्रद्धालु भी शामिल हुए।
कार्यक्रम के समापन अवसर पर निकाली गई भगवान जिनेंद्र की भव्य शोभायात्रा आकर्षण का प्रमुख केंद्र रही। रजतमय पालकी में विराजमान भगवान जिनेंद्र के दर्शन के लिए श्रद्धालुओं में विशेष उत्साह दिखाई दिया। शोभायात्रा के आगे-आगे केसरिया ध्वज लहराते हुए श्रद्धालु चल रहे थे, जबकि पूरे मार्ग में जयकारों और धार्मिक उद्घोषों की गूंज सुनाई दे रही थी। शहर की सड़कों पर निकली इस शोभायात्रा ने लोगों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया। जगह-जगह श्रद्धालुओं ने भगवान के दर्शन कर श्रीफल अर्पित किए और अपने परिवार की सुख-समृद्धि तथा विश्व कल्याण की कामना की।
आयोजन के दौरान विश्व शांति महायज्ञ का भी आयोजन किया गया। धार्मिक मान्यता के अनुसार महायज्ञ के माध्यम से विश्व में शांति, सद्भाव और सकारात्मक ऊर्जा की कामना की गई। श्रद्धालुओं ने वैदिक और जैन परंपराओं के अनुरूप धार्मिक अनुष्ठानों में भाग लेकर समाज और राष्ट्र की खुशहाली के लिए प्रार्थना की। महायज्ञ के दौरान पूरे परिसर में आध्यात्मिक ऊर्जा और भक्ति का वातावरण देखने को मिला।
समाज प्रवक्ता अंशुल जैन ने बताया कि आठ दिनों तक चले इस धार्मिक आयोजन में प्रतिदिन अभिषेक, पूजन, जाप और विभिन्न धार्मिक अनुष्ठान संपन्न हुए। श्रद्धालुओं ने मंडल की परिक्रमा कर अपने जीवन में सुख, शांति और समृद्धि की कामना की। आयोजन के दौरान समाज के विभिन्न वर्गों की सक्रिय भागीदारी रही और बड़ी संख्या में परिवारों ने सामूहिक रूप से धार्मिक कार्यक्रमों में हिस्सा लिया।
इन आठ दिनों के दौरान कई श्रद्धालुओं ने व्रत और उपवास रखकर आत्मशुद्धि और आध्यात्मिक साधना का मार्ग अपनाया। श्रद्धालुओं ने सांसारिक सुख-सुविधाओं से दूरी बनाकर धर्म आराधना में समय बिताया। सुबह से लेकर देर शाम तक पूजा-अर्चना, प्रवचन और धार्मिक कार्यक्रमों का क्रम चलता रहा। आयोजकों के अनुसार युवाओं और बच्चों की भागीदारी भी इस बार उल्लेखनीय रही, जिससे धार्मिक संस्कारों के प्रति नई पीढ़ी की रुचि भी दिखाई दी।
कार्यक्रम के दौरान मुनि संभव सागर महाराज ने श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए संयम और सदाचार के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि संयम भारत की सबसे बड़ी आध्यात्मिक संपदा है और यही हमारी सांस्कृतिक पहचान भी है। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में भौतिकता और प्रतिस्पर्धा के बीच मनुष्य को अपने भीतर आत्मसंयम विकसित करने की आवश्यकता है। संयम केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जीवन के हर क्षेत्र में संतुलन और शांति प्रदान करता है।
मुनि श्री ने अपने उद्बोधन में पर्यावरण संरक्षण और जीवदया का संदेश भी दिया। उन्होंने कहा कि प्रकृति और जीवों के प्रति करुणा का भाव रखना प्रत्येक व्यक्ति का कर्तव्य है। यदि समाज पर्यावरण संरक्षण और जीवदया के सिद्धांतों को अपने जीवन में अपनाए, तो आने वाली पीढ़ियों को एक बेहतर और सुरक्षित वातावरण मिल सकता है। उनके संदेश को श्रद्धालुओं ने गंभीरता से सुना और उसे जीवन में अपनाने का संकल्प भी लिया।
धार्मिक अनुष्ठानों का संचालन अविनाश भैया के निर्देशन में संपन्न हुआ। कार्यक्रम के दौरान सो धर्म इंद्र, प्रियंका, महेंद्र, श्रीपाल, मेना सुंदरी, ऋषभ, मंजू, कुबेर, आशा और विजेंद्र सहित विभिन्न पात्रों ने मंडल पर अर्घ्य अर्पित किए। इस अवसर पर धार्मिक परंपराओं के अनुसार विशेष पूजन और विधान भी संपन्न हुए।
समापन समारोह के बाद श्रद्धालुओं ने एक-दूसरे को शुभकामनाएं दीं और आयोजन की सफलता पर प्रसन्नता व्यक्त की। कई श्रद्धालुओं का कहना था कि ऐसे धार्मिक आयोजन समाज में सकारात्मकता, एकता और आध्यात्मिक जागरूकता बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। रविवार को संपन्न हुआ यह आयोजन न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक बना, बल्कि समाज को संयम, सेवा, जीवदया और विश्व शांति का संदेश देकर एक सकारात्मक प्रेरणा भी छोड़ गया।
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विश्व शांति महायज्ञ और भव्य शोभायात्रा के साथ संपन्न हुआ श्री सिद्ध चक्र महामंडल विधान
भोपाल,(म.प्र.)
राजधानी भोपाल में पिछले आठ दिनों से चल रहे श्री सिद्ध चक्र महामंडल विधान का रविवार को भव्य और आध्यात्मिक माहौल के बीच समापन हो गया। अंतिम दिन आयोजित विश्व शांति महायज्ञ और भगवान जिनेंद्र की विशाल शोभायात्रा ने पूरे क्षेत्र को भक्तिमय वातावरण से सराबोर कर दिया। सुबह से ही मंदिर परिसर और आयोजन स्थल पर श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ने लगी थी। धर्म, भक्ति और संयम की भावना से ओतप्रोत इस आयोजन में बड़ी संख्या में जैन समाज के लोगों के साथ अन्य श्रद्धालु भी शामिल हुए।
कार्यक्रम के समापन अवसर पर निकाली गई भगवान जिनेंद्र की भव्य शोभायात्रा आकर्षण का प्रमुख केंद्र रही। रजतमय पालकी में विराजमान भगवान जिनेंद्र के दर्शन के लिए श्रद्धालुओं में विशेष उत्साह दिखाई दिया। शोभायात्रा के आगे-आगे केसरिया ध्वज लहराते हुए श्रद्धालु चल रहे थे, जबकि पूरे मार्ग में जयकारों और धार्मिक उद्घोषों की गूंज सुनाई दे रही थी। शहर की सड़कों पर निकली इस शोभायात्रा ने लोगों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया। जगह-जगह श्रद्धालुओं ने भगवान के दर्शन कर श्रीफल अर्पित किए और अपने परिवार की सुख-समृद्धि तथा विश्व कल्याण की कामना की।
आयोजन के दौरान विश्व शांति महायज्ञ का भी आयोजन किया गया। धार्मिक मान्यता के अनुसार महायज्ञ के माध्यम से विश्व में शांति, सद्भाव और सकारात्मक ऊर्जा की कामना की गई। श्रद्धालुओं ने वैदिक और जैन परंपराओं के अनुरूप धार्मिक अनुष्ठानों में भाग लेकर समाज और राष्ट्र की खुशहाली के लिए प्रार्थना की। महायज्ञ के दौरान पूरे परिसर में आध्यात्मिक ऊर्जा और भक्ति का वातावरण देखने को मिला।
समाज प्रवक्ता अंशुल जैन ने बताया कि आठ दिनों तक चले इस धार्मिक आयोजन में प्रतिदिन अभिषेक, पूजन, जाप और विभिन्न धार्मिक अनुष्ठान संपन्न हुए। श्रद्धालुओं ने मंडल की परिक्रमा कर अपने जीवन में सुख, शांति और समृद्धि की कामना की। आयोजन के दौरान समाज के विभिन्न वर्गों की सक्रिय भागीदारी रही और बड़ी संख्या में परिवारों ने सामूहिक रूप से धार्मिक कार्यक्रमों में हिस्सा लिया।
इन आठ दिनों के दौरान कई श्रद्धालुओं ने व्रत और उपवास रखकर आत्मशुद्धि और आध्यात्मिक साधना का मार्ग अपनाया। श्रद्धालुओं ने सांसारिक सुख-सुविधाओं से दूरी बनाकर धर्म आराधना में समय बिताया। सुबह से लेकर देर शाम तक पूजा-अर्चना, प्रवचन और धार्मिक कार्यक्रमों का क्रम चलता रहा। आयोजकों के अनुसार युवाओं और बच्चों की भागीदारी भी इस बार उल्लेखनीय रही, जिससे धार्मिक संस्कारों के प्रति नई पीढ़ी की रुचि भी दिखाई दी।
कार्यक्रम के दौरान मुनि संभव सागर महाराज ने श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए संयम और सदाचार के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि संयम भारत की सबसे बड़ी आध्यात्मिक संपदा है और यही हमारी सांस्कृतिक पहचान भी है। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में भौतिकता और प्रतिस्पर्धा के बीच मनुष्य को अपने भीतर आत्मसंयम विकसित करने की आवश्यकता है। संयम केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जीवन के हर क्षेत्र में संतुलन और शांति प्रदान करता है।
मुनि श्री ने अपने उद्बोधन में पर्यावरण संरक्षण और जीवदया का संदेश भी दिया। उन्होंने कहा कि प्रकृति और जीवों के प्रति करुणा का भाव रखना प्रत्येक व्यक्ति का कर्तव्य है। यदि समाज पर्यावरण संरक्षण और जीवदया के सिद्धांतों को अपने जीवन में अपनाए, तो आने वाली पीढ़ियों को एक बेहतर और सुरक्षित वातावरण मिल सकता है। उनके संदेश को श्रद्धालुओं ने गंभीरता से सुना और उसे जीवन में अपनाने का संकल्प भी लिया।
धार्मिक अनुष्ठानों का संचालन अविनाश भैया के निर्देशन में संपन्न हुआ। कार्यक्रम के दौरान सो धर्म इंद्र, प्रियंका, महेंद्र, श्रीपाल, मेना सुंदरी, ऋषभ, मंजू, कुबेर, आशा और विजेंद्र सहित विभिन्न पात्रों ने मंडल पर अर्घ्य अर्पित किए। इस अवसर पर धार्मिक परंपराओं के अनुसार विशेष पूजन और विधान भी संपन्न हुए।
समापन समारोह के बाद श्रद्धालुओं ने एक-दूसरे को शुभकामनाएं दीं और आयोजन की सफलता पर प्रसन्नता व्यक्त की। कई श्रद्धालुओं का कहना था कि ऐसे धार्मिक आयोजन समाज में सकारात्मकता, एकता और आध्यात्मिक जागरूकता बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। रविवार को संपन्न हुआ यह आयोजन न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक बना, बल्कि समाज को संयम, सेवा, जीवदया और विश्व शांति का संदेश देकर एक सकारात्मक प्रेरणा भी छोड़ गया।
