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अंबेडकर पोस्टर प्रकरण में एडवोकेट अनिल मिश्रा को जमानत, हाईकोर्ट ने तत्काल रिहाई के दिए आदेश
ग्वालियर (म.प्र.)
ग्वालियर हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी—अवैध हिरासत के संकेत, पुलिस कार्रवाई में प्रक्रियात्मक खामियां पाईं
डॉ. भीमराव अंबेडकर का पोस्टर जलाने के आरोप में गिरफ्तार किए गए एडवोकेट अनिल मिश्रा को मध्य प्रदेश हाईकोर्ट से बड़ी राहत मिली है। सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने उन्हें जमानत देते हुए तत्काल रिहा करने का आदेश जारी किया। अदालत ने स्पष्ट किया कि आरोपी को एक लाख रुपये के पर्सनल बॉन्ड और समान राशि की जमानत पर छोड़ा जाए। कोर्ट की इस टिप्पणी के बाद चार दिनों से जेल में बंद अनिल मिश्रा की रिहाई का रास्ता साफ हो गया।
यह मामला ग्वालियर से जुड़ा है, जहां सोशल मीडिया पर कथित रूप से अंबेडकर पोस्टर जलाने की घटना सामने आने के बाद साइबर थाना पुलिस ने कार्रवाई की थी। इस प्रकरण में अनिल मिश्रा समेत कुल आठ लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई थी। उनकी गिरफ्तारी के बाद उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया था।
हाईकोर्ट ने क्यों जताई आपत्ति
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पुलिस की कार्रवाई पर गंभीर सवाल उठाए। अदालत ने कहा कि एफआईआर में जिन तथ्यों का उल्लेख किया गया है, उनके आधार पर अनिल मिश्रा को नोटिस देकर पूछताछ की जा सकती थी। हिरासत में लेना अंतिम विकल्प होना चाहिए था, जबकि इस मामले में प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया। कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि गिरफ्तारी से पहले वैधानिक प्रावधानों की अनदेखी हुई, जो व्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़ा संवेदनशील विषय है।
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि प्रथम दृष्टया ऐसा प्रतीत होता है कि आरोपी को अवैध रूप से डिटेन किया गया। इसी आधार पर जमानत प्रदान की गई। हाईकोर्ट ने यह भी संकेत दिया कि निचली अदालत में अन्य सह-आरोपियों को भी राहत मिल सकती है, बशर्ते उनके मामलों में परिस्थितियां समान पाई जाती हों।
एफआईआर रद्द करने की मांग पर अलग सुनवाई
अनिल मिश्रा की ओर से अदालत में यह भी कहा गया कि दर्ज की गई एफआईआर ही कानूनन टिकाऊ नहीं है। इस पर हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि एफआईआर निरस्त करने की मांग को अलग प्रक्रिया के तहत सुना जाएगा। फिलहाल अदालत ने जमानत याचिका पर निर्णय देते हुए रिहाई के आदेश दिए।
पुलिस जांच जारी
ग्वालियर साइबर पुलिस का कहना है कि मामले की जांच जारी है और सोशल मीडिया गतिविधियों से जुड़े तकनीकी साक्ष्य जुटाए जा रहे हैं। पुलिस के अनुसार, प्रकरण में दर्ज सभी आरोपों की निष्पक्ष जांच की जाएगी। हालांकि हाईकोर्ट के आदेश के बाद पुलिस को अपनी कार्यप्रणाली को लेकर जवाबदेह स्थिति में आना पड़ा है।
कानूनी हलकों में चर्चा
इस फैसले के बाद ग्वालियर और प्रदेश के कानूनी हलकों में चर्चा तेज हो गई है। अधिवक्ताओं का कहना है कि यह आदेश व्यक्तिगत स्वतंत्रता और गिरफ्तारी की वैधानिक सीमाओं को रेखांकित करता है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह फैसला पुलिस को यह संदेश देता है कि संवेदनशील मामलों में भी कानून की प्रक्रिया से समझौता नहीं किया जा सकता।
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