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जोमैटो को पश्चिम बंगाल GST विभाग का ₹3.7 करोड़ का नोटिस, कानूनी चुनौती की तैयारी
बिजनेस न्यूज
वित्त वर्ष 2019-20 से जुड़ा मामला, टैक्स कमी को लेकर जारी हुआ डिमांड ऑर्डर
ऑनलाइन फूड डिलीवरी प्लेटफॉर्म जोमैटो की पेरेंट कंपनी इटरनल लिमिटेड को पश्चिम बंगाल के गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स (GST) विभाग से 3.7 करोड़ से अधिक का डिमांड नोटिस मिला है। यह नोटिस वित्त वर्ष 2019-20 में टैक्स भुगतान में कथित कमी को लेकर जारी किया गया है। कंपनी ने इस आदेश को चुनौती देने के संकेत दिए हैं और मामले को उच्च न्यायिक मंच पर ले जाने की तैयारी कर रही है।
कंपनी द्वारा शेयर बाजार को दी गई नियामकीय सूचना के अनुसार, यह आदेश राज्य कर विभाग के अतिरिक्त आयुक्त द्वारा पारित किया गया है। विभाग का दावा है कि संबंधित अवधि में कंपनी ने अपनी सेवाओं पर वसूले गए GST का पूरा भुगतान सरकार को नहीं किया। इसे आउटपुट टैक्स की कमी के रूप में चिन्हित किया गया है।
नोटिस में कुल राशि तीन हिस्सों में तय की गई है। इसमें लगभग ₹1.92 करोड़ मूल टैक्स, ₹1.58 करोड़ ब्याज और करीब ₹19 लाख का जुर्माना शामिल है। ब्याज की राशि लगभग मूल टैक्स के बराबर होने से कंपनी की वित्तीय देनदारी उल्लेखनीय रूप से बढ़ गई है।
यह मामला करीब पांच साल पुराना है और अप्रैल 2019 से मार्च 2020 के बीच के टैक्स रिकॉर्ड की जांच के बाद सामने आया है। कंपनी का कहना है कि उसे यह आदेश 6 जनवरी 2026 को प्राप्त हुआ। उस समय जोमैटो और उससे जुड़ी इकाइयों का संचालन तेजी से विस्तार के दौर से गुजर रहा था।
इटरनल ने स्पष्ट किया है कि वह विभाग के निष्कर्षों से सहमत नहीं है। कंपनी के अनुसार, टैक्स कैलकुलेशन और भुगतान से जुड़ा उसका पक्ष मजबूत है और उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर वह राहत की उम्मीद करती है। कंपनी ने कहा है कि वह नियमानुसार अपील दायर करेगी और कानूनी विकल्पों का उपयोग करेगी।
बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि राशि कंपनी के कुल राजस्व की तुलना में बड़ी नहीं है, लेकिन टैक्स अनुपालन से जुड़े मामले निवेशकों के भरोसे और ब्रांड छवि को प्रभावित कर सकते हैं। खासकर तब, जब कंपनी पहले से ही प्रतिस्पर्धी बाजार और नियामकीय निगरानी के दौर से गुजर रही हो।
टैक्स विशेषज्ञों के अनुसार, आउटपुट टैक्स से जुड़े विवाद आमतौर पर व्याख्या और गणना के अंतर के कारण पैदा होते हैं। ऐसे मामलों में अंतिम निर्णय अक्सर अपीलीय मंचों पर होता है। अब इस प्रकरण में यह देखना अहम होगा कि कंपनी को कानूनी प्रक्रिया में कितनी राहत मिलती है।
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