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लापता नाबालिग केस में हाईकोर्ट की कड़ी कार्रवाई: पुलिस अफसर निलंबित, SSP को कोर्ट में मांगनी पड़ी माफी
ग्वालियर (म.प्र.)
57 दिनों से बच्ची का पता न लगने पर ग्वालियर हाईकोर्ट नाराज़, सुनवाई के दौरान पुलिस के रवैये पर जताई सख्त आपत्ति
मध्य प्रदेश के ग्वालियर में 57 दिनों से लापता एक नाबालिग बच्ची के मामले में हाईकोर्ट ने पुलिस प्रशासन को कड़ा संदेश दिया है। मंगलवार को हुई सुनवाई के दौरान अदालत ने न सिर्फ जांच में हो रही देरी और लापरवाही पर सवाल उठाए, बल्कि न्यायालय के समक्ष अनुचित व्यवहार करने वाले एक सब-इंस्पेक्टर और एक प्रधान आरक्षक को तत्काल निलंबित करने के निर्देश भी दिए। हाईकोर्ट के आदेश पर वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (SSP) धर्मवीर शर्मा ने कार्रवाई करते हुए दोनों पुलिसकर्मियों को सस्पेंड किया और स्वयं अदालत में उपस्थित होकर माफी मांगी।
यह मामला 11 नवंबर से लापता बच्ची से जुड़ा है, जिसकी गुमशुदगी की रिपोर्ट 24 नवंबर को पुरानी छावनी थाने में दर्ज कराई गई थी। कई हफ्तों तक बच्ची का कोई सुराग न मिलने पर परिजनों ने हाईकोर्ट का रुख किया और बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दाखिल की। इसी याचिका पर मंगलवार को सुनवाई हुई।
कोर्ट में सुनवाई के दौरान क्या हुआ
सुनवाई के दौरान जब हाईकोर्ट ने जांच से जुड़े रिकॉर्ड और प्रगति रिपोर्ट मांगी, तो मौके पर मौजूद पुलिस अधिकारियों का व्यवहार न्यायालय को असंतोषजनक लगा। पहचान से जुड़े सवाल पर सब-इंस्पेक्टर द्वारा दिया गया जवाब और रोजनामचा प्रस्तुत करने में प्रधान आरक्षक की लापरवाही पर अदालत ने कड़ी नाराजगी जताई। न्यायालय ने इसे गंभीर अनुशासनहीनता मानते हुए तुरंत SSP को तलब कर लिया।
SSP धर्मवीर शर्मा निर्धारित समय से पहले अदालत में उपस्थित हुए और दोनों पुलिसकर्मियों के खिलाफ निलंबन की जानकारी दी। उन्होंने यह भी बताया कि मामले की आंतरिक जांच शुरू कर दी गई है और बच्ची की तलाश के प्रयास तेज किए जा रहे हैं।
जांच पर उठे गंभीर सवाल
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने साफ शब्दों में कहा कि नाबालिगों से जुड़े मामलों में पुलिस की जिम्मेदारी और संवेदनशीलता सर्वोपरि होनी चाहिए। अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि केवल आंकड़े पेश करना पर्याप्त नहीं है, जब तक जमीनी स्तर पर परिणाम नजर न आएं। जांच में हुई चूक और देरी को उजागर करते हुए कोर्ट ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर असंतोष जताया, जिसके बाद SSP को सार्वजनिक रूप से माफी मांगनी पड़ी।
परिजनों की पीड़ा और कोर्ट का रुख
याचिकाकर्ता पक्ष ने अदालत को बताया कि यदि प्रारंभिक स्तर पर शिकायतों पर गंभीरता दिखाई जाती, तो बच्ची को ढूंढा जा सकता था। हाईकोर्ट ने इस दलील को गंभीरता से लेते हुए कहा कि लापता बच्चों के मामलों में किसी भी तरह की ढिलाई कानून और मानवाधिकारों दोनों का उल्लंघन है।
हाईकोर्ट ने पुलिस को निर्देश दिए हैं कि बच्ची की तलाश में सभी संभावित पहलुओं पर काम किया जाए और जांच की नियमित प्रगति रिपोर्ट पेश की जाए। निलंबित पुलिसकर्मियों के खिलाफ विभागीय जांच जारी रहेगी।
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