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विकास परियोजनाओं में पेड़ों की कटाई पर सख्ती, हाईकोर्ट में पेश हुई ट्री ट्रांसलोकेशन पॉलिसी-2026
ग्वालियर,(म.प्र.)
एक पेड़ काटने पर लगाने होंगे 20 पौधे, 80% पेड़ों के वैज्ञानिक प्रत्यारोपण का प्रस्ताव
मध्यप्रदेश में विकास कार्यों के नाम पर बड़ी संख्या में होने वाली पेड़ों की कटाई पर अब सख्ती दिखाई दे सकती है। राज्य सरकार ने 'ट्री ट्रांसलोकेशन पॉलिसी-2026' का मसौदा तैयार कर लिया है, जिसे मंगलवार को हाईकोर्ट की डबल बेंच के समक्ष पेश किया गया। प्रस्तावित नीति का मुख्य उद्देश्य सड़क, मेट्रो, रेलवे, फ्लाईओवर और अन्य बड़े निर्माण कार्यों के दौरान पेड़ों को काटने की बजाय उन्हें वैज्ञानिक तरीके से दूसरी जगह स्थानांतरित करना है। सरकार का कहना है कि तेजी से हो रहे शहरी विकास और आधारभूत संरचना परियोजनाओं के बीच पर्यावरण संरक्षण को भी समान महत्व देना जरूरी है। इसी सोच के तहत यह नीति तैयार की गई है, ताकि विकास और हरित संतुलन दोनों को साथ लेकर आगे बढ़ा जा सके। किसी भी सरकारी या निजी निर्माण एजेंसी के लिए पेड़ों की कटाई अब पहला विकल्प नहीं होगी। एजेंसियों को पहले यह साबित करना होगा कि परियोजना के डिजाइन में बदलाव या अन्य तकनीकी विकल्पों के माध्यम से पेड़ों को बचाने की पूरी कोशिश की गई है। यदि इसके बावजूद पेड़ों को हटाना अपरिहार्य हो जाता है, तो प्रभावित पेड़ों में से कम से कम 80 प्रतिशत का वैज्ञानिक तरीके से प्रत्यारोपण करना अनिवार्य होगा। इसके अलावा यदि किसी पेड़ को काटने की अनुमति दी जाती है, तो उसके बदले 20 नए पौधे लगाने होंगे। इन पौधों के संरक्षण और विकास की जिम्मेदारी भी संबंधित एजेंसी की होगी।
बताया जा रहा है कि इस नीति के पीछे ग्वालियर की थाटीपुर पुनर्विकास परियोजना एक बड़ा कारण बनी। उस परियोजना के दौरान कई पेड़ों को एक स्थान से दूसरे स्थान पर स्थानांतरित किया गया था, लेकिन बाद में उनकी उचित देखभाल नहीं हो सकी। परिणामस्वरूप बड़ी संख्या में पेड़ नष्ट हो गए। इस मामले ने पर्यावरण संरक्षण से जुड़े कई सवाल खड़े किए थे। बाद में हाईकोर्ट ने इस पर संज्ञान लेते हुए सरकार से स्पष्ट और वैज्ञानिक नीति तैयार करने के निर्देश दिए थे। न्यायालय का मानना था कि केवल प्रत्यारोपण करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि पेड़ों के जीवित रहने और उनकी निगरानी के लिए भी प्रभावी व्यवस्था जरूरी है। नई नीति में इसी पहलू को ध्यान में रखते हुए तकनीक का व्यापक उपयोग करने का प्रस्ताव रखा गया है। प्रत्यारोपित किए गए पेड़ों और उनके बदले लगाए गए नए पौधों की जियो-टैगिंग की जाएगी। इसके लिए एक केंद्रीकृत ऑनलाइन डैशबोर्ड विकसित किया जाएगा, जहां प्रत्येक पेड़ की लोकेशन, तस्वीर, स्वास्थ्य स्थिति और रखरखाव से जुड़ी जानकारी दर्ज रहेगी। इससे न केवल निगरानी आसान होगी बल्कि पारदर्शिता भी बढ़ेगी। अधिकारियों के अनुसार, आम नागरिक और संबंधित विभाग भी इस डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से पेड़ों की स्थिति पर नजर रख सकेंगे।
पर्यावरण विशेषज्ञ लंबे समय से इस तरह की नीति की मांग कर रहे थे। उनका कहना है कि बड़े शहरों में तेजी से बढ़ते निर्माण कार्यों के कारण हर साल हजारों पेड़ काटे जाते हैं, जिससे स्थानीय पर्यावरण और जैव विविधता पर असर पड़ता है। गर्मी बढ़ने, भूजल स्तर में गिरावट और वायु प्रदूषण जैसी समस्याओं के पीछे हरित क्षेत्र में लगातार कमी भी एक प्रमुख कारण मानी जाती है। ऐसे में यदि पेड़ों को बचाने और उनके प्रत्यारोपण की प्रक्रिया को कानूनी रूप से मजबूत किया जाता है तो इसका सकारात्मक प्रभाव दिखाई दे सकता है। केवल नीति बनाना पर्याप्त नहीं होगा। उसके प्रभावी क्रियान्वयन और नियमित निगरानी पर भी उतना ही ध्यान देना होगा। कई बार प्रत्यारोपित पेड़ों की देखभाल शुरुआती महीनों में नहीं हो पाती, जिससे उनकी जीवित रहने की संभावना कम हो जाती है। इसलिए सरकार द्वारा प्रस्तावित डिजिटल मॉनिटरिंग सिस्टम और जवाबदेही तय करने की व्यवस्था को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। हाईकोर्ट के समक्ष प्रस्तुत किए गए ड्राफ्ट पर आगे विचार किया जाएगा। आवश्यक सुझावों और संशोधनों के बाद इसे अंतिम रूप दिया जा सकता है। यदि यह नीति लागू होती है तो मध्यप्रदेश उन राज्यों में शामिल हो जाएगा जहां विकास परियोजनाओं के साथ पर्यावरण संरक्षण को कानूनी और प्रशासनिक स्तर पर अधिक मजबूती देने की दिशा में ठोस कदम उठाए गए हैं।
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विकास परियोजनाओं में पेड़ों की कटाई पर सख्ती, हाईकोर्ट में पेश हुई ट्री ट्रांसलोकेशन पॉलिसी-2026
ग्वालियर,(म.प्र.)
मध्यप्रदेश में विकास कार्यों के नाम पर बड़ी संख्या में होने वाली पेड़ों की कटाई पर अब सख्ती दिखाई दे सकती है। राज्य सरकार ने 'ट्री ट्रांसलोकेशन पॉलिसी-2026' का मसौदा तैयार कर लिया है, जिसे मंगलवार को हाईकोर्ट की डबल बेंच के समक्ष पेश किया गया। प्रस्तावित नीति का मुख्य उद्देश्य सड़क, मेट्रो, रेलवे, फ्लाईओवर और अन्य बड़े निर्माण कार्यों के दौरान पेड़ों को काटने की बजाय उन्हें वैज्ञानिक तरीके से दूसरी जगह स्थानांतरित करना है। सरकार का कहना है कि तेजी से हो रहे शहरी विकास और आधारभूत संरचना परियोजनाओं के बीच पर्यावरण संरक्षण को भी समान महत्व देना जरूरी है। इसी सोच के तहत यह नीति तैयार की गई है, ताकि विकास और हरित संतुलन दोनों को साथ लेकर आगे बढ़ा जा सके। किसी भी सरकारी या निजी निर्माण एजेंसी के लिए पेड़ों की कटाई अब पहला विकल्प नहीं होगी। एजेंसियों को पहले यह साबित करना होगा कि परियोजना के डिजाइन में बदलाव या अन्य तकनीकी विकल्पों के माध्यम से पेड़ों को बचाने की पूरी कोशिश की गई है। यदि इसके बावजूद पेड़ों को हटाना अपरिहार्य हो जाता है, तो प्रभावित पेड़ों में से कम से कम 80 प्रतिशत का वैज्ञानिक तरीके से प्रत्यारोपण करना अनिवार्य होगा। इसके अलावा यदि किसी पेड़ को काटने की अनुमति दी जाती है, तो उसके बदले 20 नए पौधे लगाने होंगे। इन पौधों के संरक्षण और विकास की जिम्मेदारी भी संबंधित एजेंसी की होगी।
बताया जा रहा है कि इस नीति के पीछे ग्वालियर की थाटीपुर पुनर्विकास परियोजना एक बड़ा कारण बनी। उस परियोजना के दौरान कई पेड़ों को एक स्थान से दूसरे स्थान पर स्थानांतरित किया गया था, लेकिन बाद में उनकी उचित देखभाल नहीं हो सकी। परिणामस्वरूप बड़ी संख्या में पेड़ नष्ट हो गए। इस मामले ने पर्यावरण संरक्षण से जुड़े कई सवाल खड़े किए थे। बाद में हाईकोर्ट ने इस पर संज्ञान लेते हुए सरकार से स्पष्ट और वैज्ञानिक नीति तैयार करने के निर्देश दिए थे। न्यायालय का मानना था कि केवल प्रत्यारोपण करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि पेड़ों के जीवित रहने और उनकी निगरानी के लिए भी प्रभावी व्यवस्था जरूरी है। नई नीति में इसी पहलू को ध्यान में रखते हुए तकनीक का व्यापक उपयोग करने का प्रस्ताव रखा गया है। प्रत्यारोपित किए गए पेड़ों और उनके बदले लगाए गए नए पौधों की जियो-टैगिंग की जाएगी। इसके लिए एक केंद्रीकृत ऑनलाइन डैशबोर्ड विकसित किया जाएगा, जहां प्रत्येक पेड़ की लोकेशन, तस्वीर, स्वास्थ्य स्थिति और रखरखाव से जुड़ी जानकारी दर्ज रहेगी। इससे न केवल निगरानी आसान होगी बल्कि पारदर्शिता भी बढ़ेगी। अधिकारियों के अनुसार, आम नागरिक और संबंधित विभाग भी इस डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से पेड़ों की स्थिति पर नजर रख सकेंगे।
पर्यावरण विशेषज्ञ लंबे समय से इस तरह की नीति की मांग कर रहे थे। उनका कहना है कि बड़े शहरों में तेजी से बढ़ते निर्माण कार्यों के कारण हर साल हजारों पेड़ काटे जाते हैं, जिससे स्थानीय पर्यावरण और जैव विविधता पर असर पड़ता है। गर्मी बढ़ने, भूजल स्तर में गिरावट और वायु प्रदूषण जैसी समस्याओं के पीछे हरित क्षेत्र में लगातार कमी भी एक प्रमुख कारण मानी जाती है। ऐसे में यदि पेड़ों को बचाने और उनके प्रत्यारोपण की प्रक्रिया को कानूनी रूप से मजबूत किया जाता है तो इसका सकारात्मक प्रभाव दिखाई दे सकता है। केवल नीति बनाना पर्याप्त नहीं होगा। उसके प्रभावी क्रियान्वयन और नियमित निगरानी पर भी उतना ही ध्यान देना होगा। कई बार प्रत्यारोपित पेड़ों की देखभाल शुरुआती महीनों में नहीं हो पाती, जिससे उनकी जीवित रहने की संभावना कम हो जाती है। इसलिए सरकार द्वारा प्रस्तावित डिजिटल मॉनिटरिंग सिस्टम और जवाबदेही तय करने की व्यवस्था को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। हाईकोर्ट के समक्ष प्रस्तुत किए गए ड्राफ्ट पर आगे विचार किया जाएगा। आवश्यक सुझावों और संशोधनों के बाद इसे अंतिम रूप दिया जा सकता है। यदि यह नीति लागू होती है तो मध्यप्रदेश उन राज्यों में शामिल हो जाएगा जहां विकास परियोजनाओं के साथ पर्यावरण संरक्षण को कानूनी और प्रशासनिक स्तर पर अधिक मजबूती देने की दिशा में ठोस कदम उठाए गए हैं।
