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उज्जैन को मिल सकती है MP की दूसरी सरकारी मेडिकल यूनिवर्सिटी, प्रस्ताव तैयार
उज्जैन (म.प्र.)
छह संभागों के मेडिकल और हेल्थ साइंस संस्थानों की जिम्मेदारी नई यूनिवर्सिटी को देने की तैयारी, जबलपुर मेडिकल यूनिवर्सिटी का घटेगा प्रशासनिक बोझ
मध्य प्रदेश में मेडिकल एजुकेशन के प्रशासनिक ढांचे में बड़ा बदलाव करने की तैयारी शुरू हो गई है। राज्य सरकार उज्जैन में प्रदेश की दूसरी सरकारी मेडिकल यूनिवर्सिटी स्थापित करने की दिशा में आगे बढ़ रही है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की पहल पर इससे जुड़ा प्रस्ताव तैयार किया गया है। नई यूनिवर्सिटी बनने पर प्रदेश के मेडिकल, डेंटल, नर्सिंग, आयुष और दूसरे हेल्थ साइंस संस्थानों का काम दो विश्वविद्यालयों के बीच बांटा जा सकेगा। अभी इन संस्थानों की बड़ी जिम्मेदारी जबलपुर स्थित मेडिकल यूनिवर्सिटी के पास है।
प्रदेश में पिछले कुछ वर्षों के दौरान सरकारी और निजी मेडिकल कॉलेजों के साथ स्वास्थ्य शिक्षा से जुड़े संस्थानों की संख्या तेजी से बढ़ी है। नए मेडिकल कॉलेज खुलने के साथ नर्सिंग, डेंटल, आयुष और पैरामेडिकल शिक्षा का दायरा भी लगातार बढ़ रहा है। ऐसे में एक ही मेडिकल यूनिवर्सिटी के जरिए पूरे प्रदेश की शैक्षणिक और परीक्षा व्यवस्था संभालना बड़ी जिम्मेदारी बन गई है। सरकार इसी दबाव को कम करने के लिए दूसरी मेडिकल यूनिवर्सिटी की जरूरत पर काम कर रही है।
मध्य प्रदेश के चिकित्सा और स्वास्थ्य विज्ञान से जुड़े संस्थानों की संबद्धता का बड़ा हिस्सा जबलपुर स्थित मेडिकल यूनिवर्सिटी के माध्यम से संचालित होता है। इसमें मेडिकल कॉलेजों के साथ डेंटल, नर्सिंग, आयुष और दूसरे हेल्थ साइंस पाठ्यक्रम चलाने वाले संस्थान शामिल हैं। विश्वविद्यालय को अलग-अलग पाठ्यक्रमों की परीक्षा, रिजल्ट और शैक्षणिक प्रक्रियाओं से जुड़े काम संभालने पड़ते हैं। संस्थानों की संख्या बढ़ने के साथ इन जिम्मेदारियों का दायरा भी लगातार बड़ा हुआ है।
एक ही विश्वविद्यालय पर पूरे प्रदेश के संस्थानों की जिम्मेदारी होने से परीक्षा और प्रशासनिक काम का दबाव बढ़ने की स्थिति बनती है। अलग-अलग जिलों में मौजूद कॉलेजों की संबद्धता, परीक्षा कार्यक्रम तैयार करना, परिणाम घोषित करना और दूसरे अकादमिक मामलों को एक ही जगह से संभाला जाता है। नई मेडिकल यूनिवर्सिटी बनने पर इनमें से बड़ी संख्या में संस्थान उज्जैन के अधिकार क्षेत्र में आ जाएंगे। इससे काम का भौगोलिक और प्रशासनिक बंटवारा संभव हो सकेगा।
तैयार किए गए प्रस्ताव में उज्जैन की नई मेडिकल यूनिवर्सिटी का कार्यक्षेत्र भी तय करने की योजना है। इसके तहत प्रदेश के पश्चिमी, मध्य और उत्तरी हिस्से के कई संभागों को उज्जैन से जोड़ा जा सकता है। इंदौर, भोपाल, ग्वालियर, उज्जैन, नर्मदापुरम और चंबल संभाग में संचालित संबद्ध चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विज्ञान संस्थानों को प्रस्तावित यूनिवर्सिटी के दायरे में लाने की तैयारी है। इससे इन क्षेत्रों के कॉलेजों का शैक्षणिक और प्रशासनिक काम उज्जैन से संचालित हो सकेगा।
इंदौर संभाग प्रदेश में चिकित्सा शिक्षा का एक बड़ा केंद्र माना जाता है। यहां सरकारी और निजी क्षेत्र के कई मेडिकल तथा स्वास्थ्य शिक्षा संस्थान संचालित हैं। भोपाल में भी मेडिकल, डेंटल, नर्सिंग और दूसरे हेल्थ साइंस पाठ्यक्रमों से जुड़े कई बड़े संस्थान मौजूद हैं। इन दोनों संभागों के साथ ग्वालियर और चंबल क्षेत्र को भी उज्जैन की प्रस्तावित यूनिवर्सिटी से जोड़ने की योजना है। इससे नई यूनिवर्सिटी के पास प्रदेश के बड़े हिस्से के संस्थानों की जिम्मेदारी आएगी।
नर्मदापुरम संभाग के संस्थानों को भी इसी नई व्यवस्था के तहत उज्जैन से जोड़े जाने का प्रस्ताव है। सरकार की योजना केवल भौगोलिक आधार पर संस्थानों को बांटने तक सीमित नहीं है। इसके जरिए विश्वविद्यालय स्तर पर काम का संतुलन बनाने की कोशिश भी की जा रही है। कॉलेजों की संख्या, छात्रों की संख्या और भविष्य में खुलने वाले नए संस्थानों को देखते हुए दोनों विश्वविद्यालयों के बीच जिम्मेदारी बांटने की व्यवस्था तैयार की जा सकती है।
उज्जैन में नई यूनिवर्सिटी बनने के बाद जबलपुर की मेडिकल यूनिवर्सिटी का कार्यक्षेत्र भी नए सिरे से निर्धारित होगा। प्रस्ताव के अनुसार महाकौशल, विंध्य, रीवा, शहडोल और सागर क्षेत्र के चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विज्ञान संस्थान जबलपुर के अधीन बने रह सकते हैं। इस व्यवस्था से जबलपुर विश्वविद्यालय के पास प्रदेश के पूर्वी और कुछ मध्य हिस्सों की जिम्मेदारी रहेगी। वहीं उज्जैन विश्वविद्यालय पश्चिमी, उत्तरी और मध्य प्रदेश के बड़े हिस्से के संस्थानों को संभालेगा।
दो विश्वविद्यालयों के बीच काम बंटने का सीधा असर परीक्षा व्यवस्था पर भी पड़ सकता है। मेडिकल और हेल्थ साइंस पाठ्यक्रमों में हर वर्ष बड़ी संख्या में परीक्षाएं आयोजित की जाती हैं। अलग-अलग बैच, पाठ्यक्रम और कॉलेज होने के कारण परीक्षा कार्यक्रम तैयार करना बड़ा काम होता है। उत्तर पुस्तिकाओं के मूल्यांकन से लेकर परिणाम जारी करने तक कई स्तर की प्रक्रिया होती है। दूसरी यूनिवर्सिटी बनने से इन जिम्मेदारियों को दो अलग प्रशासनिक व्यवस्थाओं के जरिए संभाला जा सकेगा।
छात्रों के लिए समय पर परीक्षा और परिणाम मेडिकल एजुकेशन का महत्वपूर्ण हिस्सा है। परीक्षा कार्यक्रम में बदलाव या परिणाम में देरी होने पर आगे की पढ़ाई, इंटर्नशिप और दूसरी शैक्षणिक प्रक्रियाएं प्रभावित हो सकती हैं। सरकार को उम्मीद है कि विश्वविद्यालय स्तर पर काम का दबाव कम होने से इन प्रक्रियाओं को ज्यादा व्यवस्थित किया जा सकेगा। हालांकि नई व्यवस्था का वास्तविक स्वरूप प्रस्ताव को अंतिम मंजूरी मिलने और यूनिवर्सिटी का संचालन शुरू होने के बाद ही स्पष्ट होगा।
कॉलेजों की संबद्धता से जुड़े मामलों में भी नई यूनिवर्सिटी की भूमिका महत्वपूर्ण होगी। प्रदेश में नया मेडिकल, डेंटल, नर्सिंग या अन्य हेल्थ साइंस संस्थान शुरू होने पर कई शैक्षणिक और प्रशासनिक औपचारिकताएं पूरी करनी होती हैं। संस्थानों की संख्या लगातार बढ़ने के कारण विश्वविद्यालय स्तर पर भी काम बढ़ता है। क्षेत्र के आधार पर जिम्मेदारी तय होने से संबंधित कॉलेजों को अपने विश्वविद्यालय के साथ प्रशासनिक प्रक्रिया पूरी करने में सुविधा मिलने की उम्मीद है।
मध्य प्रदेश में मेडिकल कॉलेजों की संख्या बढ़ाने पर पिछले कुछ वर्षों से लगातार काम किया जा रहा है। कई जिलों में नए सरकारी मेडिकल कॉलेज शुरू हुए हैं, जबकि कुछ जगह नए संस्थान प्रस्तावित या निर्माणाधीन हैं। मेडिकल सीटों की संख्या बढ़ने के साथ स्वास्थ्य शिक्षा का पूरा नेटवर्क भी बड़ा हो रहा है। इसी बदलाव के बीच विश्वविद्यालय स्तर की व्यवस्था को भी विस्तार देने की जरूरत महसूस की जा रही है। उज्जैन की प्रस्तावित मेडिकल यूनिवर्सिटी इसी योजना का हिस्सा मानी जा रही है।
नई यूनिवर्सिटी के जरिए केवल परीक्षाओं और संबद्धता का काम ही नहीं होगा। मेडिकल रिसर्च और स्वास्थ्य विज्ञान से जुड़ी शैक्षणिक गतिविधियों को भी बढ़ावा मिलने की उम्मीद है। अलग विश्वविद्यालय बनने पर क्षेत्र के कॉलेजों के बीच शोध परियोजनाओं, अकादमिक कार्यक्रमों और प्रशिक्षण से जुड़े काम को अलग स्तर पर आगे बढ़ाया जा सकेगा। मेडिकल एजुकेशन में रिसर्च की बढ़ती जरूरत को देखते हुए प्रस्तावित यूनिवर्सिटी की भूमिका इस क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण हो सकती है।
उज्जैन को दूसरी सरकारी मेडिकल यूनिवर्सिटी के लिए चुने जाने का प्रस्ताव शहर के लिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। उज्जैन में पहले से चिकित्सा और उच्च शिक्षा से जुड़े संस्थान मौजूद हैं। आने वाले समय में यहां स्वास्थ्य सेवाओं और मेडिकल एजुकेशन के विस्तार की योजनाओं पर भी काम चल रहा है। विश्वविद्यालय स्थापित होने पर शहर चिकित्सा शिक्षा के प्रशासनिक केंद्र के रूप में भी विकसित हो सकता है। आसपास के संभागों से इसकी कनेक्टिविटी को भी प्रस्ताव के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव का गृह क्षेत्र होने के कारण उज्जैन में पिछले कुछ समय से कई बड़े विकास और अधोसंरचना प्रोजेक्ट पर काम बढ़ा है। स्वास्थ्य, शिक्षा, सड़क और शहरी विकास से जुड़ी परियोजनाएं भी आगे बढ़ाई जा रही हैं। इसी क्रम में मेडिकल यूनिवर्सिटी का प्रस्ताव शहर को चिकित्सा शिक्षा के बड़े केंद्र के रूप में नई पहचान दे सकता है। हालांकि यूनिवर्सिटी की जगह, कैंपस, बजट और निर्माण से जुड़े विस्तृत ब्योरे अंतिम मंजूरी के बाद सामने आने की उम्मीद है।
नई यूनिवर्सिटी के लिए प्रशासनिक ढांचा तैयार करना भी बड़ा काम होगा। कुलपति, रजिस्ट्रार, परीक्षा विभाग और दूसरे प्रशासनिक पदों की व्यवस्था के साथ अलग परीक्षा और शैक्षणिक तंत्र विकसित करना पड़ेगा। संबद्ध कॉलेजों का डेटा भी जबलपुर से नई यूनिवर्सिटी की व्यवस्था में स्थानांतरित करना होगा। छात्रों के रिकॉर्ड, परीक्षा संबंधी जानकारी और संस्थानों की संबद्धता जैसी प्रक्रियाओं के लिए विस्तृत कार्ययोजना की जरूरत पड़ेगी।
अगर प्रस्ताव को अंतिम मंजूरी मिलती है तो मध्य प्रदेश उन चुनिंदा राज्यों में शामिल हो जाएगा, जहां दो सरकारी मेडिकल यूनिवर्सिटी संचालित होंगी। उपलब्ध प्रस्ताव में उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल का उदाहरण सामने रखा गया है, जहां एक से अधिक सरकारी मेडिकल विश्वविद्यालयों की व्यवस्था बताई गई है। इसी आधार पर मध्य प्रदेश को देश का तीसरा ऐसा राज्य बनाए जाने की बात कही जा रही है। हालांकि यह स्थिति प्रस्ताव की अंतिम मंजूरी और विश्वविद्यालय की औपचारिक स्थापना के बाद ही बनेगी।
प्रदेश में चिकित्सा शिक्षा के बढ़ते दायरे को देखते हुए इस प्रस्ताव को लंबे समय की जरूरत से जोड़कर देखा जा रहा है। नए मेडिकल कॉलेज खुलने के साथ हर साल छात्रों की संख्या बढ़ रही है। नर्सिंग, डेंटल, आयुष और दूसरे स्वास्थ्य विज्ञान पाठ्यक्रमों का नेटवर्क भी पहले से बड़ा हुआ है। इन सभी संस्थानों की परीक्षा और अकादमिक व्यवस्था एक ही विश्वविद्यालय से संचालित होने पर काम का दायरा काफी व्यापक हो जाता है। नई यूनिवर्सिटी इसी जिम्मेदारी को दो हिस्सों में बांटने का रास्ता तैयार करेगी।
प्रस्ताव को अंतिम मंजूरी मिलने के बाद सबसे महत्वपूर्ण काम दोनों विश्वविद्यालयों के अधिकार क्षेत्र को स्पष्ट रूप से निर्धारित करना होगा। किस जिले का कौन सा कॉलेज उज्जैन के अधीन आएगा और कौन सा संस्थान जबलपुर से संबद्ध रहेगा, इसकी विस्तृत सूची तैयार की जाएगी। पहले से पढ़ाई कर रहे छात्रों की परीक्षा और डिग्री किस विश्वविद्यालय से होगी, इसके लिए भी संक्रमण व्यवस्था बनानी पड़ सकती है। इन सभी बिंदुओं पर आगे विस्तृत नियम सामने आने की संभावना है।
उज्जैन की प्रस्तावित मेडिकल यूनिवर्सिटी के अधिकार क्षेत्र में इंदौर, भोपाल, ग्वालियर, उज्जैन, नर्मदापुरम और चंबल संभाग को रखने की योजना फिलहाल सबसे अहम हिस्सा है। वहीं जबलपुर मेडिकल यूनिवर्सिटी के पास महाकौशल, विंध्य, रीवा, शहडोल और सागर क्षेत्र की जिम्मेदारी रहने का प्रस्ताव है। सरकार की अगली प्रक्रिया में प्रस्ताव की मंजूरी, विश्वविद्यालय के प्रशासनिक स्वरूप, बजट, स्थान और संस्थानों के औपचारिक विभाजन से जुड़े फैसले किए जाने हैं।
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उज्जैन को मिल सकती है MP की दूसरी सरकारी मेडिकल यूनिवर्सिटी, प्रस्ताव तैयार
उज्जैन (म.प्र.)
मध्य प्रदेश में मेडिकल एजुकेशन के प्रशासनिक ढांचे में बड़ा बदलाव करने की तैयारी शुरू हो गई है। राज्य सरकार उज्जैन में प्रदेश की दूसरी सरकारी मेडिकल यूनिवर्सिटी स्थापित करने की दिशा में आगे बढ़ रही है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की पहल पर इससे जुड़ा प्रस्ताव तैयार किया गया है। नई यूनिवर्सिटी बनने पर प्रदेश के मेडिकल, डेंटल, नर्सिंग, आयुष और दूसरे हेल्थ साइंस संस्थानों का काम दो विश्वविद्यालयों के बीच बांटा जा सकेगा। अभी इन संस्थानों की बड़ी जिम्मेदारी जबलपुर स्थित मेडिकल यूनिवर्सिटी के पास है।
प्रदेश में पिछले कुछ वर्षों के दौरान सरकारी और निजी मेडिकल कॉलेजों के साथ स्वास्थ्य शिक्षा से जुड़े संस्थानों की संख्या तेजी से बढ़ी है। नए मेडिकल कॉलेज खुलने के साथ नर्सिंग, डेंटल, आयुष और पैरामेडिकल शिक्षा का दायरा भी लगातार बढ़ रहा है। ऐसे में एक ही मेडिकल यूनिवर्सिटी के जरिए पूरे प्रदेश की शैक्षणिक और परीक्षा व्यवस्था संभालना बड़ी जिम्मेदारी बन गई है। सरकार इसी दबाव को कम करने के लिए दूसरी मेडिकल यूनिवर्सिटी की जरूरत पर काम कर रही है।
मध्य प्रदेश के चिकित्सा और स्वास्थ्य विज्ञान से जुड़े संस्थानों की संबद्धता का बड़ा हिस्सा जबलपुर स्थित मेडिकल यूनिवर्सिटी के माध्यम से संचालित होता है। इसमें मेडिकल कॉलेजों के साथ डेंटल, नर्सिंग, आयुष और दूसरे हेल्थ साइंस पाठ्यक्रम चलाने वाले संस्थान शामिल हैं। विश्वविद्यालय को अलग-अलग पाठ्यक्रमों की परीक्षा, रिजल्ट और शैक्षणिक प्रक्रियाओं से जुड़े काम संभालने पड़ते हैं। संस्थानों की संख्या बढ़ने के साथ इन जिम्मेदारियों का दायरा भी लगातार बड़ा हुआ है।
एक ही विश्वविद्यालय पर पूरे प्रदेश के संस्थानों की जिम्मेदारी होने से परीक्षा और प्रशासनिक काम का दबाव बढ़ने की स्थिति बनती है। अलग-अलग जिलों में मौजूद कॉलेजों की संबद्धता, परीक्षा कार्यक्रम तैयार करना, परिणाम घोषित करना और दूसरे अकादमिक मामलों को एक ही जगह से संभाला जाता है। नई मेडिकल यूनिवर्सिटी बनने पर इनमें से बड़ी संख्या में संस्थान उज्जैन के अधिकार क्षेत्र में आ जाएंगे। इससे काम का भौगोलिक और प्रशासनिक बंटवारा संभव हो सकेगा।
तैयार किए गए प्रस्ताव में उज्जैन की नई मेडिकल यूनिवर्सिटी का कार्यक्षेत्र भी तय करने की योजना है। इसके तहत प्रदेश के पश्चिमी, मध्य और उत्तरी हिस्से के कई संभागों को उज्जैन से जोड़ा जा सकता है। इंदौर, भोपाल, ग्वालियर, उज्जैन, नर्मदापुरम और चंबल संभाग में संचालित संबद्ध चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विज्ञान संस्थानों को प्रस्तावित यूनिवर्सिटी के दायरे में लाने की तैयारी है। इससे इन क्षेत्रों के कॉलेजों का शैक्षणिक और प्रशासनिक काम उज्जैन से संचालित हो सकेगा।
इंदौर संभाग प्रदेश में चिकित्सा शिक्षा का एक बड़ा केंद्र माना जाता है। यहां सरकारी और निजी क्षेत्र के कई मेडिकल तथा स्वास्थ्य शिक्षा संस्थान संचालित हैं। भोपाल में भी मेडिकल, डेंटल, नर्सिंग और दूसरे हेल्थ साइंस पाठ्यक्रमों से जुड़े कई बड़े संस्थान मौजूद हैं। इन दोनों संभागों के साथ ग्वालियर और चंबल क्षेत्र को भी उज्जैन की प्रस्तावित यूनिवर्सिटी से जोड़ने की योजना है। इससे नई यूनिवर्सिटी के पास प्रदेश के बड़े हिस्से के संस्थानों की जिम्मेदारी आएगी।
नर्मदापुरम संभाग के संस्थानों को भी इसी नई व्यवस्था के तहत उज्जैन से जोड़े जाने का प्रस्ताव है। सरकार की योजना केवल भौगोलिक आधार पर संस्थानों को बांटने तक सीमित नहीं है। इसके जरिए विश्वविद्यालय स्तर पर काम का संतुलन बनाने की कोशिश भी की जा रही है। कॉलेजों की संख्या, छात्रों की संख्या और भविष्य में खुलने वाले नए संस्थानों को देखते हुए दोनों विश्वविद्यालयों के बीच जिम्मेदारी बांटने की व्यवस्था तैयार की जा सकती है।
उज्जैन में नई यूनिवर्सिटी बनने के बाद जबलपुर की मेडिकल यूनिवर्सिटी का कार्यक्षेत्र भी नए सिरे से निर्धारित होगा। प्रस्ताव के अनुसार महाकौशल, विंध्य, रीवा, शहडोल और सागर क्षेत्र के चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विज्ञान संस्थान जबलपुर के अधीन बने रह सकते हैं। इस व्यवस्था से जबलपुर विश्वविद्यालय के पास प्रदेश के पूर्वी और कुछ मध्य हिस्सों की जिम्मेदारी रहेगी। वहीं उज्जैन विश्वविद्यालय पश्चिमी, उत्तरी और मध्य प्रदेश के बड़े हिस्से के संस्थानों को संभालेगा।
दो विश्वविद्यालयों के बीच काम बंटने का सीधा असर परीक्षा व्यवस्था पर भी पड़ सकता है। मेडिकल और हेल्थ साइंस पाठ्यक्रमों में हर वर्ष बड़ी संख्या में परीक्षाएं आयोजित की जाती हैं। अलग-अलग बैच, पाठ्यक्रम और कॉलेज होने के कारण परीक्षा कार्यक्रम तैयार करना बड़ा काम होता है। उत्तर पुस्तिकाओं के मूल्यांकन से लेकर परिणाम जारी करने तक कई स्तर की प्रक्रिया होती है। दूसरी यूनिवर्सिटी बनने से इन जिम्मेदारियों को दो अलग प्रशासनिक व्यवस्थाओं के जरिए संभाला जा सकेगा।
छात्रों के लिए समय पर परीक्षा और परिणाम मेडिकल एजुकेशन का महत्वपूर्ण हिस्सा है। परीक्षा कार्यक्रम में बदलाव या परिणाम में देरी होने पर आगे की पढ़ाई, इंटर्नशिप और दूसरी शैक्षणिक प्रक्रियाएं प्रभावित हो सकती हैं। सरकार को उम्मीद है कि विश्वविद्यालय स्तर पर काम का दबाव कम होने से इन प्रक्रियाओं को ज्यादा व्यवस्थित किया जा सकेगा। हालांकि नई व्यवस्था का वास्तविक स्वरूप प्रस्ताव को अंतिम मंजूरी मिलने और यूनिवर्सिटी का संचालन शुरू होने के बाद ही स्पष्ट होगा।
कॉलेजों की संबद्धता से जुड़े मामलों में भी नई यूनिवर्सिटी की भूमिका महत्वपूर्ण होगी। प्रदेश में नया मेडिकल, डेंटल, नर्सिंग या अन्य हेल्थ साइंस संस्थान शुरू होने पर कई शैक्षणिक और प्रशासनिक औपचारिकताएं पूरी करनी होती हैं। संस्थानों की संख्या लगातार बढ़ने के कारण विश्वविद्यालय स्तर पर भी काम बढ़ता है। क्षेत्र के आधार पर जिम्मेदारी तय होने से संबंधित कॉलेजों को अपने विश्वविद्यालय के साथ प्रशासनिक प्रक्रिया पूरी करने में सुविधा मिलने की उम्मीद है।
मध्य प्रदेश में मेडिकल कॉलेजों की संख्या बढ़ाने पर पिछले कुछ वर्षों से लगातार काम किया जा रहा है। कई जिलों में नए सरकारी मेडिकल कॉलेज शुरू हुए हैं, जबकि कुछ जगह नए संस्थान प्रस्तावित या निर्माणाधीन हैं। मेडिकल सीटों की संख्या बढ़ने के साथ स्वास्थ्य शिक्षा का पूरा नेटवर्क भी बड़ा हो रहा है। इसी बदलाव के बीच विश्वविद्यालय स्तर की व्यवस्था को भी विस्तार देने की जरूरत महसूस की जा रही है। उज्जैन की प्रस्तावित मेडिकल यूनिवर्सिटी इसी योजना का हिस्सा मानी जा रही है।
नई यूनिवर्सिटी के जरिए केवल परीक्षाओं और संबद्धता का काम ही नहीं होगा। मेडिकल रिसर्च और स्वास्थ्य विज्ञान से जुड़ी शैक्षणिक गतिविधियों को भी बढ़ावा मिलने की उम्मीद है। अलग विश्वविद्यालय बनने पर क्षेत्र के कॉलेजों के बीच शोध परियोजनाओं, अकादमिक कार्यक्रमों और प्रशिक्षण से जुड़े काम को अलग स्तर पर आगे बढ़ाया जा सकेगा। मेडिकल एजुकेशन में रिसर्च की बढ़ती जरूरत को देखते हुए प्रस्तावित यूनिवर्सिटी की भूमिका इस क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण हो सकती है।
उज्जैन को दूसरी सरकारी मेडिकल यूनिवर्सिटी के लिए चुने जाने का प्रस्ताव शहर के लिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। उज्जैन में पहले से चिकित्सा और उच्च शिक्षा से जुड़े संस्थान मौजूद हैं। आने वाले समय में यहां स्वास्थ्य सेवाओं और मेडिकल एजुकेशन के विस्तार की योजनाओं पर भी काम चल रहा है। विश्वविद्यालय स्थापित होने पर शहर चिकित्सा शिक्षा के प्रशासनिक केंद्र के रूप में भी विकसित हो सकता है। आसपास के संभागों से इसकी कनेक्टिविटी को भी प्रस्ताव के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव का गृह क्षेत्र होने के कारण उज्जैन में पिछले कुछ समय से कई बड़े विकास और अधोसंरचना प्रोजेक्ट पर काम बढ़ा है। स्वास्थ्य, शिक्षा, सड़क और शहरी विकास से जुड़ी परियोजनाएं भी आगे बढ़ाई जा रही हैं। इसी क्रम में मेडिकल यूनिवर्सिटी का प्रस्ताव शहर को चिकित्सा शिक्षा के बड़े केंद्र के रूप में नई पहचान दे सकता है। हालांकि यूनिवर्सिटी की जगह, कैंपस, बजट और निर्माण से जुड़े विस्तृत ब्योरे अंतिम मंजूरी के बाद सामने आने की उम्मीद है।
नई यूनिवर्सिटी के लिए प्रशासनिक ढांचा तैयार करना भी बड़ा काम होगा। कुलपति, रजिस्ट्रार, परीक्षा विभाग और दूसरे प्रशासनिक पदों की व्यवस्था के साथ अलग परीक्षा और शैक्षणिक तंत्र विकसित करना पड़ेगा। संबद्ध कॉलेजों का डेटा भी जबलपुर से नई यूनिवर्सिटी की व्यवस्था में स्थानांतरित करना होगा। छात्रों के रिकॉर्ड, परीक्षा संबंधी जानकारी और संस्थानों की संबद्धता जैसी प्रक्रियाओं के लिए विस्तृत कार्ययोजना की जरूरत पड़ेगी।
अगर प्रस्ताव को अंतिम मंजूरी मिलती है तो मध्य प्रदेश उन चुनिंदा राज्यों में शामिल हो जाएगा, जहां दो सरकारी मेडिकल यूनिवर्सिटी संचालित होंगी। उपलब्ध प्रस्ताव में उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल का उदाहरण सामने रखा गया है, जहां एक से अधिक सरकारी मेडिकल विश्वविद्यालयों की व्यवस्था बताई गई है। इसी आधार पर मध्य प्रदेश को देश का तीसरा ऐसा राज्य बनाए जाने की बात कही जा रही है। हालांकि यह स्थिति प्रस्ताव की अंतिम मंजूरी और विश्वविद्यालय की औपचारिक स्थापना के बाद ही बनेगी।
प्रदेश में चिकित्सा शिक्षा के बढ़ते दायरे को देखते हुए इस प्रस्ताव को लंबे समय की जरूरत से जोड़कर देखा जा रहा है। नए मेडिकल कॉलेज खुलने के साथ हर साल छात्रों की संख्या बढ़ रही है। नर्सिंग, डेंटल, आयुष और दूसरे स्वास्थ्य विज्ञान पाठ्यक्रमों का नेटवर्क भी पहले से बड़ा हुआ है। इन सभी संस्थानों की परीक्षा और अकादमिक व्यवस्था एक ही विश्वविद्यालय से संचालित होने पर काम का दायरा काफी व्यापक हो जाता है। नई यूनिवर्सिटी इसी जिम्मेदारी को दो हिस्सों में बांटने का रास्ता तैयार करेगी।
प्रस्ताव को अंतिम मंजूरी मिलने के बाद सबसे महत्वपूर्ण काम दोनों विश्वविद्यालयों के अधिकार क्षेत्र को स्पष्ट रूप से निर्धारित करना होगा। किस जिले का कौन सा कॉलेज उज्जैन के अधीन आएगा और कौन सा संस्थान जबलपुर से संबद्ध रहेगा, इसकी विस्तृत सूची तैयार की जाएगी। पहले से पढ़ाई कर रहे छात्रों की परीक्षा और डिग्री किस विश्वविद्यालय से होगी, इसके लिए भी संक्रमण व्यवस्था बनानी पड़ सकती है। इन सभी बिंदुओं पर आगे विस्तृत नियम सामने आने की संभावना है।
उज्जैन की प्रस्तावित मेडिकल यूनिवर्सिटी के अधिकार क्षेत्र में इंदौर, भोपाल, ग्वालियर, उज्जैन, नर्मदापुरम और चंबल संभाग को रखने की योजना फिलहाल सबसे अहम हिस्सा है। वहीं जबलपुर मेडिकल यूनिवर्सिटी के पास महाकौशल, विंध्य, रीवा, शहडोल और सागर क्षेत्र की जिम्मेदारी रहने का प्रस्ताव है। सरकार की अगली प्रक्रिया में प्रस्ताव की मंजूरी, विश्वविद्यालय के प्रशासनिक स्वरूप, बजट, स्थान और संस्थानों के औपचारिक विभाजन से जुड़े फैसले किए जाने हैं।
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