- Hindi News
- शैक्षणिक सुधारों को परिणामों में बदलने की चुनौती का सामना कर रहे हैं विश्वविद्यालय
शैक्षणिक सुधारों को परिणामों में बदलने की चुनौती का सामना कर रहे हैं विश्वविद्यालय
Digital Desk
नेशनल एजुकेशन पॉलिसी (एनईपी) को लागू हुए छह वर्ष पूरे होने के बाद अब उच्च शिक्षा को लेकर चर्चा नीति के उद्देश्यों से आगे बढ़कर उसकेवास्तविक प्रभाव पर केंद्रित हो गई है। सवाल यह है कि क्या इन सुधारों का असर विश्वविद्यालयों के कक्षाओं और विद्यार्थियों के सीखने केअनुभव पर दिखाई दे रहा है।
एनईपी 2020 लागू होने के बाद विश्वविद्यालयों ने मल्टीडिसिप्लिनरी पाठ्यक्रम, फ्लेक्सिबल कोर्स स्ट्रक्चर और कौशल विकास पर अधिक जोरदेना शुरू किया है। हालांकि शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि असली कसौटी यह होगी कि क्या ये बदलाव विद्यार्थियों की सीखने की प्रक्रियाको बेहतर बना रहे हैं और उन्हें तेजी से बदलते कार्यक्षेत्र के लिए तैयार कर रहे हैं।
एमिटी विश्वविद्यालय के चांसलर, डॉ. असीम चौहान ने कहा कि नेशनल एजुकेशन पॉलिसी के तहत परिकल्पित परिवर्तन को वास्तविक रूपदेने के लिए संस्थानों में लगातार और दीर्घकालिक प्रयासों की आवश्यकता होगी। उन्होंने कहा, “छह वर्षों में एनईपी 2020 ने विश्वविद्यालयों कीसोच और उनके लक्ष्यों को बदल दिया है, और यह आज भी उनके काम करने के तरीके को प्रभावित कर रही है। इस नीति ने संस्थानों से केवलडिग्री प्रदान करने के बजाय विद्यार्थियों की वास्तविक क्षमताओं का विकास करने की अपेक्षा की है। यह बदलाव एक-एक पाठ्यक्रम औरएक-एक शिक्षक के माध्यम से वर्षों में तैयार होता है। वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम का अनुमान है कि वर्ष 2030 तक नौकरियों में आवश्यक प्रमुखकौशलों का बड़ा हिस्सा बदल जाएगा। संयोग से यही वह समय भी होगा जब यह नीति अपने दस वर्ष पूरे करेगी। एनईपी के अगले चरण कामूल्यांकन एक सरल प्रश्न से होगा—क्या विश्वविद्यालय से निकलने वाला विद्यार्थी सही निर्णय लेने की क्षमता, परिस्थितियों के अनुरूप स्वयं कोढालने की योग्यता और निरंतर सीखते रहने की प्रवृत्ति लेकर निकलता है। एमिटी विश्वविद्यालय में हमारी हर पहल इसी कसौटी पर आधारित होतीहै।”
प्रेस्टीज यूनिवर्सिटी इंदौर के वाइस चांसलर, प्रो. केयूर पुरानी ने कहा कि केवल नीति के प्रावधानों को अपनाना पर्याप्त नहीं है।
उन्होंने कहा, “एनईपी 2020 के छह वर्ष पूरे होने के बाद अब वास्तविक प्रश्न यह नहीं है कि भारत के पास नई शिक्षा नीति है या नहीं, बल्कि यह है कि क्याहमारे विश्वविद्यालय स्वयं को नए विश्वविद्यालयों के रूप में विकसित करने का साहस दिखा पाए हैं।
एनईपी का वास्तविक प्रभाव इस बात से नहींमापा जाएगा कि विश्वविद्यालयों ने उसके कितने प्रावधान लागू किए, बल्कि इस बात से तय होगा कि उन्होंने उसकी भावना को कितनी प्रभावीढंग से अपनाया। वास्तविक परिणाम केवल नवाचार से आते हैं, केवल नियमों के पालन से नहीं। नीतियां संभावनाएं पैदा करती हैं, लेकिन भविष्यका निर्माण संस्थान करते हैं।”
नीति की छठी वर्षगांठ के साथ संस्थागत सुधारों की गति पर भी एक बार फिर ध्यान केंद्रित हुआ है। अब सबसे बड़ी चुनौती यह सुनिश्चित करना हैकि पाठ्यक्रमों और शैक्षणिक संरचना में किए गए बदलावों के साथ-साथ शिक्षण पद्धति, मूल्यांकन प्रणाली और शिक्षकों के कौशल विकास मेंभी समान रूप से सुधार हो।
एनईपी 2020 के सातवें वर्ष में प्रवेश करने के साथ अब सभी की नजर इस बात पर रहेगी कि क्या उच्च शिक्षण संस्थान संरचनात्मक सुधारों कोविद्यार्थियों के बेहतर शैक्षणिक प्रदर्शन और रोजगार के अवसरों में बदलने में सफल हो पाते हैं।
-----------------
हमारे आधिकारिक प्लेटफॉर्म्स से जुड़ें –
🔴 व्हाट्सएप चैनल: https://whatsapp.com/channel/0029VbATlF0KQuJB6tvUrN3V
🔴 फेसबुक: Dainik Jagran MP/CG Official
🟣 इंस्टाग्राम: @dainikjagranmp.cg
🔴 यूट्यूब: Dainik Jagran MPCG Digital
📲 सोशल मीडिया पर जुड़ें और बने जागरूक पाठक।
👉 आज ही जुड़िए
शैक्षणिक सुधारों को परिणामों में बदलने की चुनौती का सामना कर रहे हैं विश्वविद्यालय
Digital Desk
एनईपी 2020 लागू होने के बाद विश्वविद्यालयों ने मल्टीडिसिप्लिनरी पाठ्यक्रम, फ्लेक्सिबल कोर्स स्ट्रक्चर और कौशल विकास पर अधिक जोरदेना शुरू किया है। हालांकि शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि असली कसौटी यह होगी कि क्या ये बदलाव विद्यार्थियों की सीखने की प्रक्रियाको बेहतर बना रहे हैं और उन्हें तेजी से बदलते कार्यक्षेत्र के लिए तैयार कर रहे हैं।
एमिटी विश्वविद्यालय के चांसलर, डॉ. असीम चौहान ने कहा कि नेशनल एजुकेशन पॉलिसी के तहत परिकल्पित परिवर्तन को वास्तविक रूपदेने के लिए संस्थानों में लगातार और दीर्घकालिक प्रयासों की आवश्यकता होगी। उन्होंने कहा, “छह वर्षों में एनईपी 2020 ने विश्वविद्यालयों कीसोच और उनके लक्ष्यों को बदल दिया है, और यह आज भी उनके काम करने के तरीके को प्रभावित कर रही है। इस नीति ने संस्थानों से केवलडिग्री प्रदान करने के बजाय विद्यार्थियों की वास्तविक क्षमताओं का विकास करने की अपेक्षा की है। यह बदलाव एक-एक पाठ्यक्रम औरएक-एक शिक्षक के माध्यम से वर्षों में तैयार होता है। वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम का अनुमान है कि वर्ष 2030 तक नौकरियों में आवश्यक प्रमुखकौशलों का बड़ा हिस्सा बदल जाएगा। संयोग से यही वह समय भी होगा जब यह नीति अपने दस वर्ष पूरे करेगी। एनईपी के अगले चरण कामूल्यांकन एक सरल प्रश्न से होगा—क्या विश्वविद्यालय से निकलने वाला विद्यार्थी सही निर्णय लेने की क्षमता, परिस्थितियों के अनुरूप स्वयं कोढालने की योग्यता और निरंतर सीखते रहने की प्रवृत्ति लेकर निकलता है। एमिटी विश्वविद्यालय में हमारी हर पहल इसी कसौटी पर आधारित होतीहै।”
प्रेस्टीज यूनिवर्सिटी इंदौर के वाइस चांसलर, प्रो. केयूर पुरानी ने कहा कि केवल नीति के प्रावधानों को अपनाना पर्याप्त नहीं है।
उन्होंने कहा, “एनईपी 2020 के छह वर्ष पूरे होने के बाद अब वास्तविक प्रश्न यह नहीं है कि भारत के पास नई शिक्षा नीति है या नहीं, बल्कि यह है कि क्याहमारे विश्वविद्यालय स्वयं को नए विश्वविद्यालयों के रूप में विकसित करने का साहस दिखा पाए हैं।
एनईपी का वास्तविक प्रभाव इस बात से नहींमापा जाएगा कि विश्वविद्यालयों ने उसके कितने प्रावधान लागू किए, बल्कि इस बात से तय होगा कि उन्होंने उसकी भावना को कितनी प्रभावीढंग से अपनाया। वास्तविक परिणाम केवल नवाचार से आते हैं, केवल नियमों के पालन से नहीं। नीतियां संभावनाएं पैदा करती हैं, लेकिन भविष्यका निर्माण संस्थान करते हैं।”
नीति की छठी वर्षगांठ के साथ संस्थागत सुधारों की गति पर भी एक बार फिर ध्यान केंद्रित हुआ है। अब सबसे बड़ी चुनौती यह सुनिश्चित करना हैकि पाठ्यक्रमों और शैक्षणिक संरचना में किए गए बदलावों के साथ-साथ शिक्षण पद्धति, मूल्यांकन प्रणाली और शिक्षकों के कौशल विकास मेंभी समान रूप से सुधार हो।
एनईपी 2020 के सातवें वर्ष में प्रवेश करने के साथ अब सभी की नजर इस बात पर रहेगी कि क्या उच्च शिक्षण संस्थान संरचनात्मक सुधारों कोविद्यार्थियों के बेहतर शैक्षणिक प्रदर्शन और रोजगार के अवसरों में बदलने में सफल हो पाते हैं।
