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ऑफिस का स्ट्रेस घर तक क्यों चला आता है: वर्क-लाइफ बैलेंस की कमी बन रही मानसिक दबाव की बड़ी वजह
लाइफस्टाइल डेस्क
काम का बढ़ता बोझ, डिजिटल कनेक्टिविटी और असंतुलित दिनचर्या घर की शांति पर डाल रही असर, विशेषज्ञों ने बताए कारण और संकेत
ऑफिस का तनाव घर तक क्यों पहुंच रहा है? महानगरों से लेकर छोटे शहरों तक, कामकाजी लोग इस समस्या से जूझ रहे हैं। दफ्तर की जिम्मेदारियां खत्म होने के बाद भी दिमाग काम से मुक्त नहीं हो पा रहा, जिसका सीधा असर पारिवारिक रिश्तों और निजी जीवन पर पड़ रहा है।
मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों और वर्कप्लेस काउंसलर्स के अनुसार, ऑफिस स्ट्रेस का घर तक आना आज के प्रोफेशनल्स की आम समस्या बन चुकी है। खासकर प्राइवेट सेक्टर, आईटी, मीडिया, कॉर्पोरेट और सरकारी सेवाओं में काम करने वाले कर्मचारी इससे ज्यादा प्रभावित हैं।
कोविड के बाद बढ़े वर्क फ्रॉम होम कल्चर और हाइब्रिड मॉडल ने इस समस्या को और गहरा किया है। भारत के शहरी इलाकों में यह ट्रेंड ज्यादा देखने को मिल रहा है, जहां काम और निजी जीवन के बीच की रेखा लगभग मिटती जा रही है।
क्यों बढ़ रहा है ऑफिस स्ट्रेस
विशेषज्ञों का कहना है कि बढ़ते टारगेट, जॉब इनसिक्योरिटी, लंबा वर्किंग ऑवर और लगातार परफॉर्मेंस प्रेशर इसकी बड़ी वजह हैं। इसके अलावा मोबाइल, ईमेल और ऑफिस चैट ऐप्स ने कर्मचारियों को 24x7 उपलब्ध रहने के दबाव में डाल दिया है। दफ्तर खत्म होने के बाद भी नोटिफिकेशन दिमाग को आराम नहीं करने देते।
कैसे असर डालता है घर के माहौल पर
ऑफिस का तनाव जब घर तक आता है, तो उसका असर व्यवहार में साफ दिखता है। चिड़चिड़ापन, गुस्सा, बातचीत में कमी और अपनों से दूरी बढ़ने लगती है। कई मामलों में यह तनाव नींद की कमी, सिरदर्द, हाई ब्लड प्रेशर और एंग्जायटी जैसी समस्याओं को जन्म देता है। परिवार के सदस्य अक्सर समझ नहीं पाते कि बदलाव की वजह ऑफिस स्ट्रेस है।
डिजिटल कनेक्टिविटी बनी बड़ी चुनौती
लाइफस्टाइल एक्सपर्ट्स मानते हैं कि तकनीक ने काम को आसान बनाया है, लेकिन साथ ही मानसिक दबाव भी बढ़ाया है। ऑफिस और घर के बीच डिजिटल दीवार न होने से दिमाग लगातार ‘वर्क मोड’ में रहता है। यही वजह है कि लोग घर आकर भी रिलैक्स नहीं कर पाते।
विशेषज्ञों की राय
मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, ऑफिस स्ट्रेस को घर तक आने से रोकने के लिए मानसिक सीमाएं तय करना जरूरी है। काम के बाद खुद को समय देना, परिवार के साथ बातचीत और स्क्रीन से दूरी मानसिक संतुलन बनाए रखने में मदद करती है।
वर्क-लाइफ बैलेंस अब सिर्फ एक शब्द नहीं, बल्कि ज़रूरत बन चुका है। कंपनियां भी धीरे-धीरे मेंटल हेल्थ पॉलिसी पर ध्यान दे रही हैं, लेकिन असली बदलाव व्यक्ति की आदतों से ही आएगा।ऑफिस का तनाव अगर समय रहते नहीं संभाला गया, तो यह रिश्तों और स्वास्थ्य दोनों पर भारी पड़ सकता है।
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