बेरोजगारी के आंकड़े और युवाओं की हकीकत: क्या सरकार की नीतियां वास्तविक समस्या का समाधान कर पा रही हैं?

विकास मालवीय

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रोज़गार के सरकारी आंकड़ों से लेकर मैदान की हकीकत तक — क्यों युवा अभी भी नौकरी पाने में संघर्ष कर रहे हैं और किन संरचनात्मक बदलावों की ज़रूरत है

भारत में बेरोजगारी का मसला लंबे समय से राष्ट्रीय चर्चा का विषय बना हुआ है। सरकारी आंकड़े चाहे जितने भी सकारात्मक क्यों न दिखें, युवा वर्ग की वास्तविक स्थिति उससे लगभग सदा अलग नजर आती है। आंकड़े बताते हैं कि बेरोजगारी दर में मामूली गिरावट आई है, लेकिन मैदान की हकीकत यह है कि बेरोज़गार युवा आज भी रोज़गार के अवसर खोजते हुए संघर्ष कर रहे हैं।

आधिकारिक डेटा के अनुसार 2025–26 की तिमाहियों में बेरोजगारी दर घटकर 6% के आसपास आ गई है, जिससे लग सकता है कि रोज़गार की स्थिति सुधर रही है। सरकार लगातार कह रही है कि मेक इन इंडिया, स्टार्टअप इंडिया और कौशल विकास योजनाओं से रोजगार सृजन को बढ़ावा मिल रहा है। कई राज्यों की रिपोर्टों में भी यह संकेत मिलता है कि निर्माण, सेवा और डिजिटल क्षेत्र में नौकरियों के अवसर बढ़ रहे हैं।

लेकिन युवाओं की हकीकत जमीन पर कुछ और ही बयान करती है।

शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों के युवा बताते हैं कि उपलब्ध नौकरियों की संख्या जितनी उम्मीदें थी उससे बहुत कम है। कई कंपनियों में रोजगार का सिलसिला अस्थायी, अनुबंध आधारित और ‘गिग इकोनॉमी’ पर आधारित हो गया है। इसका मतलब यह है कि नौकरियां तो उपलब्ध हैं, लेकिन वे स्थाई या सामाजिक सुरक्षा वाले रोजगार नहीं हैं। इसलिए कई युवा कहते हैं:

“हम नौकरी पा लेते हैं, लेकिन वह नौकरियाँ पैकेज, स्थिरता और भविष्य की सुरक्षा प्रदान नहीं करतीं।”

आज के युवा वर्ग में स्नातक और स्नातकोत्तर डिग्री धारक पिछले दशक की तुलना में अधिक हैं, लेकिन डिग्री का मतलब स्थिर नौकरी नहीं बनता। विशेषज्ञों के अनुसार, शिक्षा और कौशल के बीच बड़ा अंतर इसका कारण है। कॉलेजों में विशेषज्ञता की बजाय सामान्य डिग्री मिलने लगी है, जिससे श्रम बाजार की मांग और ग्रेजुएट की आपूर्ति के बीच भारी अंतर पैदा हो गया है।

न केवल यह, बल्कि काम की गुणवत्ता में गिरावट, अनुभव की आवश्यकता और तकनीकी योग्यता का दबाव बेरोजगारी की समस्या को और गंभीर बनाता है। एक आईटी इंजीनियर ने नाम न छापने की शर्त पर कहा:

“डिग्री तो है, लेकिन ऐसे कौशल नहीं हैं जिन्हें वास्तविक उद्योग में लागू किया जा सके।”

इसके अलावा, ग्रामीण युवाओं का अनुभव और भी अलग है। सरकारी आंकड़ों में कृषि और संबंधित क्षेत्र में काम करते मजबूर श्रमिकों को अकसर “स्वरोजगार” श्रेणी में दिखाया जाता है, जबकि असल में वे आर्थिक दबाव में कृषि आधारित मामूली कार्य कर रहे होते हैं। इसका मतलब यह है कि सरकारी आंकड़े वास्तविक बेरोजगारी की तीव्रता को पूरी तरह दर्शा नहीं पाते।

विश्लेषण बताते हैं कि बेरोजगारी सिर्फ नौकरियों की कमी नहीं है, बल्कि यह कौशल, अवसर, सामाजिक सुरक्षा और भविष्य के विश्वास का मिलाजुला परिणाम है। आज के युवाओं को न केवल नौकरी चाहिए, बल्कि स्थिर भविष्य, उपयुक्त पैकेज और विकास का अवसर चाहिए। सिर्फ जॉब सर्वे में गिरावट या सकारात्मक आंकड़े जनता की उम्मीदों को पूरा नहीं करते।

समाधान के लिए क्या ज़रूरी है?
विशेषज्ञों का सुझाव है कि रोजगार समस्या का समाधान समग्र होना चाहिए—शिक्षा सुधार, कौशल विकास, उत्पादन आधारित अर्थव्यवस्था, नवाचार को बढ़ावा और सामाजिक सुरक्षा नेट— ताकि रोजगार सिर्फ नाम की नौकरी न रहे, बल्कि जीवन का स्थिर आधार बने।

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www.dainikjagranmpcg.com
20 Jan 2026 By Nitin Trivedi

बेरोजगारी के आंकड़े और युवाओं की हकीकत: क्या सरकार की नीतियां वास्तविक समस्या का समाधान कर पा रही हैं?

विकास मालवीय

भारत में बेरोजगारी का मसला लंबे समय से राष्ट्रीय चर्चा का विषय बना हुआ है। सरकारी आंकड़े चाहे जितने भी सकारात्मक क्यों न दिखें, युवा वर्ग की वास्तविक स्थिति उससे लगभग सदा अलग नजर आती है। आंकड़े बताते हैं कि बेरोजगारी दर में मामूली गिरावट आई है, लेकिन मैदान की हकीकत यह है कि बेरोज़गार युवा आज भी रोज़गार के अवसर खोजते हुए संघर्ष कर रहे हैं।

आधिकारिक डेटा के अनुसार 2025–26 की तिमाहियों में बेरोजगारी दर घटकर 6% के आसपास आ गई है, जिससे लग सकता है कि रोज़गार की स्थिति सुधर रही है। सरकार लगातार कह रही है कि मेक इन इंडिया, स्टार्टअप इंडिया और कौशल विकास योजनाओं से रोजगार सृजन को बढ़ावा मिल रहा है। कई राज्यों की रिपोर्टों में भी यह संकेत मिलता है कि निर्माण, सेवा और डिजिटल क्षेत्र में नौकरियों के अवसर बढ़ रहे हैं।

लेकिन युवाओं की हकीकत जमीन पर कुछ और ही बयान करती है।

शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों के युवा बताते हैं कि उपलब्ध नौकरियों की संख्या जितनी उम्मीदें थी उससे बहुत कम है। कई कंपनियों में रोजगार का सिलसिला अस्थायी, अनुबंध आधारित और ‘गिग इकोनॉमी’ पर आधारित हो गया है। इसका मतलब यह है कि नौकरियां तो उपलब्ध हैं, लेकिन वे स्थाई या सामाजिक सुरक्षा वाले रोजगार नहीं हैं। इसलिए कई युवा कहते हैं:

“हम नौकरी पा लेते हैं, लेकिन वह नौकरियाँ पैकेज, स्थिरता और भविष्य की सुरक्षा प्रदान नहीं करतीं।”

आज के युवा वर्ग में स्नातक और स्नातकोत्तर डिग्री धारक पिछले दशक की तुलना में अधिक हैं, लेकिन डिग्री का मतलब स्थिर नौकरी नहीं बनता। विशेषज्ञों के अनुसार, शिक्षा और कौशल के बीच बड़ा अंतर इसका कारण है। कॉलेजों में विशेषज्ञता की बजाय सामान्य डिग्री मिलने लगी है, जिससे श्रम बाजार की मांग और ग्रेजुएट की आपूर्ति के बीच भारी अंतर पैदा हो गया है।

न केवल यह, बल्कि काम की गुणवत्ता में गिरावट, अनुभव की आवश्यकता और तकनीकी योग्यता का दबाव बेरोजगारी की समस्या को और गंभीर बनाता है। एक आईटी इंजीनियर ने नाम न छापने की शर्त पर कहा:

“डिग्री तो है, लेकिन ऐसे कौशल नहीं हैं जिन्हें वास्तविक उद्योग में लागू किया जा सके।”

इसके अलावा, ग्रामीण युवाओं का अनुभव और भी अलग है। सरकारी आंकड़ों में कृषि और संबंधित क्षेत्र में काम करते मजबूर श्रमिकों को अकसर “स्वरोजगार” श्रेणी में दिखाया जाता है, जबकि असल में वे आर्थिक दबाव में कृषि आधारित मामूली कार्य कर रहे होते हैं। इसका मतलब यह है कि सरकारी आंकड़े वास्तविक बेरोजगारी की तीव्रता को पूरी तरह दर्शा नहीं पाते।

विश्लेषण बताते हैं कि बेरोजगारी सिर्फ नौकरियों की कमी नहीं है, बल्कि यह कौशल, अवसर, सामाजिक सुरक्षा और भविष्य के विश्वास का मिलाजुला परिणाम है। आज के युवाओं को न केवल नौकरी चाहिए, बल्कि स्थिर भविष्य, उपयुक्त पैकेज और विकास का अवसर चाहिए। सिर्फ जॉब सर्वे में गिरावट या सकारात्मक आंकड़े जनता की उम्मीदों को पूरा नहीं करते।

समाधान के लिए क्या ज़रूरी है?
विशेषज्ञों का सुझाव है कि रोजगार समस्या का समाधान समग्र होना चाहिए—शिक्षा सुधार, कौशल विकास, उत्पादन आधारित अर्थव्यवस्था, नवाचार को बढ़ावा और सामाजिक सुरक्षा नेट— ताकि रोजगार सिर्फ नाम की नौकरी न रहे, बल्कि जीवन का स्थिर आधार बने।

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