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ट्रंप का बड़ा फैसला: अमेरिका 66 वैश्विक संगठनों से अलग, भारत की अगुआई वाला सोलर अलायंस भी छोड़ा
अंतराष्ट्रीय न्यूज
‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति के तहत व्हाइट हाउस का ऐलान, WHO और UN से जुड़े कई मंचों से हटने का रास्ता साफ
अमेरिका ने वैश्विक कूटनीति में एक बड़ा मोड़ लेते हुए 66 अंतरराष्ट्रीय संगठनों और बहुपक्षीय मंचों से बाहर निकलने का फैसला किया है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस संबंध में एक आधिकारिक मेमोरेंडम पर हस्ताक्षर किए, जिसके तहत अमेरिका अब संयुक्त राष्ट्र से जुड़ी 31 एजेंसियों और 35 अन्य वैश्विक संस्थाओं का हिस्सा नहीं रहेगा। इस सूची में भारत की पहल पर गठित इंटरनेशनल सोलर अलायंस (ISA) भी शामिल है।
व्हाइट हाउस और अमेरिकी विदेश विभाग की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि इन संगठनों की कार्यप्रणाली अमेरिकी हितों के अनुरूप नहीं है। प्रशासन का दावा है कि कई संस्थाएं अनावश्यक खर्च, वैचारिक एजेंडे और वैश्विक शासन को बढ़ावा दे रही थीं, जिससे अमेरिकी संप्रभुता और आर्थिक प्राथमिकताओं पर असर पड़ रहा था।
WHO से भी अलग होगा अमेरिका
इस फैसले के तहत अमेरिका 22 जनवरी 2026 के बाद विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) का सदस्य नहीं रहेगा। ट्रंप प्रशासन ने इससे पहले ही WHO से हटने की घोषणा कर दी थी, जिसके लिए आवश्यक एक वर्षीय नोटिस अवधि अब पूरी होने वाली है। अमेरिका लंबे समय से WHO पर पारदर्शिता और जवाबदेही की कमी के आरोप लगाता रहा है।
जलवायु मंचों से किनारा
अमेरिका अब संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज (UNFCCC) और इससे जुड़े अन्य जलवायु संस्थानों से भी अलग हो रहा है। यह वही मंच है, जो पेरिस जलवायु समझौते का आधार माना जाता है। ट्रंप पहले भी इस समझौते को अमेरिकी उद्योग और रोजगार के खिलाफ बता चुके हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु संगठनों से अमेरिका की दूरी वैश्विक प्रयासों को कमजोर कर सकती है, क्योंकि अमेरिका दुनिया के प्रमुख ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जक देशों में शामिल है।
भारत के लिए क्यों अहम
भारत की अगुआई में 2015 में शुरू हुए इंटरनेशनल सोलर अलायंस को स्वच्छ ऊर्जा सहयोग का अहम मंच माना जाता है। अमेरिका 2021 में इसका सदस्य बना था। अब उसका बाहर निकलना भारत के नेतृत्व वाली बहुपक्षीय पहल के लिए कूटनीतिक चुनौती के रूप में देखा जा रहा है, हालांकि ISA में 120 से अधिक देश अब भी सक्रिय हैं।
समर्थन और विरोध
पूर्व अमेरिकी जलवायु अधिकारियों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने इस फैसले की आलोचना की है। उनका कहना है कि इससे अमेरिका वैश्विक नेतृत्व की भूमिका खो सकता है। वहीं ट्रंप प्रशासन का तर्क है कि यह कदम अमेरिकी करदाताओं के हितों की रक्षा और राष्ट्रीय प्राथमिकताओं को मजबूत करने के लिए जरूरी है।
अमेरिकी विदेश विभाग ने संकेत दिए हैं कि अन्य अंतरराष्ट्रीय भागीदारी की समीक्षा भी जारी रहेगी। विशेषज्ञों के अनुसार, यह फैसला आने वाले समय में अमेरिका के वैश्विक रिश्तों, भारत-अमेरिका सहयोग और अंतर्राष्ट्रीय नीतिगत संतुलन को नए सिरे से परिभाषित कर सकता है।
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