दावोस में कनाडा का सख्त संदेश: अमेरिकी वर्चस्व का दौर समाप्त, वैश्विक ढांचा बिखराव की ओर

अंतराष्ट्रीय न्यूज

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वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम में पीएम मार्क कार्नी बोले—आर्थिक नीतियां बन रहीं दबाव का जरिया, देशों को आत्मनिर्भर और सतर्क होना होगा

कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था को लेकर एक निर्णायक बयान देते हुए कहा है कि अमेरिका के प्रभुत्व पर आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था अब अतीत बन चुकी है। स्विट्जरलैंड के दावोस में आयोजित वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम 2026 को संबोधित करते हुए उन्होंने साफ कहा कि दुनिया किसी सुधार के चरण में नहीं, बल्कि एक गहरे विघटन की स्थिति में प्रवेश कर चुकी है और पुरानी वैश्विक व्यवस्था के लौटने की उम्मीद करना व्यर्थ है।

मंगलवार को दिए गए अपने भाषण में कार्नी ने कहा कि जिस नियम-आधारित वैश्विक प्रणाली की लंबे समय से बात की जाती रही है, वह व्यवहार में कभी पूरी तरह लागू नहीं हो सकी। उनके अनुसार, अंतरराष्ट्रीय संबंध हमेशा शक्ति संतुलन और राष्ट्रीय हितों से संचालित रहे हैं। मौजूदा दौर में यह वास्तविकता और अधिक स्पष्ट हो गई है।

आर्थिक ताकत को बनाया जा रहा दबाव का माध्यम

प्रधानमंत्री कार्नी ने आरोप लगाया कि आज की वैश्विक राजनीति में आर्थिक औजारों का इस्तेमाल खुले तौर पर दबाव बनाने के लिए किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि टैरिफ अब केवल व्यापार नीति का हिस्सा नहीं रहे, बल्कि उन्हें रणनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है। इसके साथ ही वित्तीय तंत्र और सप्लाई चेन की कमजोरियों का लाभ उठाकर देशों को झुकाने की कोशिशें बढ़ी हैं।

उन्होंने चेताया कि अत्यधिक वैश्विक निर्भरता किसी भी देश की आर्थिक और राजनीतिक स्वतंत्रता के लिए जोखिम पैदा कर सकती है। हाल के वर्षों में सामने आए आर्थिक झटकों और भू-राजनीतिक तनावों ने यह साबित कर दिया है कि खुला बाजार हमेशा स्थिरता की गारंटी नहीं देता।

कनाडा के लिए नीति बदलाव की जरूरत

कार्नी ने स्वीकार किया कि पुराने वैश्विक ढांचे से कनाडा को लंबे समय तक लाभ मिला, लेकिन अब वह मॉडल टिकाऊ नहीं रह गया है। उन्होंने कहा कि यह मान लेना गलत होगा कि पारंपरिक गठबंधन ही हर परिस्थिति में सुरक्षा और समृद्धि सुनिश्चित करेंगे।

उनका जोर इस बात पर था कि कनाडा को ऐसी नीति अपनानी होगी जो सिद्धांतों के साथ-साथ व्यवहारिक जरूरतों पर भी खरी उतरे। इसके तहत घरेलू उत्पादन क्षमता बढ़ाने, ऊर्जा और खाद्य सुरक्षा को मजबूत करने और व्यापारिक साझेदारों के दायरे को व्यापक बनाने की आवश्यकता बताई गई।

बहुपक्षीय संस्थानों पर उठे सवाल

अपने संबोधन में कार्नी ने विश्व व्यापार संगठन और संयुक्त राष्ट्र जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की भूमिका पर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि इन संस्थाओं की प्रभावशीलता कमजोर पड़ने से देशों को अपनी बुनियादी जरूरतों के लिए आत्मनिर्भर होना पड़ रहा है।

“जो देश अपनी ऊर्जा, भोजन और सुरक्षा की व्यवस्था खुद नहीं कर सकता, उसके पास अंतरराष्ट्रीय मंच पर बहुत सीमित विकल्प बचते हैं,” उन्होंने कहा।

यूरोप की भी चिंता, फ्रांस का समर्थन

कार्नी के बयान से पहले फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने भी दावोस में इसी तरह की आशंका जताई थी। मैक्रों ने कहा था कि दुनिया ऐसे दौर की ओर बढ़ रही है जहां अंतरराष्ट्रीय कानूनों का सम्मान घट रहा है और ताकतवर देश अपनी शर्तें थोप रहे हैं। उन्होंने अमेरिका की व्यापार नीतियों को यूरोप की आर्थिक संप्रभुता के लिए चुनौती बताया था।

क्यों अहम है WEF 2026

19 से 23 जनवरी तक चल रहे वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम 2026 में 130 से अधिक देशों के नेता, नीति निर्माता और उद्योग जगत के प्रमुख शामिल हैं। युद्ध, व्यापार तनाव, आर्थिक अनिश्चितता और तकनीकी बदलावों के बीच यह मंच आने वाले वर्षों की वैश्विक दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा रहा है। भारत और ग्लोबल साउथ के लिए भी दावोस निवेश और रणनीतिक साझेदारी के लिहाज से खास माना जा रहा है।

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