"‘नशे से दूरी’ का नारा… मगर सड़कों पर छलकते जाम कौन रोके? पुलिस की मुहिम और सच्चाई में फर्क क्यों?"

विशेष टिप्पणी | देवेंद्र पटेल

भोपाल में 15 जुलाई से 30 जुलाई 2025 तक “नशे से दूरी – है जरूरी” नामक जन-जागरूकता अभियान ज़ोरशोर से चलाया जा रहा है। स्कूलों, कॉलेजों और सार्वजनिक स्थलों पर कार्यक्रम हो रहे हैं, पुलिस कमिश्नर विद्यार्थियों को शपथ दिला रहे हैं, पोस्टर विमोचित हो रहे हैं, और सोशल मीडिया पर खूब प्रचार भी हो रहा है।

लेकिन ज़मीनी सच्चाई इसके ठीक उलट तस्वीर पेश करती है — सड़कों पर देर रात तक खुलेआम छलकते जाम, शराब दुकानों के बाहर लगे हुजूम और बेपरवाह अड्डेबाज़ी इस अभियान को आइना दिखा रहे हैं।

पोस्टर चमके, लेकिन शराबी भी

पुलिस महानिदेशक श्री कैलाश मकवाणा ने इस मुहिम का आगाज़ मुख्यमंत्री जी के संदेश के साथ किया। उन्होंने कहा — "हम सभी की नैतिक जिम्मेदारी है कि किशोरों और युवाओं को नशे से दूर रखें।"

बिलकुल सही बात है, लेकिन सवाल ये है कि क्या नैतिक जिम्मेदारी सिर्फ पोस्टर विमोचन तक सीमित है?
क्या नशे की सबसे खुली और शर्मनाक तस्वीर जो रोज रात को शहर की सड़कों पर बनती है, उसे देखने की ज़िम्मेदारी किसी की नहीं?

शराब दुकानों के बाहर, सड़क ही बन गई ‘हाता’

भोपाल के कई हिस्सों, खासकर व्यस्त इलाकों जैसे चांदबड़, टीटी नगर, बैरागढ़, अवधपुरी, एमपी नगर में शराब दुकानों के बाहर भीड़ लगना आम है। दुकानें भले 11 बजे बंद हो जाएं, लेकिन शराब पीने वालों की ‘महफिल’ देर रात तक जारी रहती है।

सड़क किनारे ही गाड़ियों के बोनट पर गिलास सजते हैं, प्लास्टिक की कुर्सियां जमा दी जाती हैं, और वहाँ से गुजरने वाली हर महिला, बुजुर्ग, या बच्चा असहज हो जाता है।

ये क्या पुलिस नहीं देखती? या देखती है, लेकिन अनदेखा करती है?

स्कूलों में शिक्षा, सड़कों पर सज़ा क्यों नहीं?

भोपाल पुलिस स्कूल और कॉलेजों में बच्चों को नशे के दुष्परिणाम समझा रही है — ये प्रशंसनीय कदम है। लेकिन वे बच्चे घर लौटकर जब सड़क पर शराबियों को उन्मुक्त घूमते देखते हैं, तो संदेश क्या मिलेगा?

क्या पुलिस ने कभी उन दुकानों के बाहर खड़े होकर वहां पीने वालों को समझाया कि,
"भैया, शराब पीनी है तो घर जाकर पियो, सड़क को अहाता मत बनाओ?"

अगर नहीं, तो फिर इस अभियान की आत्मा कहां है?

कहीं पुलिस डरती तो नहीं?

सबसे चुभता हुआ सवाल यही है —
"सड़क पर खड़े शराबी पुलिस से नहीं डरते, बल्कि पुलिस ही उनसे डरती दिखती है।"
शायद इसलिए कि इनमें से कुछ रसूखदारों से जुड़े होते हैं, कोई किसी बड़े अधिकारी का साला, कोई नेता का ड्राइवर या कोई ब्लैक लिस्टेड लफंगा — जिसकी शिकायत लिखने से पहले पुलिस को दस बार सोचना पड़ता है।

मुहिम तब सफल होगी जब कार्रवाई ज़मीनी हो

'नशे से दूरी' की यह राज्यव्यापी मुहिम अगर वाकई सफल बनानी है, तो सिर्फ शपथ और स्लोगन से काम नहीं चलेगा।
ज़रूरत है कि —

  • शराब दुकानों के बाहर रात 9 बजे के बाद पुलिस की गश्त अनिवार्य हो।

  • सड़क पर शराब पीने वालों पर तत्काल जुर्माना और गिरफ्तारी की कार्रवाई हो।

  • हर थाना प्रभारी को जवाबदेह बनाया जाए कि उनके क्षेत्र में यह खुलेआम शराबखोरी न हो।

  • लाइसेंस शर्तों का उल्लंघन करने वाली दुकानों पर सस्पेंशन की सख्त नीति लागू हो।


भोपाल पुलिस की यह कोशिश अच्छी है, लेकिन सच्चाई यह है कि पोस्टर और शपथ से समाज नहीं बदलते, सड़क पर असर तभी दिखेगा जब वर्दी की सख्ती नज़र आएगी।

वरना "नशे से दूरी है जरूरी" की मुहिम भी साल-दर-साल 'फोटो खिंचाओ और भूल जाओ' अभियान बनकर रह जाएगी।


✍️ देवेंद्र पटेल

www.dainikjagranmpcg.com के लिए विशेष लेख

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www.dainikjagranmpcg.com
21 Jul 2025 By दैनिक जागरण

"‘नशे से दूरी’ का नारा… मगर सड़कों पर छलकते जाम कौन रोके? पुलिस की मुहिम और सच्चाई में फर्क क्यों?"

विशेष टिप्पणी | देवेंद्र पटेल

भोपाल में 15 जुलाई से 30 जुलाई 2025 तक “नशे से दूरी – है जरूरी” नामक जन-जागरूकता अभियान ज़ोरशोर से चलाया जा रहा है। स्कूलों, कॉलेजों और सार्वजनिक स्थलों पर कार्यक्रम हो रहे हैं, पुलिस कमिश्नर विद्यार्थियों को शपथ दिला रहे हैं, पोस्टर विमोचित हो रहे हैं, और सोशल मीडिया पर खूब प्रचार भी हो रहा है।

लेकिन ज़मीनी सच्चाई इसके ठीक उलट तस्वीर पेश करती है — सड़कों पर देर रात तक खुलेआम छलकते जाम, शराब दुकानों के बाहर लगे हुजूम और बेपरवाह अड्डेबाज़ी इस अभियान को आइना दिखा रहे हैं।

पोस्टर चमके, लेकिन शराबी भी

पुलिस महानिदेशक श्री कैलाश मकवाणा ने इस मुहिम का आगाज़ मुख्यमंत्री जी के संदेश के साथ किया। उन्होंने कहा — "हम सभी की नैतिक जिम्मेदारी है कि किशोरों और युवाओं को नशे से दूर रखें।"

बिलकुल सही बात है, लेकिन सवाल ये है कि क्या नैतिक जिम्मेदारी सिर्फ पोस्टर विमोचन तक सीमित है?
क्या नशे की सबसे खुली और शर्मनाक तस्वीर जो रोज रात को शहर की सड़कों पर बनती है, उसे देखने की ज़िम्मेदारी किसी की नहीं?

शराब दुकानों के बाहर, सड़क ही बन गई ‘हाता’

भोपाल के कई हिस्सों, खासकर व्यस्त इलाकों जैसे चांदबड़, टीटी नगर, बैरागढ़, अवधपुरी, एमपी नगर में शराब दुकानों के बाहर भीड़ लगना आम है। दुकानें भले 11 बजे बंद हो जाएं, लेकिन शराब पीने वालों की ‘महफिल’ देर रात तक जारी रहती है।

सड़क किनारे ही गाड़ियों के बोनट पर गिलास सजते हैं, प्लास्टिक की कुर्सियां जमा दी जाती हैं, और वहाँ से गुजरने वाली हर महिला, बुजुर्ग, या बच्चा असहज हो जाता है।

ये क्या पुलिस नहीं देखती? या देखती है, लेकिन अनदेखा करती है?

स्कूलों में शिक्षा, सड़कों पर सज़ा क्यों नहीं?

भोपाल पुलिस स्कूल और कॉलेजों में बच्चों को नशे के दुष्परिणाम समझा रही है — ये प्रशंसनीय कदम है। लेकिन वे बच्चे घर लौटकर जब सड़क पर शराबियों को उन्मुक्त घूमते देखते हैं, तो संदेश क्या मिलेगा?

क्या पुलिस ने कभी उन दुकानों के बाहर खड़े होकर वहां पीने वालों को समझाया कि,
"भैया, शराब पीनी है तो घर जाकर पियो, सड़क को अहाता मत बनाओ?"

अगर नहीं, तो फिर इस अभियान की आत्मा कहां है?

कहीं पुलिस डरती तो नहीं?

सबसे चुभता हुआ सवाल यही है —
"सड़क पर खड़े शराबी पुलिस से नहीं डरते, बल्कि पुलिस ही उनसे डरती दिखती है।"
शायद इसलिए कि इनमें से कुछ रसूखदारों से जुड़े होते हैं, कोई किसी बड़े अधिकारी का साला, कोई नेता का ड्राइवर या कोई ब्लैक लिस्टेड लफंगा — जिसकी शिकायत लिखने से पहले पुलिस को दस बार सोचना पड़ता है।

मुहिम तब सफल होगी जब कार्रवाई ज़मीनी हो

'नशे से दूरी' की यह राज्यव्यापी मुहिम अगर वाकई सफल बनानी है, तो सिर्फ शपथ और स्लोगन से काम नहीं चलेगा।
ज़रूरत है कि —

  • शराब दुकानों के बाहर रात 9 बजे के बाद पुलिस की गश्त अनिवार्य हो।

  • सड़क पर शराब पीने वालों पर तत्काल जुर्माना और गिरफ्तारी की कार्रवाई हो।

  • हर थाना प्रभारी को जवाबदेह बनाया जाए कि उनके क्षेत्र में यह खुलेआम शराबखोरी न हो।

  • लाइसेंस शर्तों का उल्लंघन करने वाली दुकानों पर सस्पेंशन की सख्त नीति लागू हो।


भोपाल पुलिस की यह कोशिश अच्छी है, लेकिन सच्चाई यह है कि पोस्टर और शपथ से समाज नहीं बदलते, सड़क पर असर तभी दिखेगा जब वर्दी की सख्ती नज़र आएगी।

वरना "नशे से दूरी है जरूरी" की मुहिम भी साल-दर-साल 'फोटो खिंचाओ और भूल जाओ' अभियान बनकर रह जाएगी।


✍️ देवेंद्र पटेल

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