490 करोड़ खर्च के बावजूद मध्य प्रदेश के बड़े शहरों में प्रदूषण बेलगाम, एनजीटी सख्त

भोपाल (म.प्र.)

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सीपीसीबी फंड का 85% उपयोग, फिर भी भोपाल सहित आठ नॉन-अटेनमेंट शहरों में हवा खतरनाक स्तर पर

मध्य प्रदेश के प्रमुख शहरों में वायु प्रदूषण लगातार गंभीर होता जा रहा है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) द्वारा वर्ष 2018-19 से 2022-23 के बीच प्रदूषण नियंत्रण के लिए राज्य को 570 करोड़ 50 लाख रुपये की राशि दी गई, जिसमें से 489 करोड़ 76 लाख रुपये यानी करीब 85.85 प्रतिशत खर्च किए जा चुके हैं। इसके बावजूद प्रदूषण का स्तर घटने के बजाय कई शहरों में और बढ़ गया है। यह स्थिति अब नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) तक पहुंच गई है।

यह खुलासा आरटीआई कार्यकर्ता राशिद नूर खान की याचिका पर एनजीटी की सेंट्रल जोन बेंच में सामने आया। मामले की गंभीरता को देखते हुए ट्रिब्यूनल ने राज्य सरकार और संबंधित एजेंसियों को नोटिस जारी कर छह सप्ताह के भीतर जवाब मांगा है। अगली सुनवाई 18 मार्च को तय की गई है।

सीपीसीबी ने भोपाल, इंदौर, ग्वालियर, जबलपुर, उज्जैन, देवास, सागर और सिंगरौली को ‘नॉन-अटेनमेंट सिटी’ घोषित किया है। ये वे शहर हैं, जहां वायु गुणवत्ता लगातार राष्ट्रीय परिवेशी वायु गुणवत्ता मानकों से ऊपर बनी हुई है। इन्हीं शहरों में प्रदूषण नियंत्रण के लिए केंद्र सरकार से फंड जारी किया गया था।

आंकड़ों के अनुसार, भोपाल में पीएम-10 का वार्षिक औसत स्तर 130 से 190 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर और पीएम-2.5 का स्तर 80 से 100 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर तक दर्ज किया गया। यह निर्धारित मानकों से कई गुना अधिक है। कई रातों में एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI) 300 के पार पहुंच गया, जो ‘बेहद खराब’ श्रेणी में आता है। विशेषज्ञों के मुताबिक, सर्द मौसम में स्मॉग और ठंडी हवा के कारण बुजुर्गों में ब्रेन स्ट्रोक का खतरा बढ़ जाता है।

खर्च की गई राशि की बात करें तो इंदौर को सबसे अधिक फंड मिला और वहां 190 करोड़ रुपये से ज्यादा खर्च किए गए। भोपाल, जबलपुर और उज्जैन जैसे शहरों में भी 85 से 90 प्रतिशत तक राशि उपयोग होने के बावजूद ठोस परिणाम सामने नहीं आए। पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि योजनाएं कागजों तक सीमित रहीं और जमीनी स्तर पर क्रियान्वयन कमजोर रहा।

प्रदूषण बढ़ने के पीछे कई कारण सामने आए हैं। इनमें पराली जलाना, निर्माण और विध्वंस कार्यों से उड़ती धूल, वाहनों का बढ़ता उत्सर्जन, खुले में कचरा जलाना, लैंडफिल साइटों में आग, पटाखों का उपयोग और औद्योगिक गतिविधियां प्रमुख हैं। इन सभी कारणों पर एक साथ प्रभावी नियंत्रण नहीं हो सका।

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08 Jan 2026 By Nitin Trivedi

490 करोड़ खर्च के बावजूद मध्य प्रदेश के बड़े शहरों में प्रदूषण बेलगाम, एनजीटी सख्त

भोपाल (म.प्र.)

मध्य प्रदेश के प्रमुख शहरों में वायु प्रदूषण लगातार गंभीर होता जा रहा है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) द्वारा वर्ष 2018-19 से 2022-23 के बीच प्रदूषण नियंत्रण के लिए राज्य को 570 करोड़ 50 लाख रुपये की राशि दी गई, जिसमें से 489 करोड़ 76 लाख रुपये यानी करीब 85.85 प्रतिशत खर्च किए जा चुके हैं। इसके बावजूद प्रदूषण का स्तर घटने के बजाय कई शहरों में और बढ़ गया है। यह स्थिति अब नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) तक पहुंच गई है।

यह खुलासा आरटीआई कार्यकर्ता राशिद नूर खान की याचिका पर एनजीटी की सेंट्रल जोन बेंच में सामने आया। मामले की गंभीरता को देखते हुए ट्रिब्यूनल ने राज्य सरकार और संबंधित एजेंसियों को नोटिस जारी कर छह सप्ताह के भीतर जवाब मांगा है। अगली सुनवाई 18 मार्च को तय की गई है।

सीपीसीबी ने भोपाल, इंदौर, ग्वालियर, जबलपुर, उज्जैन, देवास, सागर और सिंगरौली को ‘नॉन-अटेनमेंट सिटी’ घोषित किया है। ये वे शहर हैं, जहां वायु गुणवत्ता लगातार राष्ट्रीय परिवेशी वायु गुणवत्ता मानकों से ऊपर बनी हुई है। इन्हीं शहरों में प्रदूषण नियंत्रण के लिए केंद्र सरकार से फंड जारी किया गया था।

आंकड़ों के अनुसार, भोपाल में पीएम-10 का वार्षिक औसत स्तर 130 से 190 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर और पीएम-2.5 का स्तर 80 से 100 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर तक दर्ज किया गया। यह निर्धारित मानकों से कई गुना अधिक है। कई रातों में एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI) 300 के पार पहुंच गया, जो ‘बेहद खराब’ श्रेणी में आता है। विशेषज्ञों के मुताबिक, सर्द मौसम में स्मॉग और ठंडी हवा के कारण बुजुर्गों में ब्रेन स्ट्रोक का खतरा बढ़ जाता है।

खर्च की गई राशि की बात करें तो इंदौर को सबसे अधिक फंड मिला और वहां 190 करोड़ रुपये से ज्यादा खर्च किए गए। भोपाल, जबलपुर और उज्जैन जैसे शहरों में भी 85 से 90 प्रतिशत तक राशि उपयोग होने के बावजूद ठोस परिणाम सामने नहीं आए। पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि योजनाएं कागजों तक सीमित रहीं और जमीनी स्तर पर क्रियान्वयन कमजोर रहा।

प्रदूषण बढ़ने के पीछे कई कारण सामने आए हैं। इनमें पराली जलाना, निर्माण और विध्वंस कार्यों से उड़ती धूल, वाहनों का बढ़ता उत्सर्जन, खुले में कचरा जलाना, लैंडफिल साइटों में आग, पटाखों का उपयोग और औद्योगिक गतिविधियां प्रमुख हैं। इन सभी कारणों पर एक साथ प्रभावी नियंत्रण नहीं हो सका।

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