प्रदूषण से जूझते मध्य प्रदेश में विकास की कीमत: लाखों पेड़ों की कटाई पर उठे सवाल

मध्य प्रदेश

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गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट वाले आठ शहरों में 6.5 लाख पेड़ कटने की तैयारी, विभिन्न परियोजनाओं में कुल 15 लाख पेड़ों पर संकट

मध्य प्रदेश में जहां वायु प्रदूषण लगातार खतरनाक स्तर पर पहुंच रहा है, वहीं विकास परियोजनाओं के नाम पर बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई प्रस्तावित है। राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण (एनजीटी) द्वारा राज्य के आठ शहरों को ‘गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट’ की श्रेणी में रखे जाने के बीच इन इलाकों में ही करीब 6.50 लाख पेड़ों के कटने की तैयारी ने चिंता बढ़ा दी है। विभिन्न सड़क, कोयला, ऊर्जा और परिवहन परियोजनाओं को मिलाकर प्रदेश में कुल लगभग 15 लाख पेड़ों पर आरी चलने की आशंका जताई जा रही है।

जिन शहरों में प्रदूषण का स्तर पहले ही खतरनाक बताया गया है, उनमें भोपाल, इंदौर, ग्वालियर, जबलपुर, उज्जैन, सिंगरौली, सागर और देवास शामिल हैं। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) के अनुसार इन शहरों में पीएम-10 का औसत स्तर 130 से 190 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर और पीएम-2.5 का स्तर 80 से 100 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर तक दर्ज किया गया है। इसके बावजूद इन्हीं क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे के विस्तार के लिए वर्षों पुराने पेड़ों को हटाने की योजना बनाई गई है।

सिंगरौली जिले में प्रस्तावित धिरौली कोल ब्लॉक परियोजना सबसे बड़े पर्यावरणीय जोखिमों में से एक मानी जा रही है। यहां करीब 1397 हेक्टेयर वन भूमि आवंटित की गई है, जिसमें से अधिकांश क्षेत्र घने जंगल का है। अब तक लगभग 35 हजार पेड़ काटे जा चुके हैं, जबकि करीब 5.70 लाख और पेड़ों के कटने का अनुमान है। यह इलाका पहले से ही कोयला खनन और ताप विद्युत परियोजनाओं के कारण प्रदूषण की मार झेल रहा है।

राजधानी भोपाल में अयोध्या बायपास को फोरलेन से 10 लेन में बदला जा रहा है। इस परियोजना में करीब 7,800 पेड़ों को हटाने की अनुमति दी गई है। इसके अलावा कोलार बायपास और बंगरसिया से भोजपुर तक सड़क निर्माण में भी सैकड़ों पेड़ पहले ही काटे जा चुके हैं। इंदौर में रीगल चौराहे पर मेट्रो स्टेशन निर्माण के लिए 1,200 से अधिक पेड़ों के कटने की तैयारी है, जबकि इंदौर–उज्जैन मार्ग के चौड़ीकरण में करीब 3,000 पेड़ प्रभावित होंगे।

ग्वालियर में थाटीपुर रीडेंसिफिकेशन योजना और अन्य सड़क परियोजनाओं में हजारों पुराने पेड़ हटाए जा चुके हैं या हटाए जाने वाले हैं। वहीं मंडला जिले में बसनिया डेम और उससे जुड़ी नहर व पावर प्रोजेक्ट के चलते लगभग 2,100 हेक्टेयर वन क्षेत्र प्रभावित होगा, जहां करीब 5 लाख पेड़ों के कटने का अनुमान है। डिंडोरी में नर्मदा पर प्रस्तावित राघवपुर बांध और महू–खंडवा रेलवे लाइन परियोजना भी बड़े पैमाने पर वन कटाई की वजह बन रही हैं।

पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि प्रदूषण से जूझ रहे शहरों में हरित आवरण कम होना सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट को और गंभीर बना सकता है। वहीं सरकार का तर्क है कि परियोजनाओं के बदले वृक्षारोपण किया जाएगा।

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www.dainikjagranmpcg.com
08 Jan 2026 By Nitin Trivedi

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मध्य प्रदेश में जहां वायु प्रदूषण लगातार खतरनाक स्तर पर पहुंच रहा है, वहीं विकास परियोजनाओं के नाम पर बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई प्रस्तावित है। राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण (एनजीटी) द्वारा राज्य के आठ शहरों को ‘गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट’ की श्रेणी में रखे जाने के बीच इन इलाकों में ही करीब 6.50 लाख पेड़ों के कटने की तैयारी ने चिंता बढ़ा दी है। विभिन्न सड़क, कोयला, ऊर्जा और परिवहन परियोजनाओं को मिलाकर प्रदेश में कुल लगभग 15 लाख पेड़ों पर आरी चलने की आशंका जताई जा रही है।

जिन शहरों में प्रदूषण का स्तर पहले ही खतरनाक बताया गया है, उनमें भोपाल, इंदौर, ग्वालियर, जबलपुर, उज्जैन, सिंगरौली, सागर और देवास शामिल हैं। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) के अनुसार इन शहरों में पीएम-10 का औसत स्तर 130 से 190 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर और पीएम-2.5 का स्तर 80 से 100 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर तक दर्ज किया गया है। इसके बावजूद इन्हीं क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे के विस्तार के लिए वर्षों पुराने पेड़ों को हटाने की योजना बनाई गई है।

सिंगरौली जिले में प्रस्तावित धिरौली कोल ब्लॉक परियोजना सबसे बड़े पर्यावरणीय जोखिमों में से एक मानी जा रही है। यहां करीब 1397 हेक्टेयर वन भूमि आवंटित की गई है, जिसमें से अधिकांश क्षेत्र घने जंगल का है। अब तक लगभग 35 हजार पेड़ काटे जा चुके हैं, जबकि करीब 5.70 लाख और पेड़ों के कटने का अनुमान है। यह इलाका पहले से ही कोयला खनन और ताप विद्युत परियोजनाओं के कारण प्रदूषण की मार झेल रहा है।

राजधानी भोपाल में अयोध्या बायपास को फोरलेन से 10 लेन में बदला जा रहा है। इस परियोजना में करीब 7,800 पेड़ों को हटाने की अनुमति दी गई है। इसके अलावा कोलार बायपास और बंगरसिया से भोजपुर तक सड़क निर्माण में भी सैकड़ों पेड़ पहले ही काटे जा चुके हैं। इंदौर में रीगल चौराहे पर मेट्रो स्टेशन निर्माण के लिए 1,200 से अधिक पेड़ों के कटने की तैयारी है, जबकि इंदौर–उज्जैन मार्ग के चौड़ीकरण में करीब 3,000 पेड़ प्रभावित होंगे।

ग्वालियर में थाटीपुर रीडेंसिफिकेशन योजना और अन्य सड़क परियोजनाओं में हजारों पुराने पेड़ हटाए जा चुके हैं या हटाए जाने वाले हैं। वहीं मंडला जिले में बसनिया डेम और उससे जुड़ी नहर व पावर प्रोजेक्ट के चलते लगभग 2,100 हेक्टेयर वन क्षेत्र प्रभावित होगा, जहां करीब 5 लाख पेड़ों के कटने का अनुमान है। डिंडोरी में नर्मदा पर प्रस्तावित राघवपुर बांध और महू–खंडवा रेलवे लाइन परियोजना भी बड़े पैमाने पर वन कटाई की वजह बन रही हैं।

पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि प्रदूषण से जूझ रहे शहरों में हरित आवरण कम होना सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट को और गंभीर बना सकता है। वहीं सरकार का तर्क है कि परियोजनाओं के बदले वृक्षारोपण किया जाएगा।

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