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जीवाजी विश्वविद्यालय में ₹100 करोड़ के विकास कार्य ठप, नगर निगम की अनुमति के बिना शुरू हुआ निर्माण
ग्वालियर (म.प्र.)
पीएम उषा योजना के तहत गर्ल्स हॉस्टल सहित कई प्रोजेक्ट रुके, समय पर काम न हुआ तो केंद्र को लौटानी पड़ सकती है राशि
ग्वालियर के जीवाजी विश्वविद्यालय में केंद्र सरकार की पीएम उषा (प्रधानमंत्री उच्चतर शिक्षा अभियान) योजना के तहत चल रहे लगभग ₹100 करोड़ के विकास कार्यों पर नगर निगम ने रोक लगा दी है। कारण स्पष्ट है—निर्माण कार्य शुरू करने से पहले नगर निगम से आवश्यक भवन अनुमति और अनापत्ति प्रमाण पत्र (एनओसी) नहीं लिया गया। यह कार्रवाई सामने आने के बाद विश्वविद्यालय प्रशासन, निर्माण एजेंसी और राज्य सरकार के बीच जिम्मेदारी को लेकर सवाल खड़े हो गए हैं।
इस रोक के दायरे में छात्राओं के लिए प्रस्तावित अत्याधुनिक हॉस्टल, शैक्षणिक और बुनियादी ढांचे से जुड़े अन्य निर्माण भी शामिल हैं। प्रशासनिक स्तर पर चिंता इस बात को लेकर है कि यदि काम तय समयसीमा में पूरा नहीं हुआ, तो केंद्र सरकार से मिली राशि वापस करने की स्थिति बन सकती है।
मुख्यमंत्री के भूमिपूजन के बाद भी अटका प्रोजेक्ट
करीब ₹30 करोड़ की लागत से बनने वाले गर्ल्स हॉस्टल का भूमिपूजन पिछले वर्ष मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने किया था। निर्माण की जिम्मेदारी मध्यप्रदेश भवन विकास निगम को सौंपी गई थी। योजना का उद्देश्य विश्वविद्यालय परिसर में छात्राओं के लिए सुरक्षित और आधुनिक आवास सुविधा उपलब्ध कराना है, ताकि उच्च शिक्षा में उनकी भागीदारी को बढ़ावा मिल सके।
कैसे सामने आया मामला
निर्माण कार्य कुछ समय से जारी था, लेकिन नगर निगम को जब इसकी जानकारी मिली, तो टीम ने मौके पर निरीक्षण किया। जांच में सामने आया कि नगर निगम की वैधानिक अनुमति के बिना निर्माण शुरू किया गया, जो नगर निगम अधिनियम और भवन निर्माण नियमों का उल्लंघन है। इसके बाद निगम ने तत्काल प्रभाव से काम रुकवा दिया।
छूट के दावे पर टकराव
विश्वविद्यालय प्रशासन का तर्क था कि शैक्षणिक संस्थानों के परिसर में होने वाले निर्माण के लिए नगर निगम की अनुमति आवश्यक नहीं होती। हालांकि, नगर निगम आयुक्त संघप्रिय ने इस दावे को खारिज करते हुए कहा कि उन्हें ऐसे किसी नियम की जानकारी नहीं है, जो विश्वविद्यालय को अनुमति प्रक्रिया से बाहर रखता हो।
उन्होंने स्पष्ट किया कि कानून सभी संस्थानों पर समान रूप से लागू होता है। आयुक्त ने उदाहरण देते हुए कहा कि जब नगर निगम स्वयं सरकारी योजनाओं के तहत निर्माण करता है, तब भी उसे नियमानुसार अनुमति लेनी पड़ती है।
शिक्षा और फंडिंग पर असर
विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला केवल प्रशासनिक लापरवाही तक सीमित नहीं है। यदि प्रोजेक्ट लंबे समय तक रुके रहते हैं, तो इसका सीधा असर शिक्षा ढांचे, छात्र सुविधाओं और केंद्रीय योजनाओं की विश्वसनीयता पर पड़ेगा। पीएम उषा योजना का उद्देश्य विश्वविद्यालयों को आधुनिक बनाना है, लेकिन प्रक्रियागत चूक इस लक्ष्य में बाधा बन सकती है।
आगे क्या?
नगर निगम का कहना है कि जैसे ही सभी वैधानिक अनुमति और दस्तावेज पूरे किए जाएंगे, निर्माण फिर से शुरू किया जा सकता है। वहीं विश्वविद्यालय प्रशासन अब समाधान की दिशा में प्रयासरत है, ताकि परियोजनाओं को दोबारा गति मिल सके और केंद्र सरकार की शर्तों का पालन सुनिश्चित हो।
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