दूषित पेयजल से मौतों पर हाईकोर्ट सख्त, इंदौर की छवि धूमिल होने पर जताई चिंता

इंदौर (म.प्र.)

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मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर पीठ ने राज्य सरकार और नगर निगम को लगाई फटकार, जरूरत पड़ी तो तय होगी आपराधिक जिम्मेदारी

दूषित पेयजल से हुई मौतों के मामले में मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर पीठ ने मंगलवार को राज्य सरकार और इंदौर नगर निगम को कड़ी फटकार लगाई। अदालत ने कहा कि इस घटना ने ‘देश के सबसे स्वच्छ शहर’ की पहचान को गंभीर रूप से नुकसान पहुंचाया है। कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा कि स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराना नागरिकों का मौलिक अधिकार है और इसमें किसी भी तरह की लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी। जरूरत पड़ने पर दोषी अधिकारियों की सिविल के साथ-साथ आपराधिक जिम्मेदारी भी तय की जा सकती है।

हाईकोर्ट में दूषित पानी से जुड़ी पांच याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई हुई। पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि पीड़ित परिवारों को दिया गया मुआवजा अपर्याप्त पाया गया, तो उसे बढ़ाने के निर्देश दिए जा सकते हैं। अदालत ने राज्य सरकार और नगर निगम से विस्तृत जवाब के साथ नई स्टेटस रिपोर्ट पेश करने को कहा है।

15 जनवरी को अगली सुनवाई, मुख्य सचिव तलब
हाईकोर्ट ने कहा कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार में स्वच्छ पेयजल का अधिकार भी शामिल है। इसकी अनदेखी को अदालत ने गंभीर अपराध की श्रेणी में माना। मामले की अगली सुनवाई 15 जनवरी को तय की गई है, जिसमें राज्य के मुख्य सचिव को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से उपस्थित रहने के आदेश दिए गए हैं।

अब तक 17 मौतें, हालात चिंताजनक
भागीरथपुरा इलाके में दूषित पानी पीने से अब तक 17 लोगों की मौत हो चुकी है। मंगलवार को उल्टी-दस्त के 38 नए मामले सामने आए, जिनमें से 6 मरीजों को अरबिंदो अस्पताल रेफर किया गया। स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों के मुताबिक कुल 110 मरीज विभिन्न अस्पतालों में भर्ती हैं। अब तक 421 मरीजों को इलाज के लिए लाया गया, जिनमें से 311 को छुट्टी दी जा चुकी है, जबकि 15 मरीज अभी भी आईसीयू में हैं।

शिकायतों की अनदेखी का आरोप
याचिकाकर्ताओं की ओर से कोर्ट को बताया गया कि 31 दिसंबर को ही हाईकोर्ट ने स्वच्छ पेयजल आपूर्ति सुनिश्चित करने के निर्देश दिए थे, इसके बावजूद प्रभावित क्षेत्रों में दूषित पानी की सप्लाई जारी रही। वरिष्ठ अधिवक्ता ने दलील दी कि यदि समय रहते शिकायतों पर कार्रवाई होती, तो यह जनहानि रोकी जा सकती थी।

पुरानी चेतावनियों के बावजूद नहीं हुए ठोस कदम
अदालत को यह भी जानकारी दी गई कि वर्ष 2022 में नई पाइपलाइन बिछाने का प्रस्ताव पास हुआ था, लेकिन फंड जारी न होने के कारण काम शुरू नहीं हो सका। इसके अलावा 2017-18 में लिए गए 60 जल नमूनों में से 59 पीने योग्य नहीं पाए गए थे। मध्यप्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की रिपोर्ट सामने होने के बावजूद ठोस सुधारात्मक कदम नहीं उठाए गए, जिससे हालात और बिगड़ते चले गए।

हाईकोर्ट की सख्ती के बाद अब यह देखना अहम होगा कि प्रशासन इस मामले में क्या ठोस कार्रवाई करता है और पीड़ितों को कब तक राहत मिलती है।

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