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ब्रज भूषण शरण सिंह के जन्मदिवस पर अयोध्या में राष्ट्र कथा का समापन, व्यक्तिगत उत्सव नहीं बल्कि सामाजिक संकल्प बना यह दिन
Digital Desk
अयोध्या की पावन भूमि पर आज केवल एक आयोजन का समापन नहीं हो रहा, बल्कि एक विचारधारा अपने उद्देश्य तक पहुंचती दिखाई दे रही है। 8 जनवरी — ब्रज भूषण शरण सिंह का जन्मदिवस — इस वर्ष किसी निजी उत्सव के रूप में नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना और राष्ट्रबोध के संकल्प के रूप में सामने आया है। इसी दिन अयोध्या में आयोजित आठ दिवसीय राष्ट्र कथा महोत्सव अपने निष्कर्ष की ओर अग्रसर है।
1 जनवरी से आरंभ हुए इस महोत्सव का उद्देश्य शुरू से स्पष्ट रहा — युवाओं को दिशा देना, उन्हें भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों से जोड़ना और समाज में सकारात्मक विचारों की अलख जगाना। ब्रज भूषण शरण सिंह ने अपने जन्मदिवस को स्वयं के लिए नहीं, बल्कि समाज के नाम समर्पित करते हुए इस आयोजन की नींव रखी थी।
पिछले आठ दिनों में राष्ट्र कथा महोत्सव केवल धार्मिक आयोजन नहीं रहा, बल्कि आत्मचिंतन, संवाद और सामाजिक मंथन का मंच बन गया। प्रतिदिन राम कथा के माध्यम से अनुशासन, आत्मसंयम, कर्तव्यबोध, नैतिकता और राष्ट्रभाव जैसे विषयों को समकालीन जीवन से जोड़कर प्रस्तुत किया गया। बड़ी संख्या में युवा, श्रद्धालु और सामाजिक क्षेत्र से जुड़े लोग अयोध्या पहुंचे, जिससे आयोजन का स्वरूप लगातार व्यापक होता गया।
राष्ट्र कथा का वाचन परम पूज्य सद्गुरु श्री ऋतेश्वर महाराज द्वारा किया गया। उनके प्रवचन कथा को केवल आस्था तक सीमित नहीं रखते, बल्कि उसे आज के सामाजिक यथार्थ और व्यक्तिगत संघर्षों से जोड़ते हैं। कई अवसरों पर पूरा पंडाल भावनाओं और मौन आत्मचिंतन में डूबता नजर आया। ऐसे क्षण भी आए जब श्रोता केवल कथा नहीं सुन रहे थे, बल्कि स्वयं से संवाद कर रहे थे।
इन आठ दिनों में अयोध्या राष्ट्र कथा महोत्सव के माध्यम से सांस्कृतिक चेतना का केंद्र बनी रही। विभिन्न क्षेत्रों के प्रमुख व्यक्तित्वों की सहभागिता ने आयोजन को और प्रभावशाली बनाया। युवाओं की बड़ी भागीदारी यह संकेत देती रही कि यह कथा अपने मूल लक्ष्य — युवा सशक्तिकरण और राष्ट्रबोध — की दिशा में असर छोड़ रही है।
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आज, जब राष्ट्र कथा अपने अंतिम चरण में प्रवेश कर रही है, ब्रज भूषण शरण सिंह का जन्मदिवस इस आयोजन को विशेष अर्थ दे रहा है। यहां न तो भव्य व्यक्तिगत समारोह है, न ही औपचारिकता — बल्कि एक स्पष्ट संदेश है कि नेतृत्व का वास्तविक अर्थ समाज के प्रति उत्तरदायित्व से तय होता है।
अयोध्या में राष्ट्र कथा का यह समापन एक अंत नहीं, बल्कि उस विचार की शुरुआत माना जा रहा है जो इन आठ दिनों में स्थापित हुआ। यह आयोजन यह सिद्ध करता है कि जब जन्मदिवस जैसे निजी अवसर को समाज के नाम समर्पित किया जाता है, तब वह दिन उत्सव नहीं, बल्कि प्रेरणा, चेतना और परिवर्तन का माध्यम बन जाता है।
राम कथा सत्र के दौरान प्रक्षेत्र नंदिनी निकेतन में Pawan Singh, Dhananjay Singh, Ravindra Singh Bhati तथा Sushil Singh की उपस्थिति भी दर्ज की गई। आयोजकों और उपस्थित श्रद्धालुओं ने उनकी सहभागिता को सांस्कृतिक संवाद और मूल्य-आधारित चिंतन को प्रोत्साहित करने वाली पहल के प्रति समर्थन के रूप में सराहा। पर्यवेक्षकों के अनुसार, इन प्रमुख व्यक्तित्वों की मौजूदगी ने राष्ट्र कथा महोत्सव के इर्द-गिर्द सामूहिक सहभागिता को और सुदृढ़ किया तथा परंपरा, अनुशासन और सामाजिक चेतना पर केंद्रित मंचों में सार्वजनिक भागीदारी के महत्व को रेखांकित किया।
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