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पूर्व महापौर–पुलिस टकराव मामले में हाईकोर्ट की कड़ी टिप्पणी: कानून के रक्षक ही असुरक्षित तो व्यवस्था पर सवाल
जबलपुर (म.प्र.)
जबलपुर में पुलिसकर्मी से विवाद के मामले में हाईकोर्ट सख्त, एसपी और पूर्व मेयर सहित अधिकारियों को व्यक्तिगत रूप से पेश होने के निर्देश
जबलपुर में पूर्व महापौर और एक पुलिसकर्मी के बीच हुए विवाद को लेकर मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने पुलिस प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यदि थानों और सड़कों पर तैनात पुलिसकर्मी ही खुद को सुरक्षित महसूस नहीं कर रहे हैं, तो आम नागरिकों की सुरक्षा की उम्मीद कैसे की जा सकती है। यह टिप्पणी सितंबर 2025 की एक घटना से जुड़ी जनहित याचिका पर की गई, जिसमें पुलिस की निष्पक्षता और कार्रवाई की मंशा पर सवाल उठाए गए हैं।
चीफ जस्टिस संजीव सचदेवा और जस्टिस विनय सराफ की खंडपीठ ने मामले को गंभीर मानते हुए जबलपुर के पुलिस अधीक्षक, संबंधित थाना प्रभारी और पूर्व महापौर को नोटिस जारी किया है। कोर्ट ने सभी को 20 जनवरी को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने का निर्देश दिया है। साथ ही, घटना से जुड़ी एफआईआर और पूरी केस डायरी पेश करने के आदेश भी दिए गए हैं।
हाईकोर्ट ने प्रारंभिक सुनवाई में इस बात पर असंतोष जताया कि घटना का वीडियो सार्वजनिक रूप से सामने आने और कथित आरोपी की पहचान स्पष्ट होने के बावजूद प्राथमिकी अज्ञात व्यक्तियों के खिलाफ क्यों दर्ज की गई। न्यायालय ने पूछा कि जब साक्ष्य उपलब्ध थे, तब जिम्मेदार लोगों के नाम दर्ज करने से पुलिस क्यों बचती रही। कोर्ट ने इसे कानून के समान अनुप्रयोग के सिद्धांत के विपरीत माना।
याचिका में आरोप लगाया गया है कि विवाद के दौरान ड्यूटी पर तैनात पुलिसकर्मी के साथ अभद्रता हुई, लेकिन उसके बजाय उसी पुलिसकर्मी के खिलाफ कार्रवाई की गई। कथित तौर पर उसे निलंबित किया गया और उस पर भी मामला दर्ज किया गया। हाईकोर्ट ने इसे पुलिस बल के मनोबल को कमजोर करने वाला कदम बताया और कहा कि इससे पूरे तंत्र पर गलत संदेश जाता है।
यह मामला 18 सितंबर 2025 का है, जब शहर के एक प्रमुख चौराहे पर नियमित वाहन जांच के दौरान एक जनप्रतिनिधि और पुलिसकर्मी के बीच कहासुनी बढ़ गई थी। घटना का वीडियो बाद में सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुआ, जिसमें पुलिसकर्मी के साथ तीखी बहस और असंयमित व्यवहार के दृश्य सामने आए। इसके बाद इस पूरे घटनाक्रम को लेकर पुलिस की भूमिका पर सवाल उठने लगे।
जनहित याचिका में यह भी कहा गया है कि यदि प्रभावशाली व्यक्तियों के मामलों में पुलिस निष्पक्ष कार्रवाई नहीं करती, तो कानून के प्रति जनता का भरोसा कमजोर होता है। याचिकाकर्ता ने कोर्ट से यह सुनिश्चित करने की मांग की है कि कानून सभी के लिए समान रूप से लागू हो, चाहे व्यक्ति किसी भी पद या प्रभाव में क्यों न हो।
हाईकोर्ट ने संकेत दिए हैं कि अगली सुनवाई में जिम्मेदारी तय की जा सकती है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि पुलिसकर्मियों की गरिमा और सुरक्षा से कोई समझौता स्वीकार्य नहीं होगा। मामले की अगली सुनवाई अब 20 जनवरी को होगी, जिस पर पूरे राज्य की नजरें टिकी हैं।
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जबलपुर (म.प्र.)
जबलपुर में पूर्व महापौर और एक पुलिसकर्मी के बीच हुए विवाद को लेकर मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने पुलिस प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यदि थानों और सड़कों पर तैनात पुलिसकर्मी ही खुद को सुरक्षित महसूस नहीं कर रहे हैं, तो आम नागरिकों की सुरक्षा की उम्मीद कैसे की जा सकती है। यह टिप्पणी सितंबर 2025 की एक घटना से जुड़ी जनहित याचिका पर की गई, जिसमें पुलिस की निष्पक्षता और कार्रवाई की मंशा पर सवाल उठाए गए हैं।
चीफ जस्टिस संजीव सचदेवा और जस्टिस विनय सराफ की खंडपीठ ने मामले को गंभीर मानते हुए जबलपुर के पुलिस अधीक्षक, संबंधित थाना प्रभारी और पूर्व महापौर को नोटिस जारी किया है। कोर्ट ने सभी को 20 जनवरी को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने का निर्देश दिया है। साथ ही, घटना से जुड़ी एफआईआर और पूरी केस डायरी पेश करने के आदेश भी दिए गए हैं।
हाईकोर्ट ने प्रारंभिक सुनवाई में इस बात पर असंतोष जताया कि घटना का वीडियो सार्वजनिक रूप से सामने आने और कथित आरोपी की पहचान स्पष्ट होने के बावजूद प्राथमिकी अज्ञात व्यक्तियों के खिलाफ क्यों दर्ज की गई। न्यायालय ने पूछा कि जब साक्ष्य उपलब्ध थे, तब जिम्मेदार लोगों के नाम दर्ज करने से पुलिस क्यों बचती रही। कोर्ट ने इसे कानून के समान अनुप्रयोग के सिद्धांत के विपरीत माना।
याचिका में आरोप लगाया गया है कि विवाद के दौरान ड्यूटी पर तैनात पुलिसकर्मी के साथ अभद्रता हुई, लेकिन उसके बजाय उसी पुलिसकर्मी के खिलाफ कार्रवाई की गई। कथित तौर पर उसे निलंबित किया गया और उस पर भी मामला दर्ज किया गया। हाईकोर्ट ने इसे पुलिस बल के मनोबल को कमजोर करने वाला कदम बताया और कहा कि इससे पूरे तंत्र पर गलत संदेश जाता है।
यह मामला 18 सितंबर 2025 का है, जब शहर के एक प्रमुख चौराहे पर नियमित वाहन जांच के दौरान एक जनप्रतिनिधि और पुलिसकर्मी के बीच कहासुनी बढ़ गई थी। घटना का वीडियो बाद में सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुआ, जिसमें पुलिसकर्मी के साथ तीखी बहस और असंयमित व्यवहार के दृश्य सामने आए। इसके बाद इस पूरे घटनाक्रम को लेकर पुलिस की भूमिका पर सवाल उठने लगे।
जनहित याचिका में यह भी कहा गया है कि यदि प्रभावशाली व्यक्तियों के मामलों में पुलिस निष्पक्ष कार्रवाई नहीं करती, तो कानून के प्रति जनता का भरोसा कमजोर होता है। याचिकाकर्ता ने कोर्ट से यह सुनिश्चित करने की मांग की है कि कानून सभी के लिए समान रूप से लागू हो, चाहे व्यक्ति किसी भी पद या प्रभाव में क्यों न हो।
हाईकोर्ट ने संकेत दिए हैं कि अगली सुनवाई में जिम्मेदारी तय की जा सकती है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि पुलिसकर्मियों की गरिमा और सुरक्षा से कोई समझौता स्वीकार्य नहीं होगा। मामले की अगली सुनवाई अब 20 जनवरी को होगी, जिस पर पूरे राज्य की नजरें टिकी हैं।
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