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टीचर का मीम बनाने पर छात्र को स्कूल से निकालने का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, MP सरकार को नोटिस
इंदौर (म.प्र.)
इंदौर स्कूल द्वारा 13 वर्षीय छात्र के रस्टिकेशन पर शीर्ष अदालत सख्त, सजा की अनुपातिकता और बच्चे के भविष्य पर जताई चिंता
इंदौर के एक निजी स्कूल द्वारा शिक्षकों के कथित आपत्तिजनक मीम बनाने के आरोप में 13 वर्षीय छात्र को स्कूल से निकालने का मामला अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। शीर्ष अदालत ने इस प्रकरण में मध्य प्रदेश सरकार और अन्य पक्षकारों को नोटिस जारी करते हुए जवाब तलब किया है। न्यायमूर्ति बी. वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां की पीठ ने इस मामले की अगली सुनवाई 13 फरवरी को तय की है।
यह मामला उस समय सुर्खियों में आया, जब नवंबर 2024-25 के शैक्षणिक सत्र के बीच इंदौर के एक स्कूल ने कक्षा 9 में पढ़ने वाले छात्र को रस्टिकेट कर दिया। आरोप था कि छात्र ने शिक्षकों से जुड़े आपत्तिजनक मीम सोशल मीडिया पर साझा किए। स्कूल की इस कार्रवाई को मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में चुनौती दी गई थी, लेकिन वहां से राहत न मिलने के बाद छात्र के पिता ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान पीठ ने कहा कि बच्चे सामान्यतः अपने आसपास के सामाजिक और डिजिटल माहौल से व्यवहार सीखते हैं और इस तरह के मामलों में संतुलित दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिए। अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि सांप्रदायिक या आपत्तिजनक सामग्री को बढ़ावा देना स्वीकार्य नहीं है, लेकिन यह देखना भी जरूरी है कि लगाए गए आरोप कितने ठोस हैं और सजा कथित कदाचार के अनुपात में है या नहीं।
छात्र की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता निपुण सक्सेना ने दलील दी कि स्कूल द्वारा दी गई सजा अत्यधिक और असंगत है। उन्होंने कहा कि यह साबित नहीं किया गया कि मीम छात्र ने ही बनाए थे। संबंधित इंस्टाग्राम अकाउंट निजी था और कथित रूप से उसे तीन छात्रों द्वारा संचालित किया जा रहा था, जिन्हें सामूहिक रूप से दोषी ठहराया गया। इसके बावजूद स्कूल ने कठोरतम कदम उठाते हुए छात्रों को बाहर कर दिया।
याचिका में यह भी कहा गया है कि रस्टिकेशन के कारण छात्र की पढ़ाई बुरी तरह प्रभावित हुई है। ICSE बोर्ड के नियमों के अनुसार, कक्षा 10 के लिए पंजीकरण आमतौर पर कक्षा 9 के दौरान ही पूरा किया जाता है। ऐसे में सत्र के बीच स्कूल से निकाले जाने से छात्र का 10वीं में रजिस्ट्रेशन और शैक्षणिक निरंतरता दोनों खतरे में पड़ गए हैं।
छात्र के पिता ने स्कूल के इस कदम को ‘प्रतिष्ठा की रक्षा’ के नाम पर उठाया गया अत्यधिक दंडात्मक निर्णय बताया है। याचिका में कहा गया है कि जिस सोशल मीडिया अकाउंट को आधार बनाकर कार्रवाई की गई, वह न तो सार्वजनिक था और न ही स्कूल प्रशासन की आधिकारिक पहुंच में। ऐसे में एक नाबालिग के खिलाफ आपराधिक कानून जैसी ‘रोकथाम’ की सोच लागू करना कानून के स्थापित सिद्धांतों के विपरीत है।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला स्कूल अनुशासन, बच्चों के अधिकार और डिजिटल व्यवहार के बीच संतुलन को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन सकता है। अब सुप्रीम कोर्ट के अंतिम निर्णय पर न सिर्फ संबंधित परिवार, बल्कि शिक्षा जगत और अभिभावकों की भी नजरें टिकी हैं।
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