44 महीने के उच्चतम स्तर पर थोक महंगाई, जून में WPI 9.87% पहुंची; खाद्य वस्तुओं की बढ़ती कीमतों ने बढ़ाई चिंता

बिजनेस डेस्क

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रोजमर्रा की जरूरत की चीजें और खाद्य उत्पाद हुए महंगे, फ्यूल सेक्टर में राहत; विशेषज्ञों ने आने वाले महीनों में कीमतों पर नजर रखने की दी सलाह

भारत में थोक महंगाई (Wholesale Price Index-WPI) ने जून 2026 में नया रिकॉर्ड दर्ज किया है। वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय द्वारा जारी ताजा आंकड़ों के अनुसार जून महीने में थोक महंगाई बढ़कर 9.87 प्रतिशत पर पहुंच गई, जो पिछले 44 महीनों का सबसे ऊंचा स्तर है। इससे पहले मई में यह 9.68 प्रतिशत दर्ज की गई थी, जबकि सितंबर 2022 में यह 10.70 प्रतिशत तक पहुंची थी। लगातार बढ़ती महंगाई ने बाजार, उद्योग और आम उपभोक्ताओं की चिंता बढ़ा दी है।

सरकार के अनुसार इस बढ़ोतरी की सबसे बड़ी वजह खाद्य पदार्थों और रोजमर्रा की जरूरत की वस्तुओं की कीमतों में आई तेजी है। हालांकि, फ्यूल और पावर सेक्टर में महंगाई दर में कुछ गिरावट देखने को मिली है, जिससे उद्योगों को आंशिक राहत मिल सकती है। इसके बावजूद वैश्विक परिस्थितियां, विशेषकर पश्चिम एशिया में जारी तनाव, भविष्य में ईंधन की कीमतों को फिर प्रभावित कर सकता है।

जून के आंकड़ों के अनुसार प्राथमिक वस्तुओं (Primary Articles) की महंगाई दर मई के 4.99 प्रतिशत से बढ़कर 7.00 प्रतिशत हो गई। इसमें फल, सब्जियां, अनाज और अन्य कृषि उत्पाद शामिल हैं। इसी तरह खाद्य वस्तुओं का सूचकांक (Food Index) भी 4.49 प्रतिशत से बढ़कर 6.14 प्रतिशत पर पहुंच गया। इसका सीधा असर आम लोगों की रसोई पर पड़ सकता है, क्योंकि रोजमर्रा में इस्तेमाल होने वाले खाद्य उत्पाद लगातार महंगे हो रहे हैं।

दूसरी ओर फ्यूल और पावर सेक्टर में राहत देखने को मिली। इस श्रेणी की महंगाई दर 30.33 प्रतिशत से घटकर 27.41 प्रतिशत रह गई। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में दोबारा तेजी आती है या वैश्विक तनाव बढ़ता है तो इसका असर ईंधन की कीमतों पर फिर दिखाई दे सकता है।

मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में फिलहाल स्थिरता बनी हुई है। इस श्रेणी की महंगाई दर 7.48 प्रतिशत पर बनी रही और इसमें कोई बड़ा बदलाव दर्ज नहीं किया गया। हालांकि उद्योग जगत का मानना है कि यदि कच्चे माल की कीमतें लगातार बढ़ती रहीं तो आने वाले महीनों में तैयार उत्पादों की लागत भी बढ़ सकती है।

थोक महंगाई का असर केवल उद्योगों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इसका प्रभाव धीरे-धीरे खुदरा बाजार तक पहुंचता है। जब उद्योगों की लागत बढ़ती है तो कंपनियां अक्सर अतिरिक्त खर्च का बोझ उपभोक्ताओं पर डाल देती हैं। ऐसे में आने वाले समय में कई वस्तुओं की खुदरा कीमतों में भी बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है।  थोक महंगाई में लगातार बढ़ोतरी भविष्य में खुदरा महंगाई (CPI) को भी प्रभावित कर सकती है। यदि खाद्य वस्तुओं की कीमतें लंबे समय तक ऊंची बनी रहती हैं तो आम परिवारों का मासिक बजट प्रभावित होगा। विशेष रूप से निम्न और मध्यम आय वर्ग पर इसका असर अधिक देखने को मिलेगा।

सरकार के लिए भी यह स्थिति चुनौतीपूर्ण मानी जा रही है। महंगाई को नियंत्रित करने के लिए सरकार टैक्स में कटौती, आयात-निर्यात नीति में बदलाव और आवश्यक वस्तुओं की उपलब्धता बढ़ाने जैसे कदम उठा सकती है। पहले भी कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आने पर सरकार ने पेट्रोल और डीजल पर एक्साइज ड्यूटी में कमी की थी, जिससे उपभोक्ताओं को राहत मिली थी।

वैश्विक बाजार की स्थिति भी भारतीय महंगाई को प्रभावित करती है। यदि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल, खाद्यान्न या अन्य आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में तेजी आती है तो उसका असर घरेलू बाजार पर भी पड़ता है। ऐसे में आने वाले महीनों में अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों पर सरकार और उद्योग दोनों की नजर बनी रहेगी।

भारत में महंगाई मापने के दो प्रमुख पैमाने हैं। पहला खुदरा महंगाई यानी कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (CPI), जो उपभोक्ताओं द्वारा चुकाई जाने वाली कीमतों को दर्शाता है। दूसरा थोक महंगाई यानी होलसेल प्राइस इंडेक्स (WPI), जो थोक बाजार में व्यापारियों के बीच वस्तुओं की कीमतों के आधार पर तय होता है।

थोक महंगाई में मैन्युफैक्चर्ड उत्पादों का सबसे अधिक 64.23 प्रतिशत वेटेज होता है। इसके अलावा प्राथमिक वस्तुओं की हिस्सेदारी 22.62 प्रतिशत और फ्यूल एवं पावर की हिस्सेदारी 13.15 प्रतिशत रहती है। वहीं खुदरा महंगाई में खाद्य वस्तुओं का योगदान सबसे अधिक होता है।

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14 Jul 2026 By Vaishnavi.J

44 महीने के उच्चतम स्तर पर थोक महंगाई, जून में WPI 9.87% पहुंची; खाद्य वस्तुओं की बढ़ती कीमतों ने बढ़ाई चिंता

बिजनेस डेस्क

भारत में थोक महंगाई (Wholesale Price Index-WPI) ने जून 2026 में नया रिकॉर्ड दर्ज किया है। वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय द्वारा जारी ताजा आंकड़ों के अनुसार जून महीने में थोक महंगाई बढ़कर 9.87 प्रतिशत पर पहुंच गई, जो पिछले 44 महीनों का सबसे ऊंचा स्तर है। इससे पहले मई में यह 9.68 प्रतिशत दर्ज की गई थी, जबकि सितंबर 2022 में यह 10.70 प्रतिशत तक पहुंची थी। लगातार बढ़ती महंगाई ने बाजार, उद्योग और आम उपभोक्ताओं की चिंता बढ़ा दी है।

सरकार के अनुसार इस बढ़ोतरी की सबसे बड़ी वजह खाद्य पदार्थों और रोजमर्रा की जरूरत की वस्तुओं की कीमतों में आई तेजी है। हालांकि, फ्यूल और पावर सेक्टर में महंगाई दर में कुछ गिरावट देखने को मिली है, जिससे उद्योगों को आंशिक राहत मिल सकती है। इसके बावजूद वैश्विक परिस्थितियां, विशेषकर पश्चिम एशिया में जारी तनाव, भविष्य में ईंधन की कीमतों को फिर प्रभावित कर सकता है।

जून के आंकड़ों के अनुसार प्राथमिक वस्तुओं (Primary Articles) की महंगाई दर मई के 4.99 प्रतिशत से बढ़कर 7.00 प्रतिशत हो गई। इसमें फल, सब्जियां, अनाज और अन्य कृषि उत्पाद शामिल हैं। इसी तरह खाद्य वस्तुओं का सूचकांक (Food Index) भी 4.49 प्रतिशत से बढ़कर 6.14 प्रतिशत पर पहुंच गया। इसका सीधा असर आम लोगों की रसोई पर पड़ सकता है, क्योंकि रोजमर्रा में इस्तेमाल होने वाले खाद्य उत्पाद लगातार महंगे हो रहे हैं।

दूसरी ओर फ्यूल और पावर सेक्टर में राहत देखने को मिली। इस श्रेणी की महंगाई दर 30.33 प्रतिशत से घटकर 27.41 प्रतिशत रह गई। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में दोबारा तेजी आती है या वैश्विक तनाव बढ़ता है तो इसका असर ईंधन की कीमतों पर फिर दिखाई दे सकता है।

मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में फिलहाल स्थिरता बनी हुई है। इस श्रेणी की महंगाई दर 7.48 प्रतिशत पर बनी रही और इसमें कोई बड़ा बदलाव दर्ज नहीं किया गया। हालांकि उद्योग जगत का मानना है कि यदि कच्चे माल की कीमतें लगातार बढ़ती रहीं तो आने वाले महीनों में तैयार उत्पादों की लागत भी बढ़ सकती है।

थोक महंगाई का असर केवल उद्योगों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इसका प्रभाव धीरे-धीरे खुदरा बाजार तक पहुंचता है। जब उद्योगों की लागत बढ़ती है तो कंपनियां अक्सर अतिरिक्त खर्च का बोझ उपभोक्ताओं पर डाल देती हैं। ऐसे में आने वाले समय में कई वस्तुओं की खुदरा कीमतों में भी बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है।  थोक महंगाई में लगातार बढ़ोतरी भविष्य में खुदरा महंगाई (CPI) को भी प्रभावित कर सकती है। यदि खाद्य वस्तुओं की कीमतें लंबे समय तक ऊंची बनी रहती हैं तो आम परिवारों का मासिक बजट प्रभावित होगा। विशेष रूप से निम्न और मध्यम आय वर्ग पर इसका असर अधिक देखने को मिलेगा।

सरकार के लिए भी यह स्थिति चुनौतीपूर्ण मानी जा रही है। महंगाई को नियंत्रित करने के लिए सरकार टैक्स में कटौती, आयात-निर्यात नीति में बदलाव और आवश्यक वस्तुओं की उपलब्धता बढ़ाने जैसे कदम उठा सकती है। पहले भी कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आने पर सरकार ने पेट्रोल और डीजल पर एक्साइज ड्यूटी में कमी की थी, जिससे उपभोक्ताओं को राहत मिली थी।

वैश्विक बाजार की स्थिति भी भारतीय महंगाई को प्रभावित करती है। यदि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल, खाद्यान्न या अन्य आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में तेजी आती है तो उसका असर घरेलू बाजार पर भी पड़ता है। ऐसे में आने वाले महीनों में अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों पर सरकार और उद्योग दोनों की नजर बनी रहेगी।

भारत में महंगाई मापने के दो प्रमुख पैमाने हैं। पहला खुदरा महंगाई यानी कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (CPI), जो उपभोक्ताओं द्वारा चुकाई जाने वाली कीमतों को दर्शाता है। दूसरा थोक महंगाई यानी होलसेल प्राइस इंडेक्स (WPI), जो थोक बाजार में व्यापारियों के बीच वस्तुओं की कीमतों के आधार पर तय होता है।

थोक महंगाई में मैन्युफैक्चर्ड उत्पादों का सबसे अधिक 64.23 प्रतिशत वेटेज होता है। इसके अलावा प्राथमिक वस्तुओं की हिस्सेदारी 22.62 प्रतिशत और फ्यूल एवं पावर की हिस्सेदारी 13.15 प्रतिशत रहती है। वहीं खुदरा महंगाई में खाद्य वस्तुओं का योगदान सबसे अधिक होता है।

https://www.dainikjagranmpcg.com/business/wholesale-inflation-reached-the-highest-level-of-44-months-wpi/article-58711

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