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भोजशाला विवाद: सुप्रीम कोर्ट ने नमाज पर रोक रखी बरकरार, ASI को ढांचा न बदलने के निर्देश
Digital Desk
केंद्र सरकार की योजनाओं में साझेदारी दिलाने का दिया था भरोसा, पति की मौत के बाद महिला ने एसपी कार्यालय पहुंचकर निष्पक्ष जांच और सख्त कार्रवाई की मांग की
धार स्थित ऐतिहासिक भोजशाला परिसर को लेकर लंबे समय से चल रहे कानूनी विवाद में मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में महत्वपूर्ण सुनवाई हुई। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देने वाली मुस्लिम पक्ष की याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए सर्वोच्च अदालत ने फिलहाल भोजशाला परिसर में शुक्रवार की नमाज की अनुमति देने से इनकार कर दिया। हालांकि अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि अंतिम फैसला आने तक नमाजियों के लिए परिसर के आसपास वैकल्पिक स्थान उपलब्ध कराने की व्यवस्था पर विचार किया जाए।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) को भी स्पष्ट निर्देश दिया कि भोजशाला परिसर में किसी भी प्रकार का ढांचागत या संरचनात्मक बदलाव नहीं किया जाएगा। अदालत ने कहा कि विवादित स्थल की वर्तमान स्थिति को बनाए रखना आवश्यक है और किसी भी प्रकार के निर्माण या परिवर्तन से बचा जाए।
यह मामला उस फैसले से जुड़ा है, जिसमें मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने भोजशाला परिसर को लेकर कई महत्वपूर्ण निर्देश दिए थे। हाईकोर्ट के आदेश के बाद मुस्लिम पक्ष ने सर्वोच्च अदालत का दरवाजा खटखटाते हुए कहा कि पिछले लगभग 40 वर्षों से जिस व्यवस्था के तहत शुक्रवार को नमाज अदा की जाती रही है, उसे अचानक समाप्त कर दिया गया है। याचिका में पुरानी स्थिति बहाल करने और नमाज की अनुमति देने की मांग की गई थी।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ, जिसमें न्यायमूर्ति जॉयमाला बागची और न्यायमूर्ति मोहना भी शामिल थे, ने दोनों पक्षों की दलीलें विस्तार से सुनीं। सुनवाई के दौरान अदालत ने हिंदू पक्ष, मध्यप्रदेश सरकार, जिला प्रशासन और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण को नोटिस जारी करते हुए जवाब मांगा। मामले की अगली सुनवाई जुलाई के तीसरे सप्ताह में होगी।
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से पूछा कि क्या भोजशाला परिसर के आसपास ऐसी कोई जगह उपलब्ध कराई जा सकती है, जहां शुक्रवार को मुस्लिम समुदाय नमाज अदा कर सके। अदालत ने कहा कि जब तक मामले का अंतिम फैसला नहीं हो जाता, तब तक अंतरिम व्यवस्था के तौर पर वैकल्पिक स्थान उपलब्ध कराया जाना एक व्यावहारिक समाधान हो सकता है।
मुख्य न्यायाधीश ने यह भी कहा कि अदालत पहले भी बसंत पंचमी के अवसर पर दोनों समुदायों के धार्मिक अधिकारों को ध्यान में रखते हुए अंतरिम व्यवस्था कर चुकी है। हालांकि अब हाईकोर्ट का अंतिम फैसला सामने आ चुका है, इसलिए परिस्थितियां पहले जैसी नहीं हैं।
मुस्लिम पक्ष की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता हुजेफा अहमदी और अभिषेक मनु सिंघवी ने पक्ष रखा। उन्होंने अदालत को बताया कि वर्ष 1935 से मुस्लिम समुदाय इस परिसर में नमाज अदा करता रहा है और पिछले करीब चार दशक से यह व्यवस्था बिना किसी विवाद के चल रही थी। उनका कहना था कि हाईकोर्ट के फैसले के बाद अचानक इस पर रोक लगा दी गई, जिससे समुदाय के धार्मिक अधिकार प्रभावित हुए हैं।
वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने यह भी कहा कि हाईकोर्ट का फैसला ऐसे समय सुनाया गया कि तत्काल राहत लेने का अवसर भी नहीं मिल सका। उनके अनुसार फैसले के अगले ही दिन अवकाश होने के कारण दशकों से चली आ रही व्यवस्था अचानक समाप्त हो गई।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने मध्यप्रदेश हाईकोर्ट के उस निर्देश पर भी सवाल उठाए, जिसमें लंदन के संग्रहालय से मां वाग्देवी (सरस्वती) की प्रतिमा वापस लाने की बात कही गई थी। न्यायमूर्ति जॉयमाला बागची ने टिप्पणी करते हुए पूछा कि कोई संवैधानिक अदालत इस प्रकार का निर्देश किस आधार पर दे सकती है। अदालत ने इस पहलू पर भी विस्तार से विचार करने की बात कही।
वहीं, हिंदू पक्ष का कहना है कि भोजशाला ऐतिहासिक और धार्मिक दृष्टि से मां वाग्देवी का प्राचीन मंदिर है और लंबे समय से इस परिसर में पूजा-अर्चना होती रही है। उनका तर्क है कि हाईकोर्ट ने उपलब्ध ऐतिहासिक और पुरातात्विक साक्ष्यों के आधार पर फैसला सुनाया है और उसमें हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है।
भोजशाला विवाद कई दशकों से न्यायालयों में विचाराधीन है और इसे मध्यप्रदेश के सबसे संवेदनशील धार्मिक मामलों में गिना जाता है। यह परिसर ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और धार्मिक दृष्टि से विशेष महत्व रखता है। दोनों समुदाय इस स्थल पर अपने-अपने धार्मिक अधिकारों का दावा करते रहे हैं, जिसके कारण समय-समय पर प्रशासन को विशेष सुरक्षा व्यवस्था करनी पड़ती है।
सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट कर दिया है कि हाईकोर्ट के फैसले पर तत्काल रोक नहीं लगाई जाएगी। साथ ही अदालत ने विवादित परिसर में किसी भी तरह के निर्माण या संरचनात्मक बदलाव पर रोक लगाकर यथास्थिति बनाए रखने के निर्देश दिए हैं। अदालत का मानना है कि अंतिम निर्णय आने तक सभी पक्षों के अधिकारों और संवेदनशीलता का संतुलन बनाए रखना जरूरी है।
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भोजशाला विवाद: सुप्रीम कोर्ट ने नमाज पर रोक रखी बरकरार, ASI को ढांचा न बदलने के निर्देश
Digital Desk
धार स्थित ऐतिहासिक भोजशाला परिसर को लेकर लंबे समय से चल रहे कानूनी विवाद में मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में महत्वपूर्ण सुनवाई हुई। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देने वाली मुस्लिम पक्ष की याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए सर्वोच्च अदालत ने फिलहाल भोजशाला परिसर में शुक्रवार की नमाज की अनुमति देने से इनकार कर दिया। हालांकि अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि अंतिम फैसला आने तक नमाजियों के लिए परिसर के आसपास वैकल्पिक स्थान उपलब्ध कराने की व्यवस्था पर विचार किया जाए।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) को भी स्पष्ट निर्देश दिया कि भोजशाला परिसर में किसी भी प्रकार का ढांचागत या संरचनात्मक बदलाव नहीं किया जाएगा। अदालत ने कहा कि विवादित स्थल की वर्तमान स्थिति को बनाए रखना आवश्यक है और किसी भी प्रकार के निर्माण या परिवर्तन से बचा जाए।
यह मामला उस फैसले से जुड़ा है, जिसमें मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने भोजशाला परिसर को लेकर कई महत्वपूर्ण निर्देश दिए थे। हाईकोर्ट के आदेश के बाद मुस्लिम पक्ष ने सर्वोच्च अदालत का दरवाजा खटखटाते हुए कहा कि पिछले लगभग 40 वर्षों से जिस व्यवस्था के तहत शुक्रवार को नमाज अदा की जाती रही है, उसे अचानक समाप्त कर दिया गया है। याचिका में पुरानी स्थिति बहाल करने और नमाज की अनुमति देने की मांग की गई थी।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ, जिसमें न्यायमूर्ति जॉयमाला बागची और न्यायमूर्ति मोहना भी शामिल थे, ने दोनों पक्षों की दलीलें विस्तार से सुनीं। सुनवाई के दौरान अदालत ने हिंदू पक्ष, मध्यप्रदेश सरकार, जिला प्रशासन और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण को नोटिस जारी करते हुए जवाब मांगा। मामले की अगली सुनवाई जुलाई के तीसरे सप्ताह में होगी।
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से पूछा कि क्या भोजशाला परिसर के आसपास ऐसी कोई जगह उपलब्ध कराई जा सकती है, जहां शुक्रवार को मुस्लिम समुदाय नमाज अदा कर सके। अदालत ने कहा कि जब तक मामले का अंतिम फैसला नहीं हो जाता, तब तक अंतरिम व्यवस्था के तौर पर वैकल्पिक स्थान उपलब्ध कराया जाना एक व्यावहारिक समाधान हो सकता है।
मुख्य न्यायाधीश ने यह भी कहा कि अदालत पहले भी बसंत पंचमी के अवसर पर दोनों समुदायों के धार्मिक अधिकारों को ध्यान में रखते हुए अंतरिम व्यवस्था कर चुकी है। हालांकि अब हाईकोर्ट का अंतिम फैसला सामने आ चुका है, इसलिए परिस्थितियां पहले जैसी नहीं हैं।
मुस्लिम पक्ष की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता हुजेफा अहमदी और अभिषेक मनु सिंघवी ने पक्ष रखा। उन्होंने अदालत को बताया कि वर्ष 1935 से मुस्लिम समुदाय इस परिसर में नमाज अदा करता रहा है और पिछले करीब चार दशक से यह व्यवस्था बिना किसी विवाद के चल रही थी। उनका कहना था कि हाईकोर्ट के फैसले के बाद अचानक इस पर रोक लगा दी गई, जिससे समुदाय के धार्मिक अधिकार प्रभावित हुए हैं।
वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने यह भी कहा कि हाईकोर्ट का फैसला ऐसे समय सुनाया गया कि तत्काल राहत लेने का अवसर भी नहीं मिल सका। उनके अनुसार फैसले के अगले ही दिन अवकाश होने के कारण दशकों से चली आ रही व्यवस्था अचानक समाप्त हो गई।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने मध्यप्रदेश हाईकोर्ट के उस निर्देश पर भी सवाल उठाए, जिसमें लंदन के संग्रहालय से मां वाग्देवी (सरस्वती) की प्रतिमा वापस लाने की बात कही गई थी। न्यायमूर्ति जॉयमाला बागची ने टिप्पणी करते हुए पूछा कि कोई संवैधानिक अदालत इस प्रकार का निर्देश किस आधार पर दे सकती है। अदालत ने इस पहलू पर भी विस्तार से विचार करने की बात कही।
वहीं, हिंदू पक्ष का कहना है कि भोजशाला ऐतिहासिक और धार्मिक दृष्टि से मां वाग्देवी का प्राचीन मंदिर है और लंबे समय से इस परिसर में पूजा-अर्चना होती रही है। उनका तर्क है कि हाईकोर्ट ने उपलब्ध ऐतिहासिक और पुरातात्विक साक्ष्यों के आधार पर फैसला सुनाया है और उसमें हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है।
भोजशाला विवाद कई दशकों से न्यायालयों में विचाराधीन है और इसे मध्यप्रदेश के सबसे संवेदनशील धार्मिक मामलों में गिना जाता है। यह परिसर ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और धार्मिक दृष्टि से विशेष महत्व रखता है। दोनों समुदाय इस स्थल पर अपने-अपने धार्मिक अधिकारों का दावा करते रहे हैं, जिसके कारण समय-समय पर प्रशासन को विशेष सुरक्षा व्यवस्था करनी पड़ती है।
सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट कर दिया है कि हाईकोर्ट के फैसले पर तत्काल रोक नहीं लगाई जाएगी। साथ ही अदालत ने विवादित परिसर में किसी भी तरह के निर्माण या संरचनात्मक बदलाव पर रोक लगाकर यथास्थिति बनाए रखने के निर्देश दिए हैं। अदालत का मानना है कि अंतिम निर्णय आने तक सभी पक्षों के अधिकारों और संवेदनशीलता का संतुलन बनाए रखना जरूरी है।
