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आईटीआरएचडी का 12वां वार्षिक शिल्प महोत्सव नई दिल्ली में संपन्न, ₹50 लाख के पार हुई विक्री
डिजिटल डेस्क
आईटीआरएचडी की प्रोजेक्ट्स डायरेक्टर, मधु खत्री ने कारीगरों के लिए प्रत्यक्ष बाज़ार संपर्क के दीर्घकालिक प्रभाव को रेखांकित किया
इंडियन ट्रस्ट फॉर रूरल हेरिटेज एंड डेवलपमेंट (आईटीआरएचडी) द्वारा आयोजित 12वां वार्षिक शिल्प महोत्सव नई दिल्ली में संपन्न हुआ। चार दिवसीय इस आयोजन ने राजस्थान के सीमावर्ती ज़िलों और पूर्वी उत्तर प्रदेश के ग्रामीण इलाकों के कारीगरों को सीधे शहरी बाज़ारों से जोड़ा। इसके परिणामस्वरूप रिकॉर्ड बिक्री दर्ज की गई और खरीदारों की मज़बूत भागीदारी देखने को मिली।
एलायंस फ़्रांसेज़, लोदी एस्टेट, नई दिल्ली में आयोजित इस महोत्सव में कारीगरों को बिना किसी बिचौलिए के सीधे खरीदारों से संवाद और बिक्री का अवसर मिला। आयोजकों के अनुसार, प्रदर्शनी के दौरान कुल बिक्री ₹50 लाख से अधिक रही, जिससे यह संस्करण अब तक का सबसे सफल आयोजन बन गया—चाहे वह व्यावसायिक परिणाम हों या कारीगरों को मिली दृश्यता।
महोत्सव में राजस्थान के पश्चिमी हिस्से में भारत–पाकिस्तान सीमा के पास स्थित बाड़मेर ज़िले के शिल्प के साथ-साथ उत्तर प्रदेश के आज़मगढ़ ज़िले की विविध सांस्कृतिक परंपराओं को प्रदर्शित किया गया। बाड़मेर के कारीगरों ने कढ़ाई, एप्लिके कार्य, चमड़ा शिल्प, धरी बुनाई और अजरख प्रिंटिंग जैसी पारंपरिक कलाओं का प्रदर्शन किया। वहीं आज़मगढ़ के मुबारकपुर की हथकरघा बुनाई और निज़ामाबाद की प्रसिद्ध काली मिट्टी की कुम्हारी कला भी प्रदर्शनी का हिस्सा रहीं। इन प्रस्तुतियों ने एनसीआर के दर्शकों को उन शिल्प परंपराओं से परिचित कराया, जो भौगोलिक और आर्थिक रूप से हाशिए पर स्थित क्षेत्रों में विकसित हुई हैं।
महोत्सव के नतीजों पर प्रतिक्रिया देते हुए मॉरीन लीब्ल, सह-परियोजना निदेशक एवं ट्रस्टी, आईटीआरएचडी ने कहा, “इस वर्ष मिली प्रतिक्रिया ने हमारे इस विश्वास को और मजबूत किया है कि जब कारीगरों को सीधे बाज़ार तक पहुँच मिलती है, तो उसके परिणाम सकारात्मक होते हैं। ₹50 लाख का आंकड़ा पार करना केवल आर्थिक उपलब्धि नहीं है, बल्कि यह हस्तनिर्मित शिल्प के प्रति बढ़ती सार्वजनिक रुचि और कारीगर समुदायों के साथ वर्षों से किए जा रहे निरंतर प्रयासों को भी दर्शाता है।”
वहीं आईटीआरएचडी की प्रोजेक्ट्स डायरेक्टर ने कहा, “ यह तथ्य इस संस्करण को खास बनाता है कि कारीगरों को अपनी बिक्री से होने वाली पूरी आय सीधे प्राप्त हुई। आय सृजन के साथ-साथ यह महोत्सव कारीगरों और खरीदारों के बीच लंबे समय के संबंध बनाने में भी मदद करता है, जो इन शिल्प परंपराओं के बने रहने के लिए ज़रूरी है।”
उत्तर प्रदेश से प्रदर्शित निज़ामाबाद की काली मिट्टी की कुम्हारी कला महोत्सव का एक प्रमुख आकर्षण रही। पिछले एक दशक में यह शिल्प पुनर्जीवन का एक अहम उदाहरण बनकर उभरी है। जून 2022 में जर्मनी में आयोजित जी7 शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा जापान के प्रधानमंत्री फुमियो किशिदा को यह शिल्प भेंट किए जाने के बाद इसे अंतरराष्ट्रीय पहचान मिली। प्रदर्शनी में प्रदर्शित कई कृतियाँ उसी मूल कारीगर परिवार के सदस्यों द्वारा बनाई गई थीं, जो इस शिल्प के पुनर्जीवन से जुड़े रहे हैं।
आज़मगढ़ से मुबारकपुर की हथकरघा बुनाई परंपरा—जो लंबे समय से बनारसी साड़ियों से जुड़ी रही है—के साथ-साथ हरिहरपुर गांव की सांस्कृतिक विरासत भी महोत्सव में शामिल रही। हरिहरपुर अपनी शास्त्रीय संगीत परंपरा के लिए जाना जाता है, जो बनारस घराने से जुड़ी है। महोत्सव के दौरान आयोजित एक विशेष शास्त्रीय संगीत प्रस्तुति ने प्रदर्शनी को सांस्कृतिक विस्तार दिया।
आईटीआरएचडी पिछले छह - सात वर्षों से बाड़मेर के कारीगरों के साथ लगातार काम कर रहा है और हर साल भागीदारी का दायरा बढ़ाया जा रहा है। प्रदर्शनी के अलावा, ट्रस्ट डिज़ाइन सहयोग, उत्पाद विविधीकरण और विभिन्न मंचों तक पहुँच के ज़रिए कारीगरों का समर्थन करता है। साथ ही, भागीदारी से जुड़े खर्च भी वहन करता है, ताकि कारीगरों को बिक्री से होने वाला पूरा लाभ मिल सके।
अपने 12वें वर्ष में प्रवेश कर चुका यह वार्षिक शिल्प महोत्सव अब नई दिल्ली के सांस्कृतिक कैलेंडर का एक नियमित और महत्वपूर्ण आयोजन बन चुका है। इसके साथ ही, आईटीआरएचडी जोधपुर के मेहरानगढ़ किले में भी इसी तरह का एक वार्षिक शिल्प आयोजन करता है, जहाँ किले के ट्रस्टीज़ द्वारा स्थान उपलब्ध कराया जाता है, ताकि राजस्थान के कारीगरों के साथ निरंतर जुड़ाव बना रहे।
इस वर्ष की मज़बूत भागीदारी, रिकॉर्ड बिक्री और बढ़ती सार्वजनिक रुचि यह दिखाती है कि बाज़ार से जुड़े और सांस्कृतिक रूप से संवेदनशील मंच भारत की जीवंत शिल्प परंपराओं के संरक्षण के साथ-साथ कारीगरों के लिए सम्मानजनक आजीविका सुनिश्चित करने में अहम भूमिका निभाते हैं।
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