11 जनवरी और टाइप 1 डायबिटीज़: इंसुलिन की खोज से भारत में जागरूकता आंदोलन तक

डिजिटल डेस्क

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इंसुलिन की पहली खुराक की ऐतिहासिक तारीख़ पर टाइप 1 डायबिटीज़ को लेकर देश में बढ़ता संवाद, ग्रामीण स्वास्थ्य और इंसुलिन पहुंच बना केंद्र

11 जनवरी को दुनिया भर में इंसुलिन की पहली सफल खुराक की वर्षगांठ के रूप में याद किया जाता है। 1922 में इसी दिन इंसुलिन के उपयोग ने डायबिटीज़ को लगभग घातक बीमारी से एक नियंत्रित रोग में बदल दिया था। भारत में यह तारीख़ अब टाइप 1 डायबिटीज़ को लेकर बढ़ती स्वास्थ्य चिंता, जागरूकता और नीति संवाद के संदर्भ में भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, भारत में टाइप 1 डायबिटीज़ से प्रभावित बच्चों और युवाओं की संख्या लगातार बढ़ रही है, लेकिन समय पर पहचान और उपचार अब भी बड़ी चुनौती बना हुआ है। खासकर ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों में लक्षणों की पहचान देर से होती है, जिससे स्थिति गंभीर हो जाती है। इसी पृष्ठभूमि में 11 जनवरी को केंद्र बनाकर टाइप 1 डायबिटीज़ पर सार्वजनिक संवाद तेज़ हुआ है।

इस चर्चा के केंद्र में सामाजिक और स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़ी पहलें भी रही हैं। मेवाड़ की पद्मजा कुमारी परमार, जो स्वयं टाइप 1 डायबिटीज़ से प्रभावित हैं, लंबे समय से इस विषय पर जमीनी स्तर पर काम कर रही हैं। पाँच वर्ष की उम्र में बीमारी की पहचान के बाद उन्होंने व्यक्तिगत अनुभव को सार्वजनिक स्वास्थ्य संवाद से जोड़ा। उनका कहना है कि टाइप 1 डायबिटीज़ को केवल चिकित्सा समस्या के रूप में नहीं, बल्कि सामाजिक समझ के अभाव के रूप में भी देखा जाना चाहिए।

2024 और 2025 के दौरान राजस्थान के उदयपुर में टाइप 1 डायबिटीज़ को लेकर कई संवाद और बैठकों का आयोजन हुआ। ब्रेकथ्रू T1D (पूर्व में JDRF) के सहयोग से आयोजित बहु-हितधारक शिखर सम्मेलन में चिकित्सकों, स्वास्थ्य नीति विशेषज्ञों, सरकारी प्रतिनिधियों और रोगी संगठनों ने हिस्सा लिया।

विशेषज्ञों का कहना है कि टाइप 1 डायबिटीज़ को लेकर भ्रम अब भी व्यापक है। कई मामलों में इसे टाइप 2 डायबिटीज़ से जोड़कर देखा जाता है, जिससे इलाज में देरी होती है। इंसुलिन की अनियमित उपलब्धता, आर्थिक दबाव और सामाजिक कलंक स्थिति को और जटिल बनाते हैं।

पद्मजा कुमारी परमार द्वारा स्थापित द फ्रेंड्स ऑफ मेवाड़ संस्था के माध्यम से ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य शिविर, शुरुआती जांच और जागरूकता कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य नेटवर्क, जिसमें हार्वर्ड मेडिकल स्कूल से जुड़े विशेषज्ञ भी शामिल हैं, के साथ सहयोग से वैश्विक शोध और स्थानीय ज़रूरतों के बीच संवाद स्थापित किया गया है।

सम्मेलन में शामिल विशेषज्ञों ने कहा कि टाइप 1 डायबिटीज़ से जुड़ी नीतियों में रोगी-केंद्रित दृष्टिकोण अपनाने की ज़रूरत है। शुरुआती निदान, बच्चों के लिए स्कूल स्तर पर जागरूकता और इंसुलिन की निर्बाध आपूर्ति जैसे मुद्दों को प्राथमिकता देने पर सहमति बनी।

स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़े जानकारों का मानना है कि 11 जनवरी जैसी ऐतिहासिक तारीख़ को केवल चिकित्सा उपलब्धि के स्मरण तक सीमित नहीं रखा जाना चाहिए। इसे भारत में टाइप 1 डायबिटीज़ पर दीर्घकालिक नीति, सामाजिक जागरूकता और स्वास्थ्य ढांचे को मजबूत करने के अवसर के रूप में देखा जा रहा है।

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