प्रवासी भारतीय दिवस पर दोहरी नागरिकता की नई बहस: “कीप द डोर ओपन” अभियान के जरिए इंडियन डायस्पोरा ग्लोबल ने नीति संवाद की उठाई मांग

नई दिल्ली।

प्रवासी भारतीय दिवस के अवसर पर इंडियन डायस्पोरा ग्लोबल ने भारत और विदेशों में बसे भारतीय समुदाय के रिश्तों को नए सिरे से परिभाषित करने की जरूरत पर जोर दिया है। संगठन ने अपने वैश्विक अभियान “कीप द डोर ओपन” के माध्यम से भारत में दोहरी नागरिकता को लेकर एक व्यापक, तथ्य-आधारित और नीति-केंद्रित राष्ट्रीय संवाद शुरू करने की अपील की।

संगठन का कहना है कि आज जब लाखों भारतीय मूल के लोग विश्व के अलग-अलग देशों में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं, तब मौजूदा नागरिकता ढांचे पर पुनर्विचार समय की मांग बन गया है।


 क्या है इंडियन डायस्पोरा ग्लोबल?

इंडियन डायस्पोरा ग्लोबल एक अंतरराष्ट्रीय, गैर-पक्षपातपूर्ण मंच है, जिसका उद्देश्य दुनिया भर में बसे भारतीय मूल के लोगों को एक साझा मंच प्रदान करना है। इस पहल की परिकल्पना मेल्विन चिरायथ ने इस सोच के साथ की थी कि प्रवासी भारतीय केवल सांस्कृतिक पहचान तक सीमित न रहें, बल्कि नीति संवाद और राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया में भी सार्थक रूप से जुड़ें।


 “कीप द डोर ओपन” अभियान क्या कहता है?

“कीप द डोर ओपन” अभियान भारत में लंबे समय से लागू दोहरी नागरिकता पर प्रतिबंध की समीक्षा की मांग करता है। अभियान का मानना है कि मौजूदा व्यवस्था उस दौर की उपज है, जब वैश्वीकरण आज जितना व्यापक नहीं था।

अभियान स्पष्ट करता है कि यह पहल भारत की संप्रभुता को चुनौती नहीं देती, बल्कि एक ऐसे आधुनिक, सुरक्षित और संतुलित ढांचे की वकालत करती है, जिससे विदेशी नागरिकता लेने के बाद भी प्रवासी भारतीय भारत के साथ अपने औपचारिक और कानूनी संबंध बनाए रख सकें।


 मौजूदा कानून और बदलती वैश्विक हकीकत

फिलहाल भारतीय संविधान दोहरी नागरिकता की अनुमति नहीं देता। नागरिकता अधिनियम की धारा 9 के अनुसार, किसी अन्य देश की नागरिकता लेते ही भारतीय नागरिकता स्वतः समाप्त हो जाती है। वहीं, पासपोर्ट अधिनियम, 1967 के तहत विदेशी नागरिकता ग्रहण करने पर भारतीय पासपोर्ट सरेंडर करना अनिवार्य है।

संगठन का कहना है कि ये प्रावधान एक अलग वैश्विक संदर्भ में बनाए गए थे, लेकिन आज जब भारतीय पेशेवर, वैज्ञानिक, निवेशक और उद्यमी दुनिया भर में सक्रिय हैं, तब इनके सामाजिक और आर्थिक प्रभावों पर दोबारा विचार आवश्यक हो गया है।


 आंकड़े जो चिंता बढ़ाते हैं

हालिया सरकारी आंकड़े इस बहस को और गंभीर बनाते हैं। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक,

  • वर्ष 2021 में लगभग 1.63 लाख लोगों ने भारतीय नागरिकता छोड़ी,

  • 2020 में यह संख्या 85 हजार से अधिक रही,

  • जबकि 2019 में करीब 1.44 लाख लोगों ने नागरिकता त्यागी।

तीन वर्षों में ही लगभग चार लाख लोगों का भारतीय नागरिकता से बाहर जाना यह संकेत देता है कि मौजूदा व्यवस्था पर गहराई से मंथन की जरूरत है।


 “यह निष्ठा का नहीं, जुड़ाव का प्रश्न है” – मेल्विन चिरायथ

इंडियन डायस्पोरा ग्लोबल के चेयरमैन और संस्थापक मेल्विन चिरायथ ने कहा,
“दोहरी नागरिकता का मुद्दा निष्ठा बंटने का नहीं, बल्कि बदलती दुनिया में पहचान और जुड़ाव को समझने का सवाल है। जब कोई प्रवासी भारतीय नागरिकता छोड़ता है, तो केवल एक कानूनी रिश्ता ही नहीं टूटता, बल्कि आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक कड़ियां भी कमजोर होती हैं। ‘कीप द डोर ओपन’ अभियान ऐसी नीति की बात करता है, जो वैश्विक सच्चाई को स्वीकार करे और भारत के हितों की भी रक्षा करे।”


 सुरक्षा के साथ संतुलन संभव

अभियान से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि स्पष्ट नियमों और कड़े सुरक्षा प्रावधानों के साथ दोहरी नागरिकता का मॉडल तैयार किया जा सकता है। दुनिया के कई लोकतांत्रिक देशों ने राष्ट्रीय सुरक्षा से समझौता किए बिना इस दिशा में रास्ते निकाले हैं। भारत भी अपनी परिस्थितियों के अनुसार एक संतुलित व्यवस्था विकसित कर सकता है।


“प्रवासी भारतीय दिवस सिर्फ उत्सव नहीं” – मनोज शर्मा

इंडियन डायस्पोरा ग्लोबल के कम्युनिकेशंस एंड आउटरीच प्रेसिडेंट मनोज शर्मा ने कहा,
“प्रवासी भारतीय दिवस केवल सांस्कृतिक उत्सव नहीं होना चाहिए। यह आत्ममंथन का भी अवसर है। नागरिकता छोड़ने वालों की बढ़ती संख्या इस बात का संकेत है कि मौजूदा नीतियों पर गंभीर, गैर-पक्षपातपूर्ण और खुले संवाद की जरूरत है।”


अभियान यह भी स्पष्ट करता है कि वह विदेश जाने या वैश्विक अवसर अपनाने के फैसले का विरोध नहीं करता। उसका मूल सवाल केवल इतना है—क्या विदेशी नागरिकता लेने के बाद भारत के साथ सभी कानूनी और नागरिक संबंध पूरी तरह समाप्त हो जाने चाहिए, जबकि प्रवासी भारतीय आज भी निवेश, ज्ञान और वैश्विक प्रतिनिधित्व के जरिए देश के विकास में योगदान दे रहे हैं?


 

 
 

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