महाकुंभ से चर्चा में आईं हर्षा रिछारिया ने सनातन प्रचार से लिया विराम: बोलीं—धर्म के नाम पर स्त्री को रोका जा रहा

जबलपुर (म.प्र.)

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जबलपुर में मकर संक्रांति पर दिया बयान, कहा—एक साल संघर्ष किया, लेकिन विरोध और शक ने तोड़ा मनोबल

महाकुंभ से चर्चा में आईं एक्टर और मॉडल से साध्वी बनीं हर्षा रिछारिया ने सनातन धर्म के सार्वजनिक प्रचार से विराम लेने का ऐलान किया है। मकर संक्रांति के अवसर पर जबलपुर पहुंचीं हर्षा ने मीडिया से बातचीत में कहा कि पिछले एक साल से वे जिस धर्म प्रचार के रास्ते पर चल रही थीं, वहां उन्हें सबसे ज्यादा विरोध अपने ही धर्म से जुड़े लोगों से झेलना पड़ा। उन्होंने आरोप लगाया कि महिला होने के कारण उनके चरित्र और नीयत पर सवाल उठाए गए, जिससे अब उनका मनोबल टूट गया है।

हर्षा रिछारिया मां नर्मदा के दर्शन के लिए जबलपुर आई थीं। इसी दौरान उन्होंने खुलकर कहा कि सनातन धर्म को उन्होंने नहीं चुना, बल्कि सनातन ने उन्हें अपनाया था। हालांकि, जिन धर्मगुरुओं से आशीर्वाद और मार्गदर्शन की अपेक्षा थी, वही उनके विरोध में खड़े हो गए। हर्षा के अनुसार, जब धर्म के नाम पर ही एक महिला को लगातार संदेह और अपमान का सामना करना पड़े, तो अकेले संघर्ष करना आसान नहीं रह जाता।

उन्होंने कहा कि बीते एक साल में उन्होंने हर संभव प्रयास किया कि विवाद न बढ़े और सभी को साथ लेकर चला जाए, लेकिन हालात नहीं बदले। हर्षा ने यह भी स्पष्ट किया कि अभिनय और मॉडलिंग के क्षेत्र में रहते हुए उन्हें कभी इस तरह के विरोध या मानसिक दबाव का सामना नहीं करना पड़ा। उनके शब्दों में, “मुझे लगा था धर्म के रास्ते में शांति मिलेगी, लेकिन अब लगता है कि मेरा पुराना पेशा ही ज्यादा शांतिपूर्ण था।”

अपने आलोचकों को चुनौती देते हुए हर्षा रिछारिया ने कहा कि उन पर लगाए गए आरोप निराधार हैं। उन्होंने कहा कि अगर किसी को संदेह है तो वे उनके बैंक खाते और जीवनशैली की जांच कर सकते हैं। उनका आरोप है कि सत्ता और प्रभाव वाले कुछ लोग, जो “करोड़ों के सिंहासन” पर बैठे हैं, एक महिला के खिलाफ खड़े हो गए। उन्होंने सवाल उठाया कि अगर नारी के साथ ऐसा व्यवहार हो रहा है, तो यह किस तरह का धर्म है।

हर्षा ने समाज की सोच पर भी सीधा सवाल खड़ा किया। उन्होंने कहा कि देश आज भी पुरुष प्रधान मानसिकता से ग्रसित है, जहां कोई महिला अगर आध्यात्मिक या सामाजिक रूप से आगे बढ़ने की कोशिश करती है, तो उसे रोकने के लिए पहले उसके चरित्र पर हमला किया जाता है। उनके मुताबिक, यह सोच पौराणिक काल से चली आ रही है और आज भी जस की तस मौजूद है।

उन्होंने बताया कि मौनी अमावस्या के दिन माघ मेले में गंगा स्नान के बाद वे सार्वजनिक रूप से ‘हर-हर महादेव’ के उद्घोष के साथ अपने इस निर्णय को दोहराएंगी। हर्षा ने कहा कि यह फैसला अंतिम है और अब पुनर्विचार की कोई गुंजाइश नहीं बची है। उन्होंने यह भी कहा कि एक साल में उन्होंने जितना मानसिक तनाव झेला, उसका जवाब उनसे नहीं, बल्कि उन संतों से पूछा जाना चाहिए जिन्होंने उन्हें स्वीकार नहीं किया।

इस बयान के बाद हर्षा रिछारिया एक बार फिर चर्चा में आ गई हैं। उनके फैसले ने धर्म, समाज और स्त्री की भूमिका को लेकर नई बहस छेड़ दी है, जिसका असर आने वाले दिनों में और व्यापक रूप से देखने को मिल सकता है।

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14 Jan 2026 By Nitin Trivedi

महाकुंभ से चर्चा में आईं हर्षा रिछारिया ने सनातन प्रचार से लिया विराम: बोलीं—धर्म के नाम पर स्त्री को रोका जा रहा

जबलपुर (म.प्र.)

महाकुंभ से चर्चा में आईं एक्टर और मॉडल से साध्वी बनीं हर्षा रिछारिया ने सनातन धर्म के सार्वजनिक प्रचार से विराम लेने का ऐलान किया है। मकर संक्रांति के अवसर पर जबलपुर पहुंचीं हर्षा ने मीडिया से बातचीत में कहा कि पिछले एक साल से वे जिस धर्म प्रचार के रास्ते पर चल रही थीं, वहां उन्हें सबसे ज्यादा विरोध अपने ही धर्म से जुड़े लोगों से झेलना पड़ा। उन्होंने आरोप लगाया कि महिला होने के कारण उनके चरित्र और नीयत पर सवाल उठाए गए, जिससे अब उनका मनोबल टूट गया है।

हर्षा रिछारिया मां नर्मदा के दर्शन के लिए जबलपुर आई थीं। इसी दौरान उन्होंने खुलकर कहा कि सनातन धर्म को उन्होंने नहीं चुना, बल्कि सनातन ने उन्हें अपनाया था। हालांकि, जिन धर्मगुरुओं से आशीर्वाद और मार्गदर्शन की अपेक्षा थी, वही उनके विरोध में खड़े हो गए। हर्षा के अनुसार, जब धर्म के नाम पर ही एक महिला को लगातार संदेह और अपमान का सामना करना पड़े, तो अकेले संघर्ष करना आसान नहीं रह जाता।

उन्होंने कहा कि बीते एक साल में उन्होंने हर संभव प्रयास किया कि विवाद न बढ़े और सभी को साथ लेकर चला जाए, लेकिन हालात नहीं बदले। हर्षा ने यह भी स्पष्ट किया कि अभिनय और मॉडलिंग के क्षेत्र में रहते हुए उन्हें कभी इस तरह के विरोध या मानसिक दबाव का सामना नहीं करना पड़ा। उनके शब्दों में, “मुझे लगा था धर्म के रास्ते में शांति मिलेगी, लेकिन अब लगता है कि मेरा पुराना पेशा ही ज्यादा शांतिपूर्ण था।”

अपने आलोचकों को चुनौती देते हुए हर्षा रिछारिया ने कहा कि उन पर लगाए गए आरोप निराधार हैं। उन्होंने कहा कि अगर किसी को संदेह है तो वे उनके बैंक खाते और जीवनशैली की जांच कर सकते हैं। उनका आरोप है कि सत्ता और प्रभाव वाले कुछ लोग, जो “करोड़ों के सिंहासन” पर बैठे हैं, एक महिला के खिलाफ खड़े हो गए। उन्होंने सवाल उठाया कि अगर नारी के साथ ऐसा व्यवहार हो रहा है, तो यह किस तरह का धर्म है।

हर्षा ने समाज की सोच पर भी सीधा सवाल खड़ा किया। उन्होंने कहा कि देश आज भी पुरुष प्रधान मानसिकता से ग्रसित है, जहां कोई महिला अगर आध्यात्मिक या सामाजिक रूप से आगे बढ़ने की कोशिश करती है, तो उसे रोकने के लिए पहले उसके चरित्र पर हमला किया जाता है। उनके मुताबिक, यह सोच पौराणिक काल से चली आ रही है और आज भी जस की तस मौजूद है।

उन्होंने बताया कि मौनी अमावस्या के दिन माघ मेले में गंगा स्नान के बाद वे सार्वजनिक रूप से ‘हर-हर महादेव’ के उद्घोष के साथ अपने इस निर्णय को दोहराएंगी। हर्षा ने कहा कि यह फैसला अंतिम है और अब पुनर्विचार की कोई गुंजाइश नहीं बची है। उन्होंने यह भी कहा कि एक साल में उन्होंने जितना मानसिक तनाव झेला, उसका जवाब उनसे नहीं, बल्कि उन संतों से पूछा जाना चाहिए जिन्होंने उन्हें स्वीकार नहीं किया।

इस बयान के बाद हर्षा रिछारिया एक बार फिर चर्चा में आ गई हैं। उनके फैसले ने धर्म, समाज और स्त्री की भूमिका को लेकर नई बहस छेड़ दी है, जिसका असर आने वाले दिनों में और व्यापक रूप से देखने को मिल सकता है।

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