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एशिया-ओशिनिया में क्रिप्टो नियमन का नया दौर: लाइसेंसिंग, स्टेबलकॉइन और टोकनाइज़ेशन की ओर बढ़ता सिस्टम
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एशिया और ओशिनिया में क्रिप्टोकरेंसी को लेकर नीति-निर्माताओं की सोच अब निर्णायक रूप से बदल चुकी है। बहस अब इस सवाल पर नहीं टिकती कि डिजिटल एसेट्स को वित्तीय व्यवस्था का हिस्सा बनाया जाए या नहीं, बल्कि इस पर केंद्रित हो गई है कि इन्हें किस नियम-कानून और किस ढांचे के भीतर संचालित किया जाए।
क्षेत्र के अधिकांश देश अब स्टेबलकॉइन, टोकनाइज़्ड एसेट्स और लाइसेंस प्राप्त ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म्स के लिए स्पष्ट नियामकीय रास्ते तैयार कर रहे हैं। वहीं, अत्यधिक लीवरेज वाले प्रोडक्ट्स, केवल ऑफशोर मॉडल पर निर्भर कारोबार और कमजोर अनुपालन व्यवस्थाओं पर सख्ती लगातार बढ़ रही है। ऊपर से ये कदम अलग-अलग दिखाई दे सकते हैं, लेकिन गहराई से देखें तो यह वही पारंपरिक वित्तीय नियमन है, जो अलग-अलग गति से डिजिटल एसेट्स पर लागू हो रहा है—जिसमें लाइसेंसिंग, कस्टडी मानक, बाजार आचरण और टैक्स पारदर्शिता साझा आधार बनते जा रहे हैं।
उत्तर एशिया: क्रिप्टो को पूंजी बाजार के बराबर लाने की तैयारी
जून 2025 के बाद उत्तर एशिया में क्रिप्टो नियमन एक अहम मोड़ पर पहुंचा। जापान ने संकेत दिए कि वह क्रिप्टो को अब मुख्यधारा के वित्तीय उत्पाद की तरह देखेगा। स्पॉट क्रिप्टो ETF के लिए रास्ता खोलने और जटिल टैक्स ढांचे की जगह इक्विटी-जैसा सरल ढांचा अपनाने पर काम शुरू हुआ।
दक्षिण कोरिया ने भी रुख बदला। क्रिप्टो को सट्टा गतिविधि की श्रेणी से बाहर निकालकर नियंत्रित विकास वाले सेक्टर के रूप में देखा जाने लगा। 2025 के अंत तक स्पॉट क्रिप्टो ETF को मंजूरी देने का रोडमैप सामने आया। इसके साथ ही “बेसिक एक्ट” का मसौदा पेश किया गया, जिसमें वॉन-आधारित स्टेबलकॉइन जारी करने वालों के लिए पूंजी और लाइसेंस की स्पष्ट शर्तें तय की गईं। केंद्रीय बैंक ने साफ किया कि मौद्रिक संप्रभुता से समझौता किए बिना, बैंक-नेतृत्व वाला मॉडल ही प्राथमिकता रहेगा।
हांगकांग: वेब3 और पारंपरिक वित्त का संगम
हांगकांग ने ट्रेडिंग से आगे बढ़कर क्रिप्टो को फाइनेंशियल इंफ्रास्ट्रक्चर के रूप में देखने का रास्ता चुना। यहां नीति का फोकस स्टेबलकॉइन लाइसेंसिंग, टोकनाइज़्ड बॉन्ड और ETF, तथा पेशेवर निवेशकों के लिए नियंत्रित डेरिवेटिव्स पर रहा।
जुलाई-अगस्त तक यह नीति केवल घोषणा नहीं रही, बल्कि अमल में आई। स्टेबलकॉइन नियमों को अंतिम रूप दिया गया और टोकनाइज़्ड सरकारी बॉन्ड को नियमित फंडिंग चैनल के तौर पर स्थापित किया गया। इसके साथ ही निवेशकों को चेतावनी और KYC-प्राइवेसी को लेकर बहस भी तेज हुई—जो डिजिटल कैश के लिए बैंक-स्तरीय अनुपालन की झलक देती है।
सिंगापुर और खाड़ी देश: सख्ती के साथ अवसर
सिंगापुर ने अपनी “सख्त लेकिन खुली” छवि को और मजबूत किया। ऑफशोर ग्राहकों को सेवाएं देने वाली स्थानीय क्रिप्टो कंपनियों के लिए दोबारा लाइसेंसिंग अनिवार्य की गई। जो मानकों पर खरे नहीं उतरे, उन्हें बाजार छोड़ना पड़ा। वहीं, मजबूत गवर्नेंस और पर्याप्त पूंजी वाले खिलाड़ियों को लगातार मंजूरी मिलती रही।
इसी दौरान खाड़ी देशों ने स्टेबलकॉइन और टोकनाइज़्ड फंड्स के लिए दुनिया के सबसे स्पष्ट और संस्थागत ढांचे पेश किए। इससे ऑन-चेन कैश मैनेजमेंट और टोकनाइज़्ड ट्रेजरी जैसे उत्पादों को बढ़ावा मिला।
खुदरा निवेशक जोखिम पर लगाम
अगस्त में कई देशों ने रिटेल जोखिम को केंद्र में रखकर कदम उठाए। दक्षिण कोरिया ने नए क्रिप्टो लेंडिंग प्रोडक्ट्स पर रोक लगाई, जिससे संकेत मिला कि लीवरेज और हाई-यील्ड मॉडल्स को बिना व्यापक निगरानी के बढ़ने नहीं दिया जाएगा। जापान ने नियामित येन-आधारित स्टेबलकॉइन को मंजूरी दी और टैक्स व डिस्क्लोजर सुधारों के जरिए ऑनशोर गतिविधियों को प्रोत्साहित किया।
दक्षिण-पूर्व एशिया में संतुलित रणनीति अपनाई गई। थाईलैंड ने पर्यटकों के लिए क्रिप्टो-टू-बाह्ट रूपांतरण का पायलट शुरू किया। फिलीपींस ने बिना पंजीकरण वाले ऑफशोर एक्सचेंजों पर सख्ती दिखाई, जबकि वियतनाम ने बैंक-नेतृत्व वाले क्रिप्टो ढांचे को उपभोक्ता सुरक्षा का साधन बताया।
ऑस्ट्रेलिया-न्यूज़ीलैंड: इंफ्रास्ट्रक्चर-केंद्रित दृष्टि
ऑस्ट्रेलिया ने प्रवर्तन और सिस्टम डिज़ाइन को साथ लेकर चलने की नीति अपनाई। AUSTRAC ने AML और गवर्नेंस अपेक्षाओं को सख्त किया, जबकि ट्रेजरी ने नियमन का फोकस कस्टडी और प्लेटफॉर्म आचरण जैसे उच्च-जोखिम क्षेत्रों तक सीमित रखा। केंद्रीय बैंक की टोकनाइज़ेशन पहल ने स्टेबलकॉइन और डिपॉजिट टोकन को सट्टा संपत्ति नहीं, बल्कि वित्तीय इंफ्रास्ट्रक्चर के रूप में स्थापित किया।
न्यूज़ीलैंड ने अपेक्षाकृत शांत लेकिन स्पष्ट रुख अपनाया। AML नियमों के तहत ग्राहक जोखिम-रेटिंग को मजबूत किया गया और यह साफ किया गया कि अलग से क्रिप्टो कानून न होने का मतलब नियमन का अभाव नहीं है।
रूस, मध्य एशिया और भारत: नियंत्रण के साथ औपचारिकता
रूस और मध्य एशिया में नीति का मूल मंत्र है—जिसे रोका नहीं जा सकता, उसे औपचारिक दायरे में लाया जाए। माइनिंग उपकरणों का पंजीकरण, टैक्स और ऊर्जा निगरानी इसी दिशा के संकेत हैं।
भारत के हालिया कदम भी इसी वैश्विक पैटर्न से मेल खाते हैं। ऑफशोर एक्सचेंजों को AML अनुपालन न होने पर नोटिस, और बिना पंजीकरण वाले प्लेटफॉर्म्स तक पहुंच सीमित करने की कोशिशें तेज हुई हैं। अंतरराष्ट्रीय अनुभव यह बताता है कि भारत के लिए सबसे अहम है सुधारों का क्रम—पहले प्लेटफॉर्म और कस्टडी का ढांचा, फिर उपभोक्ता सुरक्षा, और अंत में टोकनाइज़ेशन व डिजिटल भुगतान के लिए नियामित रास्ते।
पूरे एशिया-ओशिनिया क्षेत्र में संदेश अब साफ है। क्रिप्टो हाशिए की बहस नहीं रहा। इसे दिशा दी जा रही है, नियमों में बांधा जा रहा है और धीरे-धीरे इसे वैश्विक वित्तीय प्रणाली के केंद्र में शामिल किया जा रहा है।
