हरसूद: एक डूबती सभ्यता की अमिट चीख

Opinion - डॉ. गोपालदास नायक

30 जून 2004 — यह महज एक तारीख नहीं, बल्कि एक जीवंत नगर की आखिरी सांस थी। मध्यप्रदेश के खंडवा जिले की ऐतिहासिक तहसील हरसूद, नर्मदा सागर परियोजना के जलप्रपात में समा गई। यह विकास था या विनाश? यह प्रश्न आज भी अनुत्तरित है।

हरसूद – जो केवल एक भूगोल नहीं था:
हरसूद सिर्फ नक्शे की एक बिंदी नहीं था। यह एक जीवंत इतिहास, एक समरस संस्कृति और परंपराओं की सजीव किताब था। यहाँ की गलियाँ संबंधों की धमनियाँ थीं, जहाँ मंदिर की घंटियाँ और मस्जिद की अज़ान एक साथ गूंजती थीं। यहाँ की रूह में रचती-बसी थी — विविधता में एकता।

विकास की कीमत:
इंदिरा सागर परियोजना को ऊर्जा और सिंचाई के नजरिये से "राष्ट्रीय हित" में बताया गया। लेकिन इन आकंड़ों की चमक के पीछे वे हज़ारों आंसू थे जो किसी भी विकास रिपोर्ट में नहीं झलकते। बिजली बनी, लेकिन उजाले में हज़ारों जिंदगियाँ बुझ गईं।

डूबा केवल नगर नहीं, बिखर गईं अस्मिताएँ:
हरसूद का डूबना केवल दीवारों का गिरना नहीं था, यह स्मृतियों, संबंधों और सामुदायिकता का चुपचाप बिखर जाना था। पुराने मोहल्ले — माचक, किशनपुरा, घोसी मोहल्ला — अब केवल यादों के भूगोल हैं।

नई बस्तियाँ, पर सुनी ज़िंदगी:
विस्थापितों को मिले नए घर, ज़मीनें और मुआवज़ा। परंतु जो नहीं मिला, वह था अपनापन। इन ईंटों के ढेर में वह अहसास नहीं था जो पुराने घर के आँगन की मिट्टी में था। यहाँ दरवाज़े थे, पर वो आवाज़ें नहीं जो कभी अपनापन देती थीं।

विस्थापन का मौन विलोपन:
हरसूद की त्रासदी, विकास के नाम पर सभ्यता के विलोपन की कहानी है। यह वह आत्महत्या थी, जिसे हज़ारों ने चुपचाप होते देखा। जिन आंखों में आंसू नहीं थे, वे भी सब कुछ कह रही थीं।

‘हरसूदी’ — अब एक पहचान:
21 वर्षों के बाद भी विस्थापितों को आज ‘हरसूदी’ कहा जाता है — यह नाम गाँव नहीं, विरासत का है। नए घरों में जन्मे बच्चे भी 30 जून को दीप जलाते हैं, माँ से पूछते हैं — “क्या हरसूद कभी लौटेगा?”

विकास बनाम विनाश:
हरसूद आज सवाल करता है —

  • क्या विकास केवल उत्पादन और ग्राफ़ हैं?

  • क्या सांस्कृतिक विरासत का कोई मुआवज़ा हो सकता है?

  • क्या जड़ों को काटकर फलदायी पेड़ की कल्पना की जा सकती है?

हरसूद एक चेतावनी है:
हरसूद एक भूगोल नहीं, एक भावना है — जो आज भी जीवित है लोकगीतों में, माँ की कहानियों में, त्योहारों की थालियों में और विस्थापितों की आंखों में। यह उन तमाम निर्णयकर्ताओं के लिए एक चेतावनी है, जो विकास के नाम पर इतिहास को मिटा देने पर आमादा हैं।

अंतिम वाक्य:
हरसूद अब कोई स्थान नहीं — वह संवेदना है। और संवेदनाएं कभी नहीं डूबतीं।

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30 Jun 2025 By दैनिक जागरण

हरसूद: एक डूबती सभ्यता की अमिट चीख

Opinion - डॉ. गोपालदास नायक

30 जून 2004 — यह महज एक तारीख नहीं, बल्कि एक जीवंत नगर की आखिरी सांस थी। मध्यप्रदेश के खंडवा जिले की ऐतिहासिक तहसील हरसूद, नर्मदा सागर परियोजना के जलप्रपात में समा गई। यह विकास था या विनाश? यह प्रश्न आज भी अनुत्तरित है।

हरसूद – जो केवल एक भूगोल नहीं था:
हरसूद सिर्फ नक्शे की एक बिंदी नहीं था। यह एक जीवंत इतिहास, एक समरस संस्कृति और परंपराओं की सजीव किताब था। यहाँ की गलियाँ संबंधों की धमनियाँ थीं, जहाँ मंदिर की घंटियाँ और मस्जिद की अज़ान एक साथ गूंजती थीं। यहाँ की रूह में रचती-बसी थी — विविधता में एकता।

विकास की कीमत:
इंदिरा सागर परियोजना को ऊर्जा और सिंचाई के नजरिये से "राष्ट्रीय हित" में बताया गया। लेकिन इन आकंड़ों की चमक के पीछे वे हज़ारों आंसू थे जो किसी भी विकास रिपोर्ट में नहीं झलकते। बिजली बनी, लेकिन उजाले में हज़ारों जिंदगियाँ बुझ गईं।

डूबा केवल नगर नहीं, बिखर गईं अस्मिताएँ:
हरसूद का डूबना केवल दीवारों का गिरना नहीं था, यह स्मृतियों, संबंधों और सामुदायिकता का चुपचाप बिखर जाना था। पुराने मोहल्ले — माचक, किशनपुरा, घोसी मोहल्ला — अब केवल यादों के भूगोल हैं।

नई बस्तियाँ, पर सुनी ज़िंदगी:
विस्थापितों को मिले नए घर, ज़मीनें और मुआवज़ा। परंतु जो नहीं मिला, वह था अपनापन। इन ईंटों के ढेर में वह अहसास नहीं था जो पुराने घर के आँगन की मिट्टी में था। यहाँ दरवाज़े थे, पर वो आवाज़ें नहीं जो कभी अपनापन देती थीं।

विस्थापन का मौन विलोपन:
हरसूद की त्रासदी, विकास के नाम पर सभ्यता के विलोपन की कहानी है। यह वह आत्महत्या थी, जिसे हज़ारों ने चुपचाप होते देखा। जिन आंखों में आंसू नहीं थे, वे भी सब कुछ कह रही थीं।

‘हरसूदी’ — अब एक पहचान:
21 वर्षों के बाद भी विस्थापितों को आज ‘हरसूदी’ कहा जाता है — यह नाम गाँव नहीं, विरासत का है। नए घरों में जन्मे बच्चे भी 30 जून को दीप जलाते हैं, माँ से पूछते हैं — “क्या हरसूद कभी लौटेगा?”

विकास बनाम विनाश:
हरसूद आज सवाल करता है —

  • क्या विकास केवल उत्पादन और ग्राफ़ हैं?

  • क्या सांस्कृतिक विरासत का कोई मुआवज़ा हो सकता है?

  • क्या जड़ों को काटकर फलदायी पेड़ की कल्पना की जा सकती है?

हरसूद एक चेतावनी है:
हरसूद एक भूगोल नहीं, एक भावना है — जो आज भी जीवित है लोकगीतों में, माँ की कहानियों में, त्योहारों की थालियों में और विस्थापितों की आंखों में। यह उन तमाम निर्णयकर्ताओं के लिए एक चेतावनी है, जो विकास के नाम पर इतिहास को मिटा देने पर आमादा हैं।

अंतिम वाक्य:
हरसूद अब कोई स्थान नहीं — वह संवेदना है। और संवेदनाएं कभी नहीं डूबतीं।

https://www.dainikjagranmpcg.com/opinion/harsuds-indelible-scream-of-a-sinking-civilization/article-26027

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