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सकट चौथ पर क्यों दी गई थी मासूम की बलि? जानें वह पौराणिक कथा, जिसने संतानों को दिया जीवनदान
धर्म डेस्क
सकट चौथ का व्रत कथा के बिना अधूरा माना जाता है। कुम्हार और वृद्धा से जुड़ी यह कथा संतान रक्षा, आस्था और संकट निवारण का प्रतीक मानी जाती है।
आज देशभर में सकट चौथ का पर्व श्रद्धा और आस्था के साथ मनाया जा रहा है। यह व्रत विशेष रूप से माताओं द्वारा संतान की लंबी आयु, स्वास्थ्य और जीवन में आने वाले संकटों से रक्षा के लिए रखा जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, सकट चौथ का व्रत तब तक पूर्ण नहीं माना जाता, जब तक इसकी पौराणिक कथा का पाठ न किया जाए।
शास्त्रों और लोक परंपराओं में प्रचलित सकट चौथ की कथा एक कुम्हार और एक वृद्धा से जुड़ी हुई है। कथा के अनुसार, प्राचीन काल में एक नगर में एक कुम्हार रहता था, जो मिट्टी के बर्तन पकाने के लिए भट्टी लगाता था। लेकिन बार-बार प्रयास के बावजूद बर्तन ठीक से नहीं पकते थे। परेशान होकर उसने राजा से शिकायत की। जब इस समस्या का कारण जानने के लिए ज्योतिषीय सलाह ली गई, तो एक भयावह समाधान बताया गया—भट्टी जलाने से पहले बालक की बलि।
राजकीय आदेश के डर से नगर में यह अमानवीय परंपरा शुरू हो गई। समय बीतने के साथ कई निर्दोष बच्चों की बलि दी गई। इसी क्रम में एक दिन एक निर्धन वृद्धा के इकलौते पुत्र की बारी आई। वही पुत्र उसका एकमात्र सहारा था। संयोगवश वह दिन सकट चौथ का था। वृद्धा ने विलाप करने के बजाय अपने आराध्य पर पूर्ण विश्वास रखा। उसने अपने बेटे को तिल और सुपारी देकर कहा कि संकट की घड़ी में विघ्नहर्ता का स्मरण करना।
कथा के अनुसार, बालक को जलती हुई भट्टी में बैठा दिया गया। उधर वृद्धा पूरी रात दीप जलाकर प्रार्थना करती रही और व्रत का पालन करती रही। अगली सुबह जब भट्टी खोली गई, तो दृश्य देखकर नगरवासी स्तब्ध रह गए। न केवल सभी बर्तन सही तरीके से पक चुके थे, बल्कि वह बालक सुरक्षित बाहर बैठा मिला। इतना ही नहीं, पहले जिन बच्चों की बलि दी गई थी, वे भी जीवित प्रकट हुए।
इस घटना को विघ्नहर्ता की कृपा माना गया और नगर में भय का स्थान भक्ति ने ले लिया। तभी से सकट चौथ को संतान संकट निवारण का व्रत माना जाने लगा। इस कथा का संदेश यह है कि कठिन से कठिन परिस्थिति में भी विश्वास और श्रद्धा व्यक्ति को आशा का मार्ग दिखाते हैं।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, आज के दिन चंद्रोदय के बाद अर्घ्य देकर परिवार के साथ इस कथा का पाठ करना शुभ माना जाता है। माना जाता है कि इससे घर में सुख-शांति बनी रहती है और संतान पर आने वाले संकट दूर होते हैं।
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आज देशभर में सकट चौथ का पर्व श्रद्धा और आस्था के साथ मनाया जा रहा है। यह व्रत विशेष रूप से माताओं द्वारा संतान की लंबी आयु, स्वास्थ्य और जीवन में आने वाले संकटों से रक्षा के लिए रखा जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, सकट चौथ का व्रत तब तक पूर्ण नहीं माना जाता, जब तक इसकी पौराणिक कथा का पाठ न किया जाए।
शास्त्रों और लोक परंपराओं में प्रचलित सकट चौथ की कथा एक कुम्हार और एक वृद्धा से जुड़ी हुई है। कथा के अनुसार, प्राचीन काल में एक नगर में एक कुम्हार रहता था, जो मिट्टी के बर्तन पकाने के लिए भट्टी लगाता था। लेकिन बार-बार प्रयास के बावजूद बर्तन ठीक से नहीं पकते थे। परेशान होकर उसने राजा से शिकायत की। जब इस समस्या का कारण जानने के लिए ज्योतिषीय सलाह ली गई, तो एक भयावह समाधान बताया गया—भट्टी जलाने से पहले बालक की बलि।
राजकीय आदेश के डर से नगर में यह अमानवीय परंपरा शुरू हो गई। समय बीतने के साथ कई निर्दोष बच्चों की बलि दी गई। इसी क्रम में एक दिन एक निर्धन वृद्धा के इकलौते पुत्र की बारी आई। वही पुत्र उसका एकमात्र सहारा था। संयोगवश वह दिन सकट चौथ का था। वृद्धा ने विलाप करने के बजाय अपने आराध्य पर पूर्ण विश्वास रखा। उसने अपने बेटे को तिल और सुपारी देकर कहा कि संकट की घड़ी में विघ्नहर्ता का स्मरण करना।
कथा के अनुसार, बालक को जलती हुई भट्टी में बैठा दिया गया। उधर वृद्धा पूरी रात दीप जलाकर प्रार्थना करती रही और व्रत का पालन करती रही। अगली सुबह जब भट्टी खोली गई, तो दृश्य देखकर नगरवासी स्तब्ध रह गए। न केवल सभी बर्तन सही तरीके से पक चुके थे, बल्कि वह बालक सुरक्षित बाहर बैठा मिला। इतना ही नहीं, पहले जिन बच्चों की बलि दी गई थी, वे भी जीवित प्रकट हुए।
इस घटना को विघ्नहर्ता की कृपा माना गया और नगर में भय का स्थान भक्ति ने ले लिया। तभी से सकट चौथ को संतान संकट निवारण का व्रत माना जाने लगा। इस कथा का संदेश यह है कि कठिन से कठिन परिस्थिति में भी विश्वास और श्रद्धा व्यक्ति को आशा का मार्ग दिखाते हैं।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, आज के दिन चंद्रोदय के बाद अर्घ्य देकर परिवार के साथ इस कथा का पाठ करना शुभ माना जाता है। माना जाता है कि इससे घर में सुख-शांति बनी रहती है और संतान पर आने वाले संकट दूर होते हैं।
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