काम में उलझे माता-पिता और अकेले होते बच्चे

अंकिता सुमन

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तेज़ रफ्तार ज़िंदगी में करियर की दौड़, रिश्तों पर भारी पड़ता माता-पिता का समय अभाव

शहरों की तेज़ रफ्तार ज़िंदगी में एक दृश्य अब आम होता जा रहा है—सुबह जल्दी निकलते माता-पिता, देर रात लौटते हुए थके चेहरे और घर में चुपचाप स्क्रीन में डूबे बच्चे। बाहर से यह तस्वीर “मेहनती परिवार” की लग सकती है, लेकिन इसके भीतर एक गहरी सामाजिक चिंता छिपी है—बच्चों का बढ़ता अकेलापन।

आज का मध्यमवर्गीय परिवार आर्थिक दबावों से जूझ रहा है। बेहतर शिक्षा, सुरक्षित भविष्य और सामाजिक प्रतिस्पर्धा के नाम पर माता-पिता अपने काम में पहले से कहीं ज़्यादा उलझे हैं। इसमें नीयत पर सवाल नहीं है। समस्या यह है कि इस दौड़ में सबसे ज्यादा कीमत बच्चे चुका रहे हैं—वह कीमत जो न पैसों से पूरी होती है, न सुविधाओं से।

बच्चों के लिए घर सिर्फ चार दीवारें नहीं होता, बल्कि भावनात्मक सुरक्षा का स्थान होता है। जब माता-पिता का अधिकांश समय दफ्तर, मीटिंग, कॉल और टारगेट में बीतता है, तो बच्चों के हिस्से में “चुप्पी” आती है। यह चुप्पी धीरे-धीरे अकेलेपन में बदल जाती है। कई बार बच्चे अपनी बात कहने से पहले ही सीख जाते हैं कि “मम्मी-पापा बिज़ी हैं।”

इस अकेलेपन का असर तुरंत दिखाई नहीं देता, लेकिन इसके परिणाम लंबे समय तक पीछा करते हैं। मनोवैज्ञानिक बताते हैं कि ऐसे बच्चे भावनात्मक रूप से असुरक्षित हो सकते हैं। उनमें आत्मविश्वास की कमी, चिड़चिड़ापन, या जरूरत से ज्यादा आत्मनिर्भर बनने की प्रवृत्ति देखी जाती है। कुछ बच्चे मोबाइल, गेम्स और सोशल मीडिया में अपना सहारा ढूंढ लेते हैं—जहां बातचीत तो होती है, लेकिन अपनापन नहीं।

विडंबना यह है कि हम बच्चों के लिए “सब कुछ” देने की कोशिश में उनका “सबसे जरूरी” छीन रहे हैं—समय। महंगे स्कूल, ट्यूशन, एक्टिविटी क्लास और गैजेट्स माता-पिता की अनुपस्थिति की भरपाई नहीं कर सकते। एक बच्चा यह नहीं चाहता कि उसके माता-पिता उसके लिए कितना कमा रहे हैं; वह जानना चाहता है कि वे उसके साथ कितना समय बिता रहे हैं।

यह भी सच है कि हर परिवार के हालात अलग होते हैं। कई माता-पिता मजबूरी में ज्यादा काम करते हैं। महंगाई, नौकरी की असुरक्षा और सामाजिक अपेक्षाएं उन्हें विकल्प नहीं देतीं। लेकिन सवाल यह है कि क्या हम इस मजबूरी को स्थायी मानकर स्वीकार कर लें, या इसके बीच संतुलन खोजने की कोशिश करें?

समाधान किसी बड़े सामाजिक आंदोलन में नहीं, बल्कि छोटे-छोटे बदलावों में छिपा है। बच्चों से रोज़ आधे घंटे खुलकर बात करना, उनके दिन के बारे में पूछना, बिना मोबाइल के साथ बैठना—ये छोटे कदम बच्चों के लिए बहुत बड़े मायने रखते हैं। गुणवत्ता वाला समय, मात्रा से ज्यादा महत्वपूर्ण होता है।

साथ ही, कार्यस्थलों और नीतियों की भी भूमिका है। वर्क-लाइफ बैलेंस केवल कॉर्पोरेट स्लोगन नहीं होना चाहिए। लचीले काम के घंटे, वर्क-फ्रॉम-होम जैसी व्यवस्थाएं और माता-पिता की जिम्मेदारियों को समझने वाला सिस्टम आज की जरूरत है। अगर समाज बच्चों को भविष्य कहता है, तो उनके वर्तमान पर भी उतना ही ध्यान देना होगा।

अंत में सवाल यही है—हम किस तरह का भविष्य चाहते हैं? ऐसे बच्चे जो सुविधाओं से घिरे हों लेकिन भावनात्मक रूप से खाली हों, या ऐसे बच्चे जिन्हें भले कम मिले, लेकिन अपने माता-पिता का साथ और समय भरपूर मिले। काम ज़रूरी है, करियर ज़रूरी है, लेकिन बच्चों के बचपन की कीमत पर नहीं। क्योंकि बचपन लौटकर नहीं आता, और उसकी कमी बाद में किसी भी सफलता से पूरी नहीं हो सकती।

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29 Jan 2026 By Nitin Trivedi

काम में उलझे माता-पिता और अकेले होते बच्चे

अंकिता सुमन

शहरों की तेज़ रफ्तार ज़िंदगी में एक दृश्य अब आम होता जा रहा है—सुबह जल्दी निकलते माता-पिता, देर रात लौटते हुए थके चेहरे और घर में चुपचाप स्क्रीन में डूबे बच्चे। बाहर से यह तस्वीर “मेहनती परिवार” की लग सकती है, लेकिन इसके भीतर एक गहरी सामाजिक चिंता छिपी है—बच्चों का बढ़ता अकेलापन।

आज का मध्यमवर्गीय परिवार आर्थिक दबावों से जूझ रहा है। बेहतर शिक्षा, सुरक्षित भविष्य और सामाजिक प्रतिस्पर्धा के नाम पर माता-पिता अपने काम में पहले से कहीं ज़्यादा उलझे हैं। इसमें नीयत पर सवाल नहीं है। समस्या यह है कि इस दौड़ में सबसे ज्यादा कीमत बच्चे चुका रहे हैं—वह कीमत जो न पैसों से पूरी होती है, न सुविधाओं से।

बच्चों के लिए घर सिर्फ चार दीवारें नहीं होता, बल्कि भावनात्मक सुरक्षा का स्थान होता है। जब माता-पिता का अधिकांश समय दफ्तर, मीटिंग, कॉल और टारगेट में बीतता है, तो बच्चों के हिस्से में “चुप्पी” आती है। यह चुप्पी धीरे-धीरे अकेलेपन में बदल जाती है। कई बार बच्चे अपनी बात कहने से पहले ही सीख जाते हैं कि “मम्मी-पापा बिज़ी हैं।”

इस अकेलेपन का असर तुरंत दिखाई नहीं देता, लेकिन इसके परिणाम लंबे समय तक पीछा करते हैं। मनोवैज्ञानिक बताते हैं कि ऐसे बच्चे भावनात्मक रूप से असुरक्षित हो सकते हैं। उनमें आत्मविश्वास की कमी, चिड़चिड़ापन, या जरूरत से ज्यादा आत्मनिर्भर बनने की प्रवृत्ति देखी जाती है। कुछ बच्चे मोबाइल, गेम्स और सोशल मीडिया में अपना सहारा ढूंढ लेते हैं—जहां बातचीत तो होती है, लेकिन अपनापन नहीं।

विडंबना यह है कि हम बच्चों के लिए “सब कुछ” देने की कोशिश में उनका “सबसे जरूरी” छीन रहे हैं—समय। महंगे स्कूल, ट्यूशन, एक्टिविटी क्लास और गैजेट्स माता-पिता की अनुपस्थिति की भरपाई नहीं कर सकते। एक बच्चा यह नहीं चाहता कि उसके माता-पिता उसके लिए कितना कमा रहे हैं; वह जानना चाहता है कि वे उसके साथ कितना समय बिता रहे हैं।

यह भी सच है कि हर परिवार के हालात अलग होते हैं। कई माता-पिता मजबूरी में ज्यादा काम करते हैं। महंगाई, नौकरी की असुरक्षा और सामाजिक अपेक्षाएं उन्हें विकल्प नहीं देतीं। लेकिन सवाल यह है कि क्या हम इस मजबूरी को स्थायी मानकर स्वीकार कर लें, या इसके बीच संतुलन खोजने की कोशिश करें?

समाधान किसी बड़े सामाजिक आंदोलन में नहीं, बल्कि छोटे-छोटे बदलावों में छिपा है। बच्चों से रोज़ आधे घंटे खुलकर बात करना, उनके दिन के बारे में पूछना, बिना मोबाइल के साथ बैठना—ये छोटे कदम बच्चों के लिए बहुत बड़े मायने रखते हैं। गुणवत्ता वाला समय, मात्रा से ज्यादा महत्वपूर्ण होता है।

साथ ही, कार्यस्थलों और नीतियों की भी भूमिका है। वर्क-लाइफ बैलेंस केवल कॉर्पोरेट स्लोगन नहीं होना चाहिए। लचीले काम के घंटे, वर्क-फ्रॉम-होम जैसी व्यवस्थाएं और माता-पिता की जिम्मेदारियों को समझने वाला सिस्टम आज की जरूरत है। अगर समाज बच्चों को भविष्य कहता है, तो उनके वर्तमान पर भी उतना ही ध्यान देना होगा।

अंत में सवाल यही है—हम किस तरह का भविष्य चाहते हैं? ऐसे बच्चे जो सुविधाओं से घिरे हों लेकिन भावनात्मक रूप से खाली हों, या ऐसे बच्चे जिन्हें भले कम मिले, लेकिन अपने माता-पिता का साथ और समय भरपूर मिले। काम ज़रूरी है, करियर ज़रूरी है, लेकिन बच्चों के बचपन की कीमत पर नहीं। क्योंकि बचपन लौटकर नहीं आता, और उसकी कमी बाद में किसी भी सफलता से पूरी नहीं हो सकती।

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