साइलेंट क्विटिंग क्या है और क्यों बढ़ रही है: वर्क कल्चर में चुपचाप बदलता कर्मचारियों का रवैया

लाइफस्टाइल डेस्क

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ओवरवर्क, बर्नआउट और वर्क-लाइफ बैलेंस की कमी से जुड़ा ट्रेंड, खासकर युवाओं में तेजी से बढ़ा

दफ्तर पहुंचना, तय समय तक काम करना और जिम्मेदारी पूरी होते ही लैपटॉप बंद कर देना—यही है साइलेंट क्विटिंग। हाल के वर्षों में यह शब्द कॉरपोरेट और स्टार्टअप वर्ल्ड में तेजी से चर्चा में आया है। साइलेंट क्विटिंग का मतलब नौकरी छोड़ना नहीं, बल्कि न्यूनतम अपेक्षित काम तक खुद को सीमित कर लेना है। कर्मचारी न तो अतिरिक्त जिम्मेदारी लेते हैं और न ही जरूरत से ज्यादा मेहनत करने को तैयार रहते हैं।

मानव संसाधन विशेषज्ञों के अनुसार, साइलेंट क्विटिंग बढ़ने की सबसे बड़ी वजह वर्कप्लेस पर बढ़ता दबाव और बर्नआउट है। महामारी के बाद हाइब्रिड और रिमोट वर्क ने जहां लचीलापन दिया, वहीं काम के घंटे भी अनियंत्रित हो गए। कई कर्मचारियों से उम्मीद की जाने लगी कि वे हर समय उपलब्ध रहें। इसका असर मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर पड़ा।

इस ट्रेंड में खासतौर पर युवा कर्मचारी आगे नजर आ रहे हैं। जेन Z और मिलेनियल्स अब करियर को ही जिंदगी का केंद्र नहीं मानते। वे साफ तौर पर कहते हैं कि नौकरी उनके जीवन का हिस्सा है, पूरा जीवन नहीं। जब उन्हें लगता है कि उनकी मेहनत की न तो सराहना हो रही है और न ही आगे बढ़ने के मौके मिल रहे हैं, तो वे खुद को सीमित कर लेते हैं।

कॉरपोरेट एनालिस्ट बताते हैं कि साइलेंट क्विटिंग का सीधा संबंध मैनेजमेंट और कर्मचारियों के बीच भरोसे की कमी से भी है। कई कर्मचारियों का मानना है कि अतिरिक्त काम करने के बावजूद प्रमोशन, सैलरी हाइक या पहचान नहीं मिलती। ऐसे में वे केवल वही काम करते हैं, जिसके लिए उन्हें भुगतान किया जाता है।

वर्कप्लेस साइकोलॉजिस्ट का कहना है कि साइलेंट क्विटिंग आलस्य नहीं, बल्कि एक तरह का आत्मरक्षा तंत्र है। कर्मचारी खुद को मानसिक थकान से बचाने के लिए सीमाएं तय कर रहे हैं। हालांकि, लंबे समय तक यह स्थिति बनी रहे तो इसका असर टीम की उत्पादकता और संगठन की ग्रोथ पर पड़ सकता है।

कई कंपनियां अब इस ट्रेंड को गंभीरता से ले रही हैं। कुछ संस्थानों ने मेंटल हेल्थ सपोर्ट, फ्लेक्सिबल वर्किंग ऑवर्स और ट्रांसपेरेंट प्रमोशन पॉलिसी पर काम शुरू किया है। विशेषज्ञ मानते हैं कि केवल कर्मचारियों से ज्यादा देने की उम्मीद करने के बजाय, उन्हें सुनना और सम्मान देना जरूरी है।

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24 Jan 2026 By Nitin Trivedi

साइलेंट क्विटिंग क्या है और क्यों बढ़ रही है: वर्क कल्चर में चुपचाप बदलता कर्मचारियों का रवैया

लाइफस्टाइल डेस्क

दफ्तर पहुंचना, तय समय तक काम करना और जिम्मेदारी पूरी होते ही लैपटॉप बंद कर देना—यही है साइलेंट क्विटिंग। हाल के वर्षों में यह शब्द कॉरपोरेट और स्टार्टअप वर्ल्ड में तेजी से चर्चा में आया है। साइलेंट क्विटिंग का मतलब नौकरी छोड़ना नहीं, बल्कि न्यूनतम अपेक्षित काम तक खुद को सीमित कर लेना है। कर्मचारी न तो अतिरिक्त जिम्मेदारी लेते हैं और न ही जरूरत से ज्यादा मेहनत करने को तैयार रहते हैं।

मानव संसाधन विशेषज्ञों के अनुसार, साइलेंट क्विटिंग बढ़ने की सबसे बड़ी वजह वर्कप्लेस पर बढ़ता दबाव और बर्नआउट है। महामारी के बाद हाइब्रिड और रिमोट वर्क ने जहां लचीलापन दिया, वहीं काम के घंटे भी अनियंत्रित हो गए। कई कर्मचारियों से उम्मीद की जाने लगी कि वे हर समय उपलब्ध रहें। इसका असर मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर पड़ा।

इस ट्रेंड में खासतौर पर युवा कर्मचारी आगे नजर आ रहे हैं। जेन Z और मिलेनियल्स अब करियर को ही जिंदगी का केंद्र नहीं मानते। वे साफ तौर पर कहते हैं कि नौकरी उनके जीवन का हिस्सा है, पूरा जीवन नहीं। जब उन्हें लगता है कि उनकी मेहनत की न तो सराहना हो रही है और न ही आगे बढ़ने के मौके मिल रहे हैं, तो वे खुद को सीमित कर लेते हैं।

कॉरपोरेट एनालिस्ट बताते हैं कि साइलेंट क्विटिंग का सीधा संबंध मैनेजमेंट और कर्मचारियों के बीच भरोसे की कमी से भी है। कई कर्मचारियों का मानना है कि अतिरिक्त काम करने के बावजूद प्रमोशन, सैलरी हाइक या पहचान नहीं मिलती। ऐसे में वे केवल वही काम करते हैं, जिसके लिए उन्हें भुगतान किया जाता है।

वर्कप्लेस साइकोलॉजिस्ट का कहना है कि साइलेंट क्विटिंग आलस्य नहीं, बल्कि एक तरह का आत्मरक्षा तंत्र है। कर्मचारी खुद को मानसिक थकान से बचाने के लिए सीमाएं तय कर रहे हैं। हालांकि, लंबे समय तक यह स्थिति बनी रहे तो इसका असर टीम की उत्पादकता और संगठन की ग्रोथ पर पड़ सकता है।

कई कंपनियां अब इस ट्रेंड को गंभीरता से ले रही हैं। कुछ संस्थानों ने मेंटल हेल्थ सपोर्ट, फ्लेक्सिबल वर्किंग ऑवर्स और ट्रांसपेरेंट प्रमोशन पॉलिसी पर काम शुरू किया है। विशेषज्ञ मानते हैं कि केवल कर्मचारियों से ज्यादा देने की उम्मीद करने के बजाय, उन्हें सुनना और सम्मान देना जरूरी है।

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