मथुरा से द्वारका तक ‘कृष्ण-पथ’ का मानचित्रण, श्रीकृष्ण से जुड़े स्थलों का शोध-आधारित डिजिटल दस्तावेजीकरण शुरू

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उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, गुजरात और असम में फैले मंदिरों, ग्रंथ-संदर्भों और लोक-परंपराओं को स्रोत-वर्गीकरण के साथ दर्ज करने की पहल; इंटरएक्टिव मैप और वृत्तचित्र श्रृंखला की योजना

भगवान श्रीकृष्ण से जुड़े सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और परंपरागत स्थलों का एक डिजिटल दस्तावेजीकरण शुरू किए जाने की बात सामने आई है। रिपोर्टों और परियोजना से जुड़े पक्ष के अनुसार यह काम उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, गुजरात और असम में फैला है, जिसमें मंदिरों, पांडुलिपियों/ग्रंथ-संदर्भों और सांस्कृतिक स्थलों से जुड़ी सामग्री का संकलन किया जा रहा है।

सनातन विजडम का कहना है कि पहल का उद्देश्य कृष्ण से संबंधित स्थलों को केवल धार्मिक आस्था के नजरिए से नहीं, बल्कि उपलब्ध लिखित स्रोतों, क्षेत्रीय साहित्य और स्थानीय परंपराओं के आधार पर संदर्भ सहित प्रस्तुत करना है, ताकि पाठक/दर्शक यह समझ सकें कि किसी जानकारी का आधार लिखित उल्लेख है, पुरातत्व/अध्ययन है या लोक-परंपरा।

कृष्ण-पथ: प्रारंभिक मैपिंग से उभरता क्रम

परियोजना-पक्ष के अनुसार, अब तक की मैपिंग में कृष्ण से जुड़े स्थलों का एक भौगोलिक क्रम उभरता दिख रहा है। दार्शनिक शोधकर्ता देवऋषि के अनुसार, "शोध-सामग्री में जो मार्ग सामने आता है, वह मथुरा से शुरू होकर गोकुल, नंदगाँव और वृंदावन से होते हुए पुनः मथुरा की ओर जाता है। इन स्थानों को कृष्ण के प्रारंभिक जीवन से जोड़कर देखा जाता है।"

कुछ पारंपरिक स्रोतों और क्षेत्रीय मान्यताओं में शिक्षा-प्रसंगों को उज्जैन से जोड़ा जाता है, जहाँ सांदीपनि आश्रम का संदर्भ मिलता है। देवऋषि के मुताबिक, "ग्रंथ-परंपरा में 11-12 वर्ष की आयु में कृष्ण के उज्जैन जाने का उल्लेख मिलता है। वहाँ से जनापाव होते हुए परशुराम से मुलाकात और सुदर्शन चक्र प्राप्ति का प्रसंग कुछ आख्यानों में आता है। इसी क्रम में समुद्री क्षेत्र में शंखासुर-वध और उसी स्थान पर बाद में द्वारका की स्थापना का उल्लेख मिलता है। अध्ययन पूर्ण करने के बाद मथुरा लौटने और फिर 25 वर्ष की आयु में द्वारका जाने के संदर्भ विभिन्न स्रोतों में हैं।"

उनके अनुसार परियोजना में ऐसे संदर्भों को ऐतिहासिक निष्कर्ष की तरह प्रस्तुत करने के बजाय स्रोत-प्रकार के आधार पर वर्गीकृत कर रखा जाएगा, ताकि विरोधी/विकल्पी सूचनाओं को भी पारदर्शी तरीके से दिखाया जा सके।

असम से नरकासुर का संबंध

असम को शामिल करने के पीछे परियोजना-पक्ष ने यह कारण बताया है कि कृष्ण-कथा/वैष्णव साहित्य में नरकासुर-प्रसंग का उल्लेख मिलता है, जिसमें 16,000 स्त्रियों को बंदी बनाए जाने का संदर्भ आता है। असम की वैष्णव परंपरा का अपना सांस्कृतिक संदर्भ है, इसलिए वहाँ की सामग्री को क्षेत्रीय परंपरा और लोक-स्मृति के फ्रेम में दर्ज किया जाएगा।

शोधकर्ताओं का डेटाबेस

देवऋषि के अनुसार, इस पहल का एक महत्वपूर्ण हिस्सा उन शोधकर्ताओं और स्थानीय विद्वानों के काम का संकलन है, जिनका कार्य अक्सर व्यापक सार्वजनिक मंचों तक सीमित रूप से पहुँच पाया है। परियोजना-पक्ष के मुताबिक इतिहासकारों, पुरातत्वविदों, अकादमिक शोधकर्ताओं और स्थानीय जानकारों से बातचीत/इंटरव्यू रिकॉर्ड कर एक डेटाबेस तैयार किया जा रहा है, ताकि अलग-अलग दृष्टिकोण, स्रोत-सूचियाँ और क्षेत्रीय संदर्भ एक जगह उपलब्ध हो सकें।

परियोजना से जुड़े पक्ष का कहना है कि सामग्री में मौखिक परंपराओं को भी दर्ज किया जाएगा, लेकिन उन्हें लिखित/अध्ययन-आधारित स्रोतों से अलग श्रेणी में रखा जाएगा।

उज्जैन में शोध पूर्ण, मथुरा-वृंदावन में कार्य जारी

परियोजना-पक्ष के अनुसार उज्जैन के सांदीपनि आश्रम और नारणा क्षेत्र में अगस्त में फील्ड रिसर्च पूर्ण की जा चुकी है, जिसमें स्थानीय विद्वानों और शोधकर्ताओं से विचार-विमर्श किया गया था। वर्तमान में मथुरा-वृंदावन क्षेत्र में दस्तावेजीकरण का काम जारी है, जहाँ कृष्ण के प्रारंभिक जीवन से जुड़े अनेक स्थल हैं।

परियोजना से जुड़े पक्ष का कहना है कि मध्य प्रदेश में जनापाव जैसे स्थल भी संकलन में शामिल हैं, जिनका उल्लेख कुछ परंपराओं/आख्यानों में आता है, और इन्हें "वर्णित संदर्भ" के रूप में चिह्नित करके रखा जाएगा। इसी तरह गुजरात में द्वारका के संदर्भ को आगामी चरण में लेने की बात कही गई है, जहाँ समुद्री पुरातत्व से जुड़े अध्ययन/चर्चाएँ लंबे समय से मौजूद रही हैं; परियोजना-पक्ष के मुताबिक इन अध्ययनों को संदर्भ-सामग्री के रूप में जोड़कर स्थल-आधारित दस्तावेजीकरण किया जा सकता है।

सरकारी योजना से समन्वय की कोशिश

देवऋषि ने यह भी जानकारी दी है कि परियोजना को आगे बढ़ाने के लिए इसे मध्य प्रदेश सरकार की 'श्रीकृष्ण पाथेय' जैसी सांस्कृतिक/पर्यटन-आधारित पहल के साथ समन्वय में लाने की दिशा में सकारात्मक प्रयास चल रहे हैं।

डिजिटल प्लेटफॉर्म और वृत्तचित्र की योजना

परियोजना-पक्ष के अनुसार, संकलित जानकारी को एक डिजिटल प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध कराने की योजना है, जहाँ इंटरएक्टिव मैप, बहुभाषी सामग्री और संदर्भ-आधारित प्रस्तुति रखी जाएगी। स्थलों और शोधकर्ताओं के इंटरव्यू सहित एक वृत्तचित्र श्रृंखला तैयार करने की बात भी कही गई है।

परियोजना-पक्ष का कहना है कि इस तरह के काम में अलग-अलग स्रोतों के बीच विरोधाभास एक व्यावहारिक चुनौती है, इसलिए लक्ष्य अंतिम निष्कर्ष देना नहीं, बल्कि उपलब्ध सामग्री को व्यवस्थित रूप से प्रस्तुत करना है—कि लिखित स्रोत क्या कहते हैं, अध्ययन/पुरातत्व क्या संकेत देते हैं और स्थानीय परंपरा क्या बताती है—ताकि पाठक/दर्शक अपने निष्कर्ष तक पहुँच सकें।

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