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फ्रांस में प्रतिबंधित कीटनाशकों की वापसी पर सियासी घमासान, पर्यावरण मंत्री ने दिया इस्तीफा
अंतराष्ट्रीय न्यूज
मधुमक्खियों और जैव विविधता पर खतरे का हवाला देकर मोनिक बारबू ने पद छोड़ने की पेशकश की, राष्ट्रपति मैक्रों ने इस्तीफा स्वीकार नहीं किया; किसानों को राहत देने वाले कृषि कानून पर सरकार के भीतर भी मतभेद
फ्रांस में किसानों को राहत देने के लिए लाए गए नए कृषि कानून ने सरकार के भीतर ही बड़ा विवाद खड़ा कर दिया है। संसद से कानून पारित होने के बाद पर्यावरण मंत्री मोनिक बारबू ने बुधवार को राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के सामने अपना इस्तीफा पेश कर दिया। उनकी नाराजगी कानून के उस हिस्से को लेकर थी, जिसमें फ्रांस में प्रतिबंधित दो कीटनाशकों के सीमित और अस्थायी इस्तेमाल का रास्ता खोला गया है। वैज्ञानिक और पर्यावरण संगठन इन रसायनों को मधुमक्खियों और दूसरे परागण करने वाले कीड़ों के लिए नुकसानदायक बताते रहे हैं। हालांकि बुधवार को घटनाक्रम तेजी से बदला। राष्ट्रपति मैक्रों ने बारबू का इस्तीफा स्वीकार नहीं किया और सरकार ने बाद में साफ किया कि वह अपने पद पर बनी रहेंगी। यानी उन्होंने इस्तीफा दिया जरूर, लेकिन फिलहाल सरकार से उनकी विदाई नहीं हुई है।
विवाद की जड़ फ्रांस का नया आपात कृषि कानून है। संसद ने मंगलवार को इसे अंतिम मंजूरी दी। कानून के तहत कुछ विशेष परिस्थितियों में एसेटामिप्रिड और फ्लुपाइराडीफ्यूरोन नाम के दो कीटनाशकों के इस्तेमाल की अनुमति दी जा सकती है। ये रसायन फ्रांस में प्रतिबंधित हैं, जबकि यूरोपीय संघ के स्तर पर कुछ शर्तों के तहत इनके इस्तेमाल की गुंजाइश मौजूद है। नए प्रावधान के बाद फ्रांस की स्वास्थ्य, खाद्य और पर्यावरण सुरक्षा एजेंसी जरूरत के आधार पर कुछ कृषि क्षेत्रों के लिए अस्थायी छूट दे सकेगी। इसका इस्तेमाल चुकंदर, सेब, हेजलनट और चेरी जैसी फसलों से जुड़े किसानों के लिए किया जा सकता है। सरकार का तर्क है कि कुछ फसलों पर कीटों का दबाव इतना बढ़ चुका है कि किसानों के पास प्रभावी विकल्प सीमित रह गए हैं।
मोनिक बारबू शुरू से इन प्रावधानों को लेकर सहज नहीं थीं। उनका मानना था कि ऐसे रसायनों की वापसी फ्रांस की पर्यावरण नीति को पीछे ले जा सकती है। कानून का अंतिम स्वरूप सामने आने के बाद उन्होंने सार्वजनिक रूप से अपनी नाराजगी जाहिर की। उन्होंने कहा कि पिछले नौ महीनों में उनका काम जंगल, पानी, हवा, मिट्टी और जैव विविधता की रक्षा को आगे बढ़ाना रहा, लेकिन अब पर्यावरण से जुड़े लक्ष्यों के खिलाफ दबाव इतना मजबूत हो गया है कि उनके लिए अपनी जिम्मेदारी उसी दिशा में निभाना मुश्किल हो रहा है। उन्होंने यह आरोप भी लगाया कि सरकार की ओर से पहले किए गए आश्वासन के बावजूद विवादित प्रावधान हटाने पर पर्याप्त बहस नहीं होने दी गई।
बुधवार सुबह तक स्थिति ऐसी थी कि बारबू का सरकार से जाना लगभग तय माना जा रहा था। उन्होंने राष्ट्रपति मैक्रों को इस्तीफा सौंपा, लेकिन राष्ट्रपति ने उसे मंजूर नहीं किया। राष्ट्रपति से मुलाकात के बाद सरकारी प्रवक्ता मॉड ब्रेजों ने बताया कि कानून के अंतिम स्वरूप को लेकर राष्ट्रपति और पर्यावरण मंत्री के बीच मतभेद स्वीकार किए गए हैं, लेकिन मैक्रों और प्रधानमंत्री सेबेस्टियन लेकोर्नू ने बारबू के काम पर भरोसा जताया है। इसके बाद तय हुआ कि वह पर्यावरण मंत्री के पद पर बनी रहेंगी। कुछ ही घंटों में इस्तीफे की घोषणा से लेकर पद पर बने रहने तक हुए इस घटनाक्रम ने फ्रांसीसी सरकार के भीतर कृषि और पर्यावरण नीति को लेकर मौजूद खींचतान को खुलकर सामने ला दिया।
किसानों की तरफ से इस कानून की मांग लंबे समय से उठ रही थी। फ्रांस में खेती की लागत बढ़ने, मौसम की मार, सस्ते आयात और कई रसायनों पर राष्ट्रीय स्तर पर लगी पाबंदियों को लेकर किसान लगातार दबाव बना रहे हैं। उनका कहना है कि जब यूरोप के दूसरे देशों के किसानों को कुछ ऐसे कीटनाशकों के इस्तेमाल की अनुमति मिलती है, जिन पर फ्रांस में रोक है, तो बाजार में प्रतिस्पर्धा बराबर नहीं रहती। फ्रांसीसी किसानों को उत्पादन बचाने के लिए महंगे या कम प्रभावी विकल्प अपनाने पड़ते हैं, जबकि बाहर से आने वाली कृषि उपज अपेक्षाकृत कम लागत में तैयार होती है। सरकार ने इसी असमानता को नए कानून के पक्ष में एक प्रमुख कारण बताया है।
कृषि मंत्री एनी जेनेवार्ड भी कानून के समर्थन में खुलकर सामने आई हैं। उनका कहना है कि खेती पहले से गंभीर आर्थिक दबाव में है और ऐसे समय कानून को केवल राजनीतिक या वैचारिक विरोध के कारण रोकना किसानों की मुश्किल और बढ़ा सकता है। सरकार के समर्थक खेमे का तर्क है कि कानून का मकसद कीटनाशकों के अनियंत्रित इस्तेमाल की अनुमति देना नहीं, बल्कि कुछ बेहद प्रभावित कृषि क्षेत्रों को सीमित अवधि के लिए राहत उपलब्ध कराना है। किसी भी छूट के लिए संबंधित स्वास्थ्य और पर्यावरण एजेंसी की मंजूरी जरूरी होगी और इसे स्थायी अनुमति की तरह नहीं देखा जाना चाहिए।
पर्यावरण संगठनों की आपत्ति इससे बिल्कुल अलग है। उनका कहना है कि मधुमक्खियां और दूसरे परागण करने वाले जीव कृषि व्यवस्था के लिए ही बेहद जरूरी हैं। फल, सब्जी और दूसरी कई फसलों का उत्पादन प्राकृतिक परागण पर निर्भर करता है। ऐसे में अगर किसी रसायन से इन जीवों की आबादी प्रभावित होती है तो कुछ फसलों को तत्काल राहत देने की कोशिश लंबे समय में खेती के लिए ही नुकसानदेह हो सकती है। पर्यावरण समूहों ने यह भी सवाल उठाया है कि जिन रसायनों को पर्यावरणीय चिंताओं के चलते प्रतिबंधित किया गया था, उन्हें आर्थिक दबाव के आधार पर वापस लाने से भविष्य में दूसरे प्रतिबंधों को कमजोर करने का रास्ता खुल सकता है।
सबसे ज्यादा चर्चा एसेटामिप्रिड को लेकर है। यह नियोनिकोटिनॉइड श्रेणी का कीटनाशक है। फ्रांस ने 2018 में इसके इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाया था। मधुमक्खियों और अन्य परागण करने वाले कीड़ों पर इसके संभावित प्रभाव को लेकर लंबे समय से चिंता जताई जाती रही है। हालांकि यूरोपीय संघ के स्तर पर इसका उपयोग पूरी तरह प्रतिबंधित नहीं है। यही अंतर अब फ्रांस में राजनीतिक बहस का बड़ा मुद्दा बन गया है। किसान संगठन पूछ रहे हैं कि यदि यूरोप के दूसरे देशों में इसका इस्तेमाल कानूनी है तो फ्रांस के किसानों पर अलग प्रतिबंध क्यों रहे, जबकि पर्यावरण समूह फ्रांस के कठोर नियमों को जैव विविधता की सुरक्षा के लिए जरूरी मानते हैं।
दूसरा रसायन फ्लुपाइराडीफ्यूरोन है, जिसे भी कुछ फसलों के लिए असाधारण अनुमति के दायरे में लाया जा सकता है। नए कानून में सीधे हर किसान को इन रसायनों का इस्तेमाल शुरू करने की खुली छूट नहीं दी गई है। संबंधित फ्रांसीसी एजेंसी को पहले जोखिम और जरूरत का आकलन करना होगा। इसके बाद खास फसल या कृषि क्षेत्र के लिए सीमित समय की अनुमति संभव होगी। इसी व्यवस्था को सरकार पर्यावरणीय सुरक्षा और किसानों की जरूरत के बीच संतुलन के तौर पर पेश कर रही है, जबकि आलोचकों का कहना है कि प्रतिबंधित रसायनों की वापसी का दरवाजा खुलना अपने आप में चिंताजनक है।
विवाद केवल कीटनाशकों तक सीमित नहीं है। कृषि कानून में पानी के भंडारण से जुड़े नियमों को आसान करने के प्रावधान भी बहस में हैं। किसान लंबे सूखे और गर्मी के दौरान सिंचाई के लिए बड़े जलाशय या कृत्रिम भंडारण व्यवस्था चाहते हैं। उनका कहना है कि जलवायु परिवर्तन के कारण बारिश का पैटर्न बदल रहा है और गर्मियों में पानी की कमी बढ़ रही है। यदि बरसात के समय पानी जमा नहीं किया गया तो सूखे के महीनों में फसल बचाना मुश्किल हो सकता है। कृषि क्षेत्र इसे भविष्य की खाद्य सुरक्षा और खेती को टिकाऊ बनाए रखने के लिए जरूरी कदम बता रहा है।
पर्यावरणविदों की चिंता यहां भी अलग है। बड़े जलाशयों में पानी जमा करने के लिए भूजल या नदियों पर अतिरिक्त दबाव पड़ने की आशंका जताई जाती है। गर्मियों में जब नदियों का जलस्तर पहले ही नीचे होता है, तब बड़े पैमाने पर सिंचाई के लिए पानी निकालना स्थानीय पारिस्थितिकी को नुकसान पहुंचा सकता है। फ्रांस समेत यूरोप के कई हिस्सों ने पिछले वर्षों में गंभीर हीटवेव और सूखे का सामना किया है। ऐसे में पानी किसके लिए और कितनी मात्रा में इस्तेमाल किया जाए, यह अब केवल कृषि का मुद्दा नहीं रहा बल्कि राजनीतिक और पर्यावरणीय विवाद बन चुका है।
फ्रांस में कीटनाशकों को लेकर यह पहला बड़ा टकराव नहीं है। पिछले साल भी एसेटामिप्रिड की वापसी का रास्ता खोलने की कोशिश हुई थी, लेकिन देश की संवैधानिक अदालत ने विवादित कृषि कानून के महत्वपूर्ण हिस्से को रोक दिया था। अदालत ने पर्यावरण और आने वाली पीढ़ियों की सुरक्षा से जुड़े सवाल उठाए थे। उस समय प्रस्ताव के विरोध में 20 लाख से ज्यादा लोगों के हस्ताक्षर वाली याचिका भी सामने आई थी। इसके बाद यह माना जा रहा था कि सरकार इस मुद्दे पर बेहद सावधानी से आगे बढ़ेगी, लेकिन नए आपात कृषि कानून में फिर से सीमित छूट का प्रावधान आने से विवाद लौट आया है।
संसद में भी कानून आसानी से पारित नहीं हुआ। नेशनल असेंबली में इसे 296 के मुकाबले 224 मतों से मंजूरी मिली। इसके बाद सीनेट ने भी अंतिम मतदान में 214-111 से इसे पारित कर दिया। दक्षिणपंथी और रूढ़िवादी दलों के बड़े हिस्से ने कानून का समर्थन किया, जबकि वामपंथी दलों और पर्यावरण समर्थक सांसदों ने विरोध किया। सत्तारूढ़ गठबंधन के भीतर भी कीटनाशक वाले प्रावधान पर मतभेद साफ दिखाई दिए। कुछ सांसद चाहते थे कि एसेटामिप्रिड से जुड़ा हिस्सा अंतिम कानून से हटा दिया जाए, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
बारबू की नाराजगी इसी प्रक्रिया के दौरान बढ़ी। उनका कहना था कि विवादित कीटनाशकों से जुड़े प्रावधानों को हटाने या उन पर दोबारा गंभीर चर्चा की गुंजाइश होनी चाहिए थी। उन्होंने अपने संदेश में राजनीति के कामकाज को लेकर भी निराशा जाहिर की। उनका रुख पर्यावरण समर्थक समूहों के लिए महत्वपूर्ण था, क्योंकि सरकार के भीतर रहते हुए वह खुले तौर पर कृषि कानून के कुछ हिस्सों से असहमति जता रही थीं। जब उन्होंने इस्तीफा देने का फैसला किया तो इसे केवल व्यक्तिगत कदम नहीं, बल्कि मैक्रों सरकार के भीतर नीति संघर्ष के संकेत के रूप में देखा गया।
राष्ट्रपति मैक्रों ने हालांकि उन्हें जाने नहीं दिया। सरकारी प्रवक्ता के मुताबिक राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री दोनों ने बारबू के पर्यावरण संबंधी मिशन को जारी रखने का समर्थन किया है। इसका अर्थ यह भी है कि सरकार अब एक ऐसी स्थिति में है जहां संसद से कानून पारित हो चुका है, लेकिन उसे लागू करने की प्रक्रिया में पर्यावरण मंत्रालय की आपत्तियों और वैज्ञानिक आकलन को भी संभालना होगा। प्रतिबंधित कीटनाशकों के इस्तेमाल की अनुमति स्वतः नहीं मिलेगी, बल्कि अपवाद के तौर पर नियामक प्रक्रिया से गुजरना होगा।
इस विवाद के केंद्र में फ्रांस की दो बड़ी जरूरतें आमने-सामने दिखाई दे रही हैं। एक तरफ किसान हैं, जो बढ़ती लागत, जलवायु परिवर्तन, कीटों से फसल नुकसान और यूरोपीय बाजार में प्रतिस्पर्धा का दबाव झेल रहे हैं। दूसरी तरफ पर्यावरण वैज्ञानिक और संगठन हैं, जो चेतावनी दे रहे हैं कि परागण करने वाले जीवों और जल संसाधनों को नुकसान पहुंचाकर कृषि संकट का स्थायी समाधान नहीं निकाला जा सकता। संसद ने फिलहाल किसानों को सीमित राहत देने वाला रास्ता चुना है, लेकिन कीटनाशकों के लिए वास्तविक छूट देने से पहले फ्रांस की संबंधित एजेंसी की मंजूरी जरूरी होगी। मोनिक बारबू भी राष्ट्रपति मैक्रों द्वारा इस्तीफा स्वीकार न किए जाने के बाद फिलहाल सरकार में पर्यावरण मंत्री के रूप में काम जारी रखेंगी।
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अंतराष्ट्रीय न्यूज
फ्रांस में किसानों को राहत देने के लिए लाए गए नए कृषि कानून ने सरकार के भीतर ही बड़ा विवाद खड़ा कर दिया है। संसद से कानून पारित होने के बाद पर्यावरण मंत्री मोनिक बारबू ने बुधवार को राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के सामने अपना इस्तीफा पेश कर दिया। उनकी नाराजगी कानून के उस हिस्से को लेकर थी, जिसमें फ्रांस में प्रतिबंधित दो कीटनाशकों के सीमित और अस्थायी इस्तेमाल का रास्ता खोला गया है। वैज्ञानिक और पर्यावरण संगठन इन रसायनों को मधुमक्खियों और दूसरे परागण करने वाले कीड़ों के लिए नुकसानदायक बताते रहे हैं। हालांकि बुधवार को घटनाक्रम तेजी से बदला। राष्ट्रपति मैक्रों ने बारबू का इस्तीफा स्वीकार नहीं किया और सरकार ने बाद में साफ किया कि वह अपने पद पर बनी रहेंगी। यानी उन्होंने इस्तीफा दिया जरूर, लेकिन फिलहाल सरकार से उनकी विदाई नहीं हुई है।
विवाद की जड़ फ्रांस का नया आपात कृषि कानून है। संसद ने मंगलवार को इसे अंतिम मंजूरी दी। कानून के तहत कुछ विशेष परिस्थितियों में एसेटामिप्रिड और फ्लुपाइराडीफ्यूरोन नाम के दो कीटनाशकों के इस्तेमाल की अनुमति दी जा सकती है। ये रसायन फ्रांस में प्रतिबंधित हैं, जबकि यूरोपीय संघ के स्तर पर कुछ शर्तों के तहत इनके इस्तेमाल की गुंजाइश मौजूद है। नए प्रावधान के बाद फ्रांस की स्वास्थ्य, खाद्य और पर्यावरण सुरक्षा एजेंसी जरूरत के आधार पर कुछ कृषि क्षेत्रों के लिए अस्थायी छूट दे सकेगी। इसका इस्तेमाल चुकंदर, सेब, हेजलनट और चेरी जैसी फसलों से जुड़े किसानों के लिए किया जा सकता है। सरकार का तर्क है कि कुछ फसलों पर कीटों का दबाव इतना बढ़ चुका है कि किसानों के पास प्रभावी विकल्प सीमित रह गए हैं।
मोनिक बारबू शुरू से इन प्रावधानों को लेकर सहज नहीं थीं। उनका मानना था कि ऐसे रसायनों की वापसी फ्रांस की पर्यावरण नीति को पीछे ले जा सकती है। कानून का अंतिम स्वरूप सामने आने के बाद उन्होंने सार्वजनिक रूप से अपनी नाराजगी जाहिर की। उन्होंने कहा कि पिछले नौ महीनों में उनका काम जंगल, पानी, हवा, मिट्टी और जैव विविधता की रक्षा को आगे बढ़ाना रहा, लेकिन अब पर्यावरण से जुड़े लक्ष्यों के खिलाफ दबाव इतना मजबूत हो गया है कि उनके लिए अपनी जिम्मेदारी उसी दिशा में निभाना मुश्किल हो रहा है। उन्होंने यह आरोप भी लगाया कि सरकार की ओर से पहले किए गए आश्वासन के बावजूद विवादित प्रावधान हटाने पर पर्याप्त बहस नहीं होने दी गई।
बुधवार सुबह तक स्थिति ऐसी थी कि बारबू का सरकार से जाना लगभग तय माना जा रहा था। उन्होंने राष्ट्रपति मैक्रों को इस्तीफा सौंपा, लेकिन राष्ट्रपति ने उसे मंजूर नहीं किया। राष्ट्रपति से मुलाकात के बाद सरकारी प्रवक्ता मॉड ब्रेजों ने बताया कि कानून के अंतिम स्वरूप को लेकर राष्ट्रपति और पर्यावरण मंत्री के बीच मतभेद स्वीकार किए गए हैं, लेकिन मैक्रों और प्रधानमंत्री सेबेस्टियन लेकोर्नू ने बारबू के काम पर भरोसा जताया है। इसके बाद तय हुआ कि वह पर्यावरण मंत्री के पद पर बनी रहेंगी। कुछ ही घंटों में इस्तीफे की घोषणा से लेकर पद पर बने रहने तक हुए इस घटनाक्रम ने फ्रांसीसी सरकार के भीतर कृषि और पर्यावरण नीति को लेकर मौजूद खींचतान को खुलकर सामने ला दिया।
किसानों की तरफ से इस कानून की मांग लंबे समय से उठ रही थी। फ्रांस में खेती की लागत बढ़ने, मौसम की मार, सस्ते आयात और कई रसायनों पर राष्ट्रीय स्तर पर लगी पाबंदियों को लेकर किसान लगातार दबाव बना रहे हैं। उनका कहना है कि जब यूरोप के दूसरे देशों के किसानों को कुछ ऐसे कीटनाशकों के इस्तेमाल की अनुमति मिलती है, जिन पर फ्रांस में रोक है, तो बाजार में प्रतिस्पर्धा बराबर नहीं रहती। फ्रांसीसी किसानों को उत्पादन बचाने के लिए महंगे या कम प्रभावी विकल्प अपनाने पड़ते हैं, जबकि बाहर से आने वाली कृषि उपज अपेक्षाकृत कम लागत में तैयार होती है। सरकार ने इसी असमानता को नए कानून के पक्ष में एक प्रमुख कारण बताया है।
कृषि मंत्री एनी जेनेवार्ड भी कानून के समर्थन में खुलकर सामने आई हैं। उनका कहना है कि खेती पहले से गंभीर आर्थिक दबाव में है और ऐसे समय कानून को केवल राजनीतिक या वैचारिक विरोध के कारण रोकना किसानों की मुश्किल और बढ़ा सकता है। सरकार के समर्थक खेमे का तर्क है कि कानून का मकसद कीटनाशकों के अनियंत्रित इस्तेमाल की अनुमति देना नहीं, बल्कि कुछ बेहद प्रभावित कृषि क्षेत्रों को सीमित अवधि के लिए राहत उपलब्ध कराना है। किसी भी छूट के लिए संबंधित स्वास्थ्य और पर्यावरण एजेंसी की मंजूरी जरूरी होगी और इसे स्थायी अनुमति की तरह नहीं देखा जाना चाहिए।
पर्यावरण संगठनों की आपत्ति इससे बिल्कुल अलग है। उनका कहना है कि मधुमक्खियां और दूसरे परागण करने वाले जीव कृषि व्यवस्था के लिए ही बेहद जरूरी हैं। फल, सब्जी और दूसरी कई फसलों का उत्पादन प्राकृतिक परागण पर निर्भर करता है। ऐसे में अगर किसी रसायन से इन जीवों की आबादी प्रभावित होती है तो कुछ फसलों को तत्काल राहत देने की कोशिश लंबे समय में खेती के लिए ही नुकसानदेह हो सकती है। पर्यावरण समूहों ने यह भी सवाल उठाया है कि जिन रसायनों को पर्यावरणीय चिंताओं के चलते प्रतिबंधित किया गया था, उन्हें आर्थिक दबाव के आधार पर वापस लाने से भविष्य में दूसरे प्रतिबंधों को कमजोर करने का रास्ता खुल सकता है।
सबसे ज्यादा चर्चा एसेटामिप्रिड को लेकर है। यह नियोनिकोटिनॉइड श्रेणी का कीटनाशक है। फ्रांस ने 2018 में इसके इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाया था। मधुमक्खियों और अन्य परागण करने वाले कीड़ों पर इसके संभावित प्रभाव को लेकर लंबे समय से चिंता जताई जाती रही है। हालांकि यूरोपीय संघ के स्तर पर इसका उपयोग पूरी तरह प्रतिबंधित नहीं है। यही अंतर अब फ्रांस में राजनीतिक बहस का बड़ा मुद्दा बन गया है। किसान संगठन पूछ रहे हैं कि यदि यूरोप के दूसरे देशों में इसका इस्तेमाल कानूनी है तो फ्रांस के किसानों पर अलग प्रतिबंध क्यों रहे, जबकि पर्यावरण समूह फ्रांस के कठोर नियमों को जैव विविधता की सुरक्षा के लिए जरूरी मानते हैं।
दूसरा रसायन फ्लुपाइराडीफ्यूरोन है, जिसे भी कुछ फसलों के लिए असाधारण अनुमति के दायरे में लाया जा सकता है। नए कानून में सीधे हर किसान को इन रसायनों का इस्तेमाल शुरू करने की खुली छूट नहीं दी गई है। संबंधित फ्रांसीसी एजेंसी को पहले जोखिम और जरूरत का आकलन करना होगा। इसके बाद खास फसल या कृषि क्षेत्र के लिए सीमित समय की अनुमति संभव होगी। इसी व्यवस्था को सरकार पर्यावरणीय सुरक्षा और किसानों की जरूरत के बीच संतुलन के तौर पर पेश कर रही है, जबकि आलोचकों का कहना है कि प्रतिबंधित रसायनों की वापसी का दरवाजा खुलना अपने आप में चिंताजनक है।
विवाद केवल कीटनाशकों तक सीमित नहीं है। कृषि कानून में पानी के भंडारण से जुड़े नियमों को आसान करने के प्रावधान भी बहस में हैं। किसान लंबे सूखे और गर्मी के दौरान सिंचाई के लिए बड़े जलाशय या कृत्रिम भंडारण व्यवस्था चाहते हैं। उनका कहना है कि जलवायु परिवर्तन के कारण बारिश का पैटर्न बदल रहा है और गर्मियों में पानी की कमी बढ़ रही है। यदि बरसात के समय पानी जमा नहीं किया गया तो सूखे के महीनों में फसल बचाना मुश्किल हो सकता है। कृषि क्षेत्र इसे भविष्य की खाद्य सुरक्षा और खेती को टिकाऊ बनाए रखने के लिए जरूरी कदम बता रहा है।
पर्यावरणविदों की चिंता यहां भी अलग है। बड़े जलाशयों में पानी जमा करने के लिए भूजल या नदियों पर अतिरिक्त दबाव पड़ने की आशंका जताई जाती है। गर्मियों में जब नदियों का जलस्तर पहले ही नीचे होता है, तब बड़े पैमाने पर सिंचाई के लिए पानी निकालना स्थानीय पारिस्थितिकी को नुकसान पहुंचा सकता है। फ्रांस समेत यूरोप के कई हिस्सों ने पिछले वर्षों में गंभीर हीटवेव और सूखे का सामना किया है। ऐसे में पानी किसके लिए और कितनी मात्रा में इस्तेमाल किया जाए, यह अब केवल कृषि का मुद्दा नहीं रहा बल्कि राजनीतिक और पर्यावरणीय विवाद बन चुका है।
फ्रांस में कीटनाशकों को लेकर यह पहला बड़ा टकराव नहीं है। पिछले साल भी एसेटामिप्रिड की वापसी का रास्ता खोलने की कोशिश हुई थी, लेकिन देश की संवैधानिक अदालत ने विवादित कृषि कानून के महत्वपूर्ण हिस्से को रोक दिया था। अदालत ने पर्यावरण और आने वाली पीढ़ियों की सुरक्षा से जुड़े सवाल उठाए थे। उस समय प्रस्ताव के विरोध में 20 लाख से ज्यादा लोगों के हस्ताक्षर वाली याचिका भी सामने आई थी। इसके बाद यह माना जा रहा था कि सरकार इस मुद्दे पर बेहद सावधानी से आगे बढ़ेगी, लेकिन नए आपात कृषि कानून में फिर से सीमित छूट का प्रावधान आने से विवाद लौट आया है।
संसद में भी कानून आसानी से पारित नहीं हुआ। नेशनल असेंबली में इसे 296 के मुकाबले 224 मतों से मंजूरी मिली। इसके बाद सीनेट ने भी अंतिम मतदान में 214-111 से इसे पारित कर दिया। दक्षिणपंथी और रूढ़िवादी दलों के बड़े हिस्से ने कानून का समर्थन किया, जबकि वामपंथी दलों और पर्यावरण समर्थक सांसदों ने विरोध किया। सत्तारूढ़ गठबंधन के भीतर भी कीटनाशक वाले प्रावधान पर मतभेद साफ दिखाई दिए। कुछ सांसद चाहते थे कि एसेटामिप्रिड से जुड़ा हिस्सा अंतिम कानून से हटा दिया जाए, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
बारबू की नाराजगी इसी प्रक्रिया के दौरान बढ़ी। उनका कहना था कि विवादित कीटनाशकों से जुड़े प्रावधानों को हटाने या उन पर दोबारा गंभीर चर्चा की गुंजाइश होनी चाहिए थी। उन्होंने अपने संदेश में राजनीति के कामकाज को लेकर भी निराशा जाहिर की। उनका रुख पर्यावरण समर्थक समूहों के लिए महत्वपूर्ण था, क्योंकि सरकार के भीतर रहते हुए वह खुले तौर पर कृषि कानून के कुछ हिस्सों से असहमति जता रही थीं। जब उन्होंने इस्तीफा देने का फैसला किया तो इसे केवल व्यक्तिगत कदम नहीं, बल्कि मैक्रों सरकार के भीतर नीति संघर्ष के संकेत के रूप में देखा गया।
राष्ट्रपति मैक्रों ने हालांकि उन्हें जाने नहीं दिया। सरकारी प्रवक्ता के मुताबिक राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री दोनों ने बारबू के पर्यावरण संबंधी मिशन को जारी रखने का समर्थन किया है। इसका अर्थ यह भी है कि सरकार अब एक ऐसी स्थिति में है जहां संसद से कानून पारित हो चुका है, लेकिन उसे लागू करने की प्रक्रिया में पर्यावरण मंत्रालय की आपत्तियों और वैज्ञानिक आकलन को भी संभालना होगा। प्रतिबंधित कीटनाशकों के इस्तेमाल की अनुमति स्वतः नहीं मिलेगी, बल्कि अपवाद के तौर पर नियामक प्रक्रिया से गुजरना होगा।
इस विवाद के केंद्र में फ्रांस की दो बड़ी जरूरतें आमने-सामने दिखाई दे रही हैं। एक तरफ किसान हैं, जो बढ़ती लागत, जलवायु परिवर्तन, कीटों से फसल नुकसान और यूरोपीय बाजार में प्रतिस्पर्धा का दबाव झेल रहे हैं। दूसरी तरफ पर्यावरण वैज्ञानिक और संगठन हैं, जो चेतावनी दे रहे हैं कि परागण करने वाले जीवों और जल संसाधनों को नुकसान पहुंचाकर कृषि संकट का स्थायी समाधान नहीं निकाला जा सकता। संसद ने फिलहाल किसानों को सीमित राहत देने वाला रास्ता चुना है, लेकिन कीटनाशकों के लिए वास्तविक छूट देने से पहले फ्रांस की संबंधित एजेंसी की मंजूरी जरूरी होगी। मोनिक बारबू भी राष्ट्रपति मैक्रों द्वारा इस्तीफा स्वीकार न किए जाने के बाद फिलहाल सरकार में पर्यावरण मंत्री के रूप में काम जारी रखेंगी।
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