न्यायिक अधिकारियों की रिटायरमेंट उम्र बढ़ाने पर SC की पहल, राज्यों से मांगा फैसला

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सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को हाईकोर्ट से चर्चा कर दो सप्ताह में रुख बताने को कहा, सहमति बनी तो 61 साल तक सेवा जारी रखने का मिल सकता है मौका

देश की जिला न्यायपालिका में काम कर रहे न्यायिक अधिकारियों की सेवानिवृत्ति की उम्र बढ़ाने को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने अहम पहल की है। शीर्ष अदालत ने बुधवार को सभी राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों से कहा कि वे अपने क्षेत्राधिकार वाले हाईकोर्ट से सलाह-मशविरा कर इस बात पर फैसला लें कि न्यायिक अधिकारियों की मौजूदा 60 वर्ष की रिटायरमेंट उम्र को एक साल बढ़ाकर 61 वर्ष किया जा सकता है या नहीं। जिन राज्यों में सरकार और संबंधित हाईकोर्ट के बीच इस प्रस्ताव पर सहमति बनती है, वहां पात्र न्यायिक अधिकारियों को 61 वर्ष की उम्र तक सेवा जारी रखने की अनुमति मिल सकती है। अदालत के सामने मुख्य मांग पूरे देश में जिला न्यायपालिका के अधिकारियों की रिटायरमेंट उम्र 60 से बढ़ाकर 62 वर्ष करने की है, जिस पर अभी अंतिम निर्णय होना बाकी है।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ इस मामले की सुनवाई कर रही है। पीठ में जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहन भी शामिल हैं। सुनवाई के दौरान अदालत ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश दिया कि वे संबंधित हाईकोर्ट के साथ विचार-विमर्श करें और दो सप्ताह के भीतर अपना पक्ष रिकॉर्ड पर रखें। इसी अवधि में हाईकोर्ट को भी अपना जवाब दाखिल करने को कहा गया है। इस प्रक्रिया के जरिए सुप्रीम कोर्ट यह जानना चाहता है कि अलग-अलग राज्यों और हाईकोर्ट का न्यायिक अधिकारियों की सेवा अवधि बढ़ाने के प्रस्ताव पर क्या रुख है और इसे लागू करने में किस तरह की व्यावहारिक या प्रशासनिक परिस्थितियां सामने आ सकती हैं।

अदालत के निर्देश के मुताबिक, जिन जगहों पर राज्य सरकार और हाईकोर्ट दोनों न्यायिक अधिकारियों को 61 वर्ष तक सेवा में रखने पर सहमत होते हैं, वहां यह व्यवस्था लागू की जा सकेगी। उपलब्ध जानकारी के अनुसार इसे 1 अप्रैल 2026 से प्रभावी मानने की बात कही गई है। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया है कि यह व्यवस्था फिलहाल मामले में आने वाले अंतिम फैसले के अधीन रहेगी। यानी इसे न्यायिक अधिकारियों की रिटायरमेंट उम्र स्थायी रूप से 61 या 62 वर्ष किए जाने का अंतिम आदेश नहीं माना जा सकता। मामले पर आगे की सुनवाई और सभी पक्षों का रुख सामने आने के बाद ही व्यापक स्तर पर स्थिति स्पष्ट होगी।

यह मामला देशभर की अधीनस्थ और जिला न्यायपालिका में कार्यरत न्यायिक अधिकारियों की सेवा अवधि से जुड़ा है। याचिका में मांग की गई है कि पूरे भारत में जिला न्यायपालिका के जजों और अन्य संबंधित न्यायिक अधिकारियों की सेवानिवृत्ति की आयु में एकरूपता लाते हुए इसे मौजूदा 60 वर्ष से बढ़ाकर 62 वर्ष किया जाए। याचिकाकर्ताओं की मांग पर विचार करते हुए अदालत ने फिलहाल एक साल की बढ़ोतरी यानी 61 वर्ष तक सेवा जारी रखने की संभावना पर राज्यों और हाईकोर्ट से राय मांगी है। इस कदम को अंतिम फैसले से पहले एक अंतरिम व्यवस्था की दिशा में महत्वपूर्ण प्रक्रिया के रूप में देखा जा रहा है।

जिला न्यायपालिका देश की न्यायिक व्यवस्था का सबसे बड़ा और आम नागरिकों से सीधे जुड़ा हिस्सा है। अधिकांश दीवानी और आपराधिक मामलों की शुरुआती सुनवाई जिला और अधीनस्थ अदालतों में ही होती है। पारिवारिक विवाद, संपत्ति के मामले, आपराधिक मुकदमे, जमानत, घरेलू विवाद और दूसरे कई तरह के मामले सबसे पहले इन्हीं अदालतों तक पहुंचते हैं। ऐसे में यहां काम करने वाले अनुभवी न्यायिक अधिकारियों की सेवा अवधि में बदलाव का असर केवल उनकी नौकरी तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि न्यायिक प्रशासन, लंबित मामलों और नई नियुक्तियों की प्रक्रिया पर भी पड़ सकता है।

रिटायरमेंट उम्र बढ़ाने की मांग के पीछे एक अहम तर्क अनुभवी न्यायिक अधिकारियों की सेवाओं का लंबे समय तक उपयोग करना भी है। जिला न्यायपालिका में वर्षों तक काम करने वाले जजों को न्यायिक प्रक्रिया, स्थानीय प्रशासन और मामलों के निपटारे का व्यापक अनुभव होता है। यदि उनकी सेवा अवधि एक या दो साल बढ़ाई जाती है तो न्यायपालिका को इस अनुभव का अतिरिक्त समय तक लाभ मिल सकता है। दूसरी तरफ इस तरह के फैसले का सीधा संबंध पदोन्नति और नई भर्तियों से भी जुड़ता है, इसलिए राज्यों और हाईकोर्ट की राय को महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

यदि किसी न्यायिक अधिकारी की सेवानिवृत्ति की उम्र 60 से बढ़ाकर 61 या 62 वर्ष होती है तो उसके नीचे के पदों पर कार्यरत अधिकारियों की पदोन्नति का क्रम भी प्रभावित हो सकता है। इसी तरह नई रिक्तियां बनने की रफ्तार में बदलाव आ सकता है। यही कारण है कि पूरे देश में एक साथ कोई व्यवस्था लागू करने से पहले प्रशासनिक ढांचे, खाली पदों, भर्ती प्रक्रिया और न्यायिक अधिकारियों की संख्या जैसे पहलुओं पर विचार करना जरूरी माना जाता है। सुप्रीम कोर्ट ने इसी वजह से राज्यों के साथ संबंधित हाईकोर्ट को भी इस प्रक्रिया में शामिल किया है।

संविधान के तहत अधीनस्थ न्यायपालिका के प्रशासन में हाईकोर्ट की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। जिला न्यायपालिका से जुड़े अधिकारियों की नियुक्ति, पदोन्नति और सेवा से जुड़े कई मामलों में राज्य सरकार तथा हाईकोर्ट के बीच समन्वय जरूरी होता है। इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों से अकेले फैसला लेने के बजाय संबंधित हाईकोर्ट से परामर्श करने को कहा है। दोनों पक्षों की सहमति बनने के बाद ही 61 वर्ष तक सेवा जारी रखने की अंतरिम व्यवस्था लागू किए जाने का रास्ता खुल सकता है।

अदालत ने इस प्रक्रिया को लंबे समय तक लंबित रखने के बजाय स्पष्ट समयसीमा भी तय की है। राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों को दो सप्ताह के भीतर अपना पक्ष दाखिल करना होगा। संबंधित हाईकोर्ट को भी इसी अवधि के भीतर अपनी राय रिकॉर्ड पर रखनी है। इससे अगली सुनवाई के दौरान अदालत के सामने देश के अलग-अलग हिस्सों की स्थिति की एक व्यापक तस्वीर मौजूद होगी। इसके आधार पर यह देखा जा सकेगा कि रिटायरमेंट उम्र बढ़ाने के प्रस्ताव को लेकर कितने राज्यों में सहमति है और किन जगहों पर प्रशासनिक या अन्य आपत्तियां सामने आती हैं।

मामले का एक महत्वपूर्ण पहलू पूरे देश में एक समान व्यवस्था की मांग भी है। अलग-अलग राज्यों में सेवा नियमों और न्यायिक अधिकारियों की परिस्थितियों में अंतर हो सकता है। याचिका में 62 वर्ष तक सेवा की मांग इसी आधार पर की गई है कि जिला न्यायपालिका के अधिकारियों के लिए सेवानिवृत्ति की उम्र को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर स्पष्ट और समान व्यवस्था बनाई जाए। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने अभी सीधे 62 वर्ष की उम्र तय नहीं की है। फिलहाल 61 वर्ष तक सेवा विस्तार की संभावना पर राज्यों और हाईकोर्ट की राय लेने का रास्ता अपनाया गया है।

इस प्रस्ताव के लागू होने का असर बड़ी संख्या में उन न्यायिक अधिकारियों पर पड़ सकता है जो 60 वर्ष की आयु पूरी करने के करीब हैं। यदि संबंधित राज्य और हाईकोर्ट सहमत होते हैं और अदालत की अंतरिम व्यवस्था उन पर लागू होती है तो उन्हें एक अतिरिक्त वर्ष तक सेवा देने का अवसर मिल सकता है। हालांकि किन अधिकारियों को इसका लाभ मिलेगा, पात्रता कैसे तय होगी और सेवा संबंधी अन्य शर्तें क्या होंगी, यह संबंधित नियमों और आगे आने वाले आदेशों पर निर्भर करेगा।

न्यायपालिका में लंबित मामलों की संख्या को देखते हुए भी इस मुद्दे को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। जिला अदालतों पर मामलों का बड़ा बोझ रहता है और कई जगह न्यायिक अधिकारियों के रिक्त पद भी कामकाज को प्रभावित करते हैं। अनुभवी अधिकारियों को अतिरिक्त समय तक सेवा में बनाए रखने से कुछ हद तक उपलब्ध न्यायिक क्षमता बनी रह सकती है। इसके उलट यदि रिटायरमेंट में देरी होती है तो नए अधिकारियों की भर्ती और मौजूदा अधिकारियों की पदोन्नति की गति पर क्या असर पड़ेगा, यह भी राज्यों और हाईकोर्ट को अपनी राय तैयार करते समय देखना होगा।

सुप्रीम कोर्ट के सामने मूल मांग रिटायरमेंट उम्र सीधे 62 वर्ष करने की है। ऐसे में 61 वर्ष तक सेवा जारी रखने का प्रस्ताव एक अंतरिम रास्ते के रूप में सामने आया है। अदालत ने इसे राज्यों और हाईकोर्ट की सहमति से जोड़ दिया है। इसका मतलब यह है कि फिलहाल पूरे देश में स्वतः एक जैसी व्यवस्था लागू नहीं होगी। जहां दोनों संस्थाओं के बीच सहमति बनेगी, वहां आगे की प्रक्रिया संभव होगी और जहां मतभेद होगा, वहां संबंधित पक्षों का रुख सुप्रीम कोर्ट के सामने रखा जाएगा।

अदालत ने यह भी साफ रखा है कि 61 वर्ष तक सेवा जारी रखने की संभावित व्यवस्था मामले के अंतिम नतीजे पर निर्भर करेगी। याचिका में 62 वर्ष तक रिटायरमेंट उम्र बढ़ाने की मांग पर अभी विस्तृत विचार होना बाकी है। राज्यों और हाईकोर्ट से मिलने वाले जवाब इस मामले में महत्वपूर्ण होंगे, क्योंकि इन्हीं से अलग-अलग प्रदेशों में जिला न्यायपालिका की वास्तविक प्रशासनिक स्थिति, रिक्त पदों और सेवा नियमों को लेकर अदालत के सामने तथ्य आएंगे।

दो सप्ताह की समयसीमा के भीतर राज्य सरकारों, केंद्र शासित प्रदेशों और हाईकोर्ट की ओर से जवाब आने के बाद इस मुद्दे पर आगे की तस्वीर अधिक स्पष्ट होने की उम्मीद है। खासतौर पर यह देखा जाएगा कि कितने राज्य एक साल की तत्काल बढ़ोतरी के पक्ष में हैं और 62 वर्ष की समान सेवानिवृत्ति आयु की मूल मांग पर उनका क्या पक्ष है।

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22 Jul 2026 By Priyanka

न्यायिक अधिकारियों की रिटायरमेंट उम्र बढ़ाने पर SC की पहल, राज्यों से मांगा फैसला

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देश की जिला न्यायपालिका में काम कर रहे न्यायिक अधिकारियों की सेवानिवृत्ति की उम्र बढ़ाने को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने अहम पहल की है। शीर्ष अदालत ने बुधवार को सभी राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों से कहा कि वे अपने क्षेत्राधिकार वाले हाईकोर्ट से सलाह-मशविरा कर इस बात पर फैसला लें कि न्यायिक अधिकारियों की मौजूदा 60 वर्ष की रिटायरमेंट उम्र को एक साल बढ़ाकर 61 वर्ष किया जा सकता है या नहीं। जिन राज्यों में सरकार और संबंधित हाईकोर्ट के बीच इस प्रस्ताव पर सहमति बनती है, वहां पात्र न्यायिक अधिकारियों को 61 वर्ष की उम्र तक सेवा जारी रखने की अनुमति मिल सकती है। अदालत के सामने मुख्य मांग पूरे देश में जिला न्यायपालिका के अधिकारियों की रिटायरमेंट उम्र 60 से बढ़ाकर 62 वर्ष करने की है, जिस पर अभी अंतिम निर्णय होना बाकी है।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ इस मामले की सुनवाई कर रही है। पीठ में जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहन भी शामिल हैं। सुनवाई के दौरान अदालत ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश दिया कि वे संबंधित हाईकोर्ट के साथ विचार-विमर्श करें और दो सप्ताह के भीतर अपना पक्ष रिकॉर्ड पर रखें। इसी अवधि में हाईकोर्ट को भी अपना जवाब दाखिल करने को कहा गया है। इस प्रक्रिया के जरिए सुप्रीम कोर्ट यह जानना चाहता है कि अलग-अलग राज्यों और हाईकोर्ट का न्यायिक अधिकारियों की सेवा अवधि बढ़ाने के प्रस्ताव पर क्या रुख है और इसे लागू करने में किस तरह की व्यावहारिक या प्रशासनिक परिस्थितियां सामने आ सकती हैं।

अदालत के निर्देश के मुताबिक, जिन जगहों पर राज्य सरकार और हाईकोर्ट दोनों न्यायिक अधिकारियों को 61 वर्ष तक सेवा में रखने पर सहमत होते हैं, वहां यह व्यवस्था लागू की जा सकेगी। उपलब्ध जानकारी के अनुसार इसे 1 अप्रैल 2026 से प्रभावी मानने की बात कही गई है। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया है कि यह व्यवस्था फिलहाल मामले में आने वाले अंतिम फैसले के अधीन रहेगी। यानी इसे न्यायिक अधिकारियों की रिटायरमेंट उम्र स्थायी रूप से 61 या 62 वर्ष किए जाने का अंतिम आदेश नहीं माना जा सकता। मामले पर आगे की सुनवाई और सभी पक्षों का रुख सामने आने के बाद ही व्यापक स्तर पर स्थिति स्पष्ट होगी।

यह मामला देशभर की अधीनस्थ और जिला न्यायपालिका में कार्यरत न्यायिक अधिकारियों की सेवा अवधि से जुड़ा है। याचिका में मांग की गई है कि पूरे भारत में जिला न्यायपालिका के जजों और अन्य संबंधित न्यायिक अधिकारियों की सेवानिवृत्ति की आयु में एकरूपता लाते हुए इसे मौजूदा 60 वर्ष से बढ़ाकर 62 वर्ष किया जाए। याचिकाकर्ताओं की मांग पर विचार करते हुए अदालत ने फिलहाल एक साल की बढ़ोतरी यानी 61 वर्ष तक सेवा जारी रखने की संभावना पर राज्यों और हाईकोर्ट से राय मांगी है। इस कदम को अंतिम फैसले से पहले एक अंतरिम व्यवस्था की दिशा में महत्वपूर्ण प्रक्रिया के रूप में देखा जा रहा है।

जिला न्यायपालिका देश की न्यायिक व्यवस्था का सबसे बड़ा और आम नागरिकों से सीधे जुड़ा हिस्सा है। अधिकांश दीवानी और आपराधिक मामलों की शुरुआती सुनवाई जिला और अधीनस्थ अदालतों में ही होती है। पारिवारिक विवाद, संपत्ति के मामले, आपराधिक मुकदमे, जमानत, घरेलू विवाद और दूसरे कई तरह के मामले सबसे पहले इन्हीं अदालतों तक पहुंचते हैं। ऐसे में यहां काम करने वाले अनुभवी न्यायिक अधिकारियों की सेवा अवधि में बदलाव का असर केवल उनकी नौकरी तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि न्यायिक प्रशासन, लंबित मामलों और नई नियुक्तियों की प्रक्रिया पर भी पड़ सकता है।

रिटायरमेंट उम्र बढ़ाने की मांग के पीछे एक अहम तर्क अनुभवी न्यायिक अधिकारियों की सेवाओं का लंबे समय तक उपयोग करना भी है। जिला न्यायपालिका में वर्षों तक काम करने वाले जजों को न्यायिक प्रक्रिया, स्थानीय प्रशासन और मामलों के निपटारे का व्यापक अनुभव होता है। यदि उनकी सेवा अवधि एक या दो साल बढ़ाई जाती है तो न्यायपालिका को इस अनुभव का अतिरिक्त समय तक लाभ मिल सकता है। दूसरी तरफ इस तरह के फैसले का सीधा संबंध पदोन्नति और नई भर्तियों से भी जुड़ता है, इसलिए राज्यों और हाईकोर्ट की राय को महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

यदि किसी न्यायिक अधिकारी की सेवानिवृत्ति की उम्र 60 से बढ़ाकर 61 या 62 वर्ष होती है तो उसके नीचे के पदों पर कार्यरत अधिकारियों की पदोन्नति का क्रम भी प्रभावित हो सकता है। इसी तरह नई रिक्तियां बनने की रफ्तार में बदलाव आ सकता है। यही कारण है कि पूरे देश में एक साथ कोई व्यवस्था लागू करने से पहले प्रशासनिक ढांचे, खाली पदों, भर्ती प्रक्रिया और न्यायिक अधिकारियों की संख्या जैसे पहलुओं पर विचार करना जरूरी माना जाता है। सुप्रीम कोर्ट ने इसी वजह से राज्यों के साथ संबंधित हाईकोर्ट को भी इस प्रक्रिया में शामिल किया है।

संविधान के तहत अधीनस्थ न्यायपालिका के प्रशासन में हाईकोर्ट की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। जिला न्यायपालिका से जुड़े अधिकारियों की नियुक्ति, पदोन्नति और सेवा से जुड़े कई मामलों में राज्य सरकार तथा हाईकोर्ट के बीच समन्वय जरूरी होता है। इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों से अकेले फैसला लेने के बजाय संबंधित हाईकोर्ट से परामर्श करने को कहा है। दोनों पक्षों की सहमति बनने के बाद ही 61 वर्ष तक सेवा जारी रखने की अंतरिम व्यवस्था लागू किए जाने का रास्ता खुल सकता है।

अदालत ने इस प्रक्रिया को लंबे समय तक लंबित रखने के बजाय स्पष्ट समयसीमा भी तय की है। राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों को दो सप्ताह के भीतर अपना पक्ष दाखिल करना होगा। संबंधित हाईकोर्ट को भी इसी अवधि के भीतर अपनी राय रिकॉर्ड पर रखनी है। इससे अगली सुनवाई के दौरान अदालत के सामने देश के अलग-अलग हिस्सों की स्थिति की एक व्यापक तस्वीर मौजूद होगी। इसके आधार पर यह देखा जा सकेगा कि रिटायरमेंट उम्र बढ़ाने के प्रस्ताव को लेकर कितने राज्यों में सहमति है और किन जगहों पर प्रशासनिक या अन्य आपत्तियां सामने आती हैं।

मामले का एक महत्वपूर्ण पहलू पूरे देश में एक समान व्यवस्था की मांग भी है। अलग-अलग राज्यों में सेवा नियमों और न्यायिक अधिकारियों की परिस्थितियों में अंतर हो सकता है। याचिका में 62 वर्ष तक सेवा की मांग इसी आधार पर की गई है कि जिला न्यायपालिका के अधिकारियों के लिए सेवानिवृत्ति की उम्र को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर स्पष्ट और समान व्यवस्था बनाई जाए। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने अभी सीधे 62 वर्ष की उम्र तय नहीं की है। फिलहाल 61 वर्ष तक सेवा विस्तार की संभावना पर राज्यों और हाईकोर्ट की राय लेने का रास्ता अपनाया गया है।

इस प्रस्ताव के लागू होने का असर बड़ी संख्या में उन न्यायिक अधिकारियों पर पड़ सकता है जो 60 वर्ष की आयु पूरी करने के करीब हैं। यदि संबंधित राज्य और हाईकोर्ट सहमत होते हैं और अदालत की अंतरिम व्यवस्था उन पर लागू होती है तो उन्हें एक अतिरिक्त वर्ष तक सेवा देने का अवसर मिल सकता है। हालांकि किन अधिकारियों को इसका लाभ मिलेगा, पात्रता कैसे तय होगी और सेवा संबंधी अन्य शर्तें क्या होंगी, यह संबंधित नियमों और आगे आने वाले आदेशों पर निर्भर करेगा।

न्यायपालिका में लंबित मामलों की संख्या को देखते हुए भी इस मुद्दे को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। जिला अदालतों पर मामलों का बड़ा बोझ रहता है और कई जगह न्यायिक अधिकारियों के रिक्त पद भी कामकाज को प्रभावित करते हैं। अनुभवी अधिकारियों को अतिरिक्त समय तक सेवा में बनाए रखने से कुछ हद तक उपलब्ध न्यायिक क्षमता बनी रह सकती है। इसके उलट यदि रिटायरमेंट में देरी होती है तो नए अधिकारियों की भर्ती और मौजूदा अधिकारियों की पदोन्नति की गति पर क्या असर पड़ेगा, यह भी राज्यों और हाईकोर्ट को अपनी राय तैयार करते समय देखना होगा।

सुप्रीम कोर्ट के सामने मूल मांग रिटायरमेंट उम्र सीधे 62 वर्ष करने की है। ऐसे में 61 वर्ष तक सेवा जारी रखने का प्रस्ताव एक अंतरिम रास्ते के रूप में सामने आया है। अदालत ने इसे राज्यों और हाईकोर्ट की सहमति से जोड़ दिया है। इसका मतलब यह है कि फिलहाल पूरे देश में स्वतः एक जैसी व्यवस्था लागू नहीं होगी। जहां दोनों संस्थाओं के बीच सहमति बनेगी, वहां आगे की प्रक्रिया संभव होगी और जहां मतभेद होगा, वहां संबंधित पक्षों का रुख सुप्रीम कोर्ट के सामने रखा जाएगा।

अदालत ने यह भी साफ रखा है कि 61 वर्ष तक सेवा जारी रखने की संभावित व्यवस्था मामले के अंतिम नतीजे पर निर्भर करेगी। याचिका में 62 वर्ष तक रिटायरमेंट उम्र बढ़ाने की मांग पर अभी विस्तृत विचार होना बाकी है। राज्यों और हाईकोर्ट से मिलने वाले जवाब इस मामले में महत्वपूर्ण होंगे, क्योंकि इन्हीं से अलग-अलग प्रदेशों में जिला न्यायपालिका की वास्तविक प्रशासनिक स्थिति, रिक्त पदों और सेवा नियमों को लेकर अदालत के सामने तथ्य आएंगे।

दो सप्ताह की समयसीमा के भीतर राज्य सरकारों, केंद्र शासित प्रदेशों और हाईकोर्ट की ओर से जवाब आने के बाद इस मुद्दे पर आगे की तस्वीर अधिक स्पष्ट होने की उम्मीद है। खासतौर पर यह देखा जाएगा कि कितने राज्य एक साल की तत्काल बढ़ोतरी के पक्ष में हैं और 62 वर्ष की समान सेवानिवृत्ति आयु की मूल मांग पर उनका क्या पक्ष है।

https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/scs-initiative-seeks-decision-from-states-on-increasing-the-retirement/article-59509

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