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मनीला में क्वाड का बड़ा संदेश, स्वतंत्र हिंद-प्रशांत और संप्रभुता पर चारों देश एकजुट
अंतराष्ट्रीय न्यूज
भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के विदेश मंत्रियों ने क्षेत्रीय सुरक्षा पर की चर्चा; दक्षिण चीन सागर में चीन-फिलीपींस के ताजा टकराव के बीच अंतरराष्ट्रीय कानून और क्षेत्रीय अखंडता पर जोर
दक्षिण चीन सागर में बढ़ते तनाव के बीच भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया ने एक बार फिर स्वतंत्र, खुले और नियम आधारित हिंद-प्रशांत क्षेत्र के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई है। फिलीपींस की राजधानी मनीला में बुधवार को हुई क्वाड विदेश मंत्रियों की बैठक में चारों देशों ने संप्रभुता, क्षेत्रीय अखंडता और अंतरराष्ट्रीय कानून के सम्मान को क्षेत्रीय स्थिरता के लिए जरूरी बताया। बैठक आसियान से जुड़ी विदेश मंत्रियों की बैठकों के दौरान हुई। इसमें भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर, अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो, जापान के विदेश मंत्री तोशिमित्सु मोतेगी और ऑस्ट्रेलिया की विदेश मंत्री पेनी वोंग शामिल हुए। बैठक में चीन का सीधे नाम लेने से बचा गया, लेकिन दक्षिण और पूर्वी चीन सागर में हाल के घटनाक्रम के बीच चारों देशों के संदेश को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। जापान के विदेश मंत्रालय के मुताबिक बैठक करीब एक घंटे चली।
क्वाड देशों की यह बैठक ऐसे समय हुई है, जब दक्षिण चीन सागर एक बार फिर तनाव का बड़ा केंद्र बना हुआ है। फिलीपींस और चीन के बीच समुद्री क्षेत्रों को लेकर लंबे समय से विवाद चल रहा है और हाल में सेकेंड थॉमस शोल के पास दोनों देशों के कर्मियों के बीच नया टकराव सामने आया। फिलीपींस ने आरोप लगाया कि चीनी कोस्ट गार्ड के एक सदस्य ने उसके एक नाविक के सिर पर लकड़ी के डंडे से हमला किया और उसकी नाव को नुकसान पहुंचाया। चीन ने इन आरोपों को खारिज करते हुए फिलीपींस पर उकसावे वाली कार्रवाई का आरोप लगाया। दोनों पक्षों के अलग-अलग दावों के बीच इस घटना ने क्षेत्र में पहले से मौजूद तनाव को और बढ़ा दिया है।
मनीला की बैठक में चारों विदेश मंत्रियों ने हिंद-प्रशांत क्षेत्र की मौजूदा परिस्थितियों पर विस्तार से चर्चा की। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने कहा कि क्वाड देशों ने बदलते क्षेत्रीय परिदृश्य की समीक्षा की और पिछली विदेश मंत्री स्तरीय बैठक में लिए गए फैसलों की प्रगति को भी देखा। भारत ने स्वतंत्र, खुला, समावेशी और समृद्ध हिंद-प्रशांत क्षेत्र के अपने पुराने रुख को फिर दोहराया। इसके साथ ही आसियान की केंद्रीय भूमिका पर जोर दिया गया। क्वाड लंबे समय से कहता रहा है कि क्षेत्रीय व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए जिसमें किसी भी देश की संप्रभुता और स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता का सम्मान हो।
बैठक का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा नियम आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था पर दिया गया जोर रहा। क्वाड देशों ने संकेत दिया कि समुद्री सीमाओं से जुड़े विवादों का समाधान अंतरराष्ट्रीय कानून और शांतिपूर्ण तरीकों के तहत होना चाहिए। हिंद-प्रशांत दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री व्यापार मार्गों वाला क्षेत्र है। यहां किसी भी तरह का बड़ा सैन्य या राजनीतिक तनाव केवल आसपास के देशों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वैश्विक व्यापार, ऊर्जा आपूर्ति और आपूर्ति श्रृंखला पर भी उसका असर पड़ सकता है। इसी वजह से समुद्री सुरक्षा और नौवहन की स्वतंत्रता क्वाड के एजेंडे में लगातार प्रमुख मुद्दे बने हुए हैं।
अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने भी संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता को लेकर चारों देशों के साझा रुख पर जोर दिया। अमेरिका हिंद-प्रशांत में क्वाड को अपनी महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदारियों में शामिल करता है। मनीला में रुबियो की मौजूदगी इसलिए भी अहम रही क्योंकि उन्होंने इसी दौरान चीन के विदेश मंत्री वांग यी से भी मुलाकात की। दोनों नेताओं के बीच करीब 90 मिनट बातचीत हुई, जिसमें अमेरिका-चीन संबंधों के साथ ताइवान और दक्षिण चीन सागर जैसे संवेदनशील मुद्दों की पृष्ठभूमि भी रही। रुबियो ने चीन के साथ मतभेदों के बावजूद संवाद बनाए रखने की जरूरत बताई।
क्वाड की बैठक में चीन का नाम सीधे तौर पर प्रमुखता से नहीं लिया गया, लेकिन संप्रभुता, क्षेत्रीय अखंडता, अंतरराष्ट्रीय कानून और समुद्री स्थिरता जैसे शब्दों पर जोर को बीजिंग की बढ़ती समुद्री गतिविधियों की पृष्ठभूमि में देखा जा रहा है। चीन दक्षिण चीन सागर के बड़े हिस्से पर अपना दावा करता है। दूसरी ओर फिलीपींस, वियतनाम, मलेशिया, ब्रुनेई और ताइवान के भी अलग-अलग क्षेत्रों पर दावे हैं। इन्हीं परस्पर दावों के कारण यह इलाका लंबे समय से एशिया के सबसे संवेदनशील समुद्री क्षेत्रों में शामिल है।
ताजा विवाद सेकेंड थॉमस शोल के आसपास हुआ है, जिसे फिलीपींस अयुंगिन शोल और चीन रेनआई जियाओ कहता है। यहां फिलीपींस ने वर्षों से अपनी मौजूदगी बनाए रखी है। इलाके में फिलीपींस के मिशनों और चीनी जहाजों के बीच पहले भी कई बार आमना-सामना हो चुका है। इस बार की घटना में दोनों देशों ने एक-दूसरे पर आक्रामक व्यवहार का आरोप लगाया। फिलीपींस का दावा है कि उसके एक नाविक को चोट पहुंची, जबकि चीन का कहना है कि फिलीपींस की ओर से पहले उकसावे की कार्रवाई की गई थी।
इस घटना का समय भी महत्वपूर्ण है। मनीला में आसियान से जुड़े उच्च स्तरीय राजनयिक कार्यक्रम चल रहे हैं और कई देशों के विदेश मंत्री फिलीपींस पहुंचे हैं। ऐसे माहौल में दक्षिण चीन सागर का तनाव स्वाभाविक रूप से बातचीत के केंद्र में आ गया। आसियान देश लंबे समय से चाहते हैं कि दक्षिण चीन सागर में ऐसी आचार संहिता बने जिससे टकराव की संभावना कम की जा सके। हालांकि इस दिशा में बातचीत वर्षों से चल रही है और कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर सहमति बनना अभी बाकी है।
भारत के लिए हिंद-प्रशांत केवल सुरक्षा का मुद्दा नहीं है। नई दिल्ली इसे व्यापार, समुद्री संपर्क, ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक साझेदारी से भी जोड़कर देखती है। भारत का बड़ा हिस्सा समुद्री व्यापार पर निर्भर है और दक्षिण चीन सागर से होकर दुनिया के महत्वपूर्ण व्यापारिक मार्ग गुजरते हैं। किसी भी तरह की अस्थिरता का असर माल ढुलाई, ऊर्जा कीमतों और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला पर पड़ सकता है। यही वजह है कि भारत लगातार नौवहन की स्वतंत्रता, अंतरराष्ट्रीय कानून के सम्मान और विवादों के शांतिपूर्ण समाधान की बात करता रहा है।
क्वाड के भीतर भारत की भूमिका भी पिछले कुछ वर्षों में व्यापक हुई है। यह समूह अब केवल समुद्री या सैन्य सुरक्षा की चर्चाओं तक सीमित नहीं है। महत्वपूर्ण खनिज, नई तकनीक, साइबर सुरक्षा, स्वास्थ्य, आपदा राहत, आपूर्ति श्रृंखला और समुद्री क्षेत्र की निगरानी जैसे विषय भी इसके एजेंडे में शामिल हो चुके हैं। चारों देशों की कोशिश है कि क्वाड को केवल किसी एक देश के खिलाफ बने सुरक्षा समूह के रूप में पेश न किया जाए, बल्कि हिंद-प्रशांत में व्यावहारिक सहयोग के मंच के रूप में आगे बढ़ाया जाए।
मनीला में जयशंकर और मार्को रुबियो के बीच अलग से द्विपक्षीय मुलाकात भी हुई। दोनों नेताओं ने व्यापार, शुल्क, ऊर्जा, रक्षा और क्षेत्रीय सुरक्षा जैसे विषयों पर बातचीत की। महत्वपूर्ण खनिजों और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के क्षेत्र में सहयोग भी चर्चा में रहा। इससे साफ है कि क्वाड के भीतर रणनीतिक सुरक्षा के साथ आर्थिक और तकनीकी साझेदारी भी तेजी से महत्वपूर्ण होती जा रही है। खासकर महत्वपूर्ण खनिजों की आपूर्ति को लेकर चारों देश वैकल्पिक और भरोसेमंद आपूर्ति श्रृंखला तैयार करने पर जोर दे रहे हैं।
क्वाड की रणनीति में आसियान का महत्व भी बार-बार सामने आया। दक्षिण-पूर्व एशिया हिंद-प्रशांत की भौगोलिक और आर्थिक संरचना के केंद्र में है। भारत सहित क्वाड के चारों सदस्य यह कहते रहे हैं कि क्षेत्र में बनने वाली किसी भी सुरक्षा या आर्थिक व्यवस्था में आसियान की केंद्रीय भूमिका बनी रहनी चाहिए। मनीला बैठक में भी इसी नीति को दोहराया गया। इसका राजनीतिक महत्व इसलिए है क्योंकि दक्षिण चीन सागर विवाद में आसियान के कई सदस्य सीधे तौर पर प्रभावित हैं।
फिलीपींस और अमेरिका के बीच रक्षा संधि भी मौजूदा तनाव को ज्यादा संवेदनशील बनाती है। वॉशिंगटन पहले कई बार कह चुका है कि दक्षिण चीन सागर में फिलीपींस के सार्वजनिक जहाजों, विमानों या सशस्त्र बलों पर हमला होने की स्थिति में दोनों देशों की पारस्परिक रक्षा संधि लागू हो सकती है। ताजा तनाव के बीच रुबियो ने भी फिलीपींस के प्रति अमेरिकी प्रतिबद्धता दोहराई है। इससे किसी स्थानीय समुद्री टकराव के बड़े रणनीतिक संकट में बदलने का खतरा हमेशा बना रहता है।
चीन दूसरी ओर क्वाड को संदेह की नजर से देखता रहा है और समय-समय पर ऐसे क्षेत्रीय समूहों की आलोचना करता आया है जिन्हें वह अपने खिलाफ रणनीतिक घेराबंदी से जोड़कर देखता है। क्वाड देश इस व्याख्या को स्वीकार नहीं करते। उनका कहना है कि समूह का उद्देश्य स्वतंत्र, खुला और स्थिर हिंद-प्रशांत सुनिश्चित करना है। इसी वजह से मनीला बैठक में भाषा को सावधानी से रखा गया और किसी देश का नाम लिए बिना नियमों, संप्रभुता और अंतरराष्ट्रीय कानून को केंद्र में रखा गया।
समुद्री सुरक्षा के अलावा मानवीय सहायता और प्राकृतिक आपदाओं के समय आपसी सहयोग भी क्वाड के काम का अहम हिस्सा है। हिंद-प्रशांत क्षेत्र चक्रवात, भूकंप, सुनामी और दूसरी प्राकृतिक आपदाओं के लिहाज से संवेदनशील है। चारों देश राहत सामग्री, आपातकालीन सहायता और तकनीकी संसाधनों को तेजी से उपलब्ध कराने के लिए आपसी तालमेल बढ़ाने पर काम कर रहे हैं। समुद्री क्षेत्र की जानकारी साझा करना भी महत्वपूर्ण क्षेत्र है, जिससे अवैध मछली पकड़ने और संदिग्ध समुद्री गतिविधियों की पहचान में मदद मिल सकती है।
क्वाड के सामने आर्थिक सुरक्षा भी अब बड़ी चुनौती बन रही है। सेमीकंडक्टर, दुर्लभ खनिज, बैटरी तकनीक और दूसरे महत्वपूर्ण संसाधनों की आपूर्ति कुछ चुनिंदा देशों पर अधिक निर्भर है। कोविड महामारी और बाद के भू-राजनीतिक संकटों ने दिखाया कि किसी एक क्षेत्र में संकट आने पर पूरी दुनिया की आपूर्ति व्यवस्था प्रभावित हो सकती है। इसी कारण भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया महत्वपूर्ण खनिजों और तकनीकी आपूर्ति श्रृंखला में सहयोग बढ़ाने की दिशा में काम कर रहे हैं।
मनीला की बैठक में चारों देशों का संदेश इस लिहाज से साफ रहा कि हिंद-प्रशांत में किसी भी विवाद का समाधान दबाव या एकतरफा कार्रवाई के बजाय नियमों और बातचीत के आधार पर होना चाहिए। दक्षिण चीन सागर में फिलीपींस और चीन के बीच ताजा टकराव ने इस संदेश को और महत्वपूर्ण बना दिया है। चीन का नाम सीधे लिए बिना संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता पर बार-बार जोर देना मौजूदा क्षेत्रीय परिस्थितियों से जुड़ा दिखाई देता है। वहीं क्वाड ने आसियान को क्षेत्रीय व्यवस्था के केंद्र में रखने और सुरक्षा के साथ आर्थिक, तकनीकी तथा मानवीय सहयोग को आगे बढ़ाने की प्रतिबद्धता भी दोहराई है।
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दक्षिण चीन सागर में बढ़ते तनाव के बीच भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया ने एक बार फिर स्वतंत्र, खुले और नियम आधारित हिंद-प्रशांत क्षेत्र के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई है। फिलीपींस की राजधानी मनीला में बुधवार को हुई क्वाड विदेश मंत्रियों की बैठक में चारों देशों ने संप्रभुता, क्षेत्रीय अखंडता और अंतरराष्ट्रीय कानून के सम्मान को क्षेत्रीय स्थिरता के लिए जरूरी बताया। बैठक आसियान से जुड़ी विदेश मंत्रियों की बैठकों के दौरान हुई। इसमें भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर, अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो, जापान के विदेश मंत्री तोशिमित्सु मोतेगी और ऑस्ट्रेलिया की विदेश मंत्री पेनी वोंग शामिल हुए। बैठक में चीन का सीधे नाम लेने से बचा गया, लेकिन दक्षिण और पूर्वी चीन सागर में हाल के घटनाक्रम के बीच चारों देशों के संदेश को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। जापान के विदेश मंत्रालय के मुताबिक बैठक करीब एक घंटे चली।
क्वाड देशों की यह बैठक ऐसे समय हुई है, जब दक्षिण चीन सागर एक बार फिर तनाव का बड़ा केंद्र बना हुआ है। फिलीपींस और चीन के बीच समुद्री क्षेत्रों को लेकर लंबे समय से विवाद चल रहा है और हाल में सेकेंड थॉमस शोल के पास दोनों देशों के कर्मियों के बीच नया टकराव सामने आया। फिलीपींस ने आरोप लगाया कि चीनी कोस्ट गार्ड के एक सदस्य ने उसके एक नाविक के सिर पर लकड़ी के डंडे से हमला किया और उसकी नाव को नुकसान पहुंचाया। चीन ने इन आरोपों को खारिज करते हुए फिलीपींस पर उकसावे वाली कार्रवाई का आरोप लगाया। दोनों पक्षों के अलग-अलग दावों के बीच इस घटना ने क्षेत्र में पहले से मौजूद तनाव को और बढ़ा दिया है।
मनीला की बैठक में चारों विदेश मंत्रियों ने हिंद-प्रशांत क्षेत्र की मौजूदा परिस्थितियों पर विस्तार से चर्चा की। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने कहा कि क्वाड देशों ने बदलते क्षेत्रीय परिदृश्य की समीक्षा की और पिछली विदेश मंत्री स्तरीय बैठक में लिए गए फैसलों की प्रगति को भी देखा। भारत ने स्वतंत्र, खुला, समावेशी और समृद्ध हिंद-प्रशांत क्षेत्र के अपने पुराने रुख को फिर दोहराया। इसके साथ ही आसियान की केंद्रीय भूमिका पर जोर दिया गया। क्वाड लंबे समय से कहता रहा है कि क्षेत्रीय व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए जिसमें किसी भी देश की संप्रभुता और स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता का सम्मान हो।
बैठक का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा नियम आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था पर दिया गया जोर रहा। क्वाड देशों ने संकेत दिया कि समुद्री सीमाओं से जुड़े विवादों का समाधान अंतरराष्ट्रीय कानून और शांतिपूर्ण तरीकों के तहत होना चाहिए। हिंद-प्रशांत दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री व्यापार मार्गों वाला क्षेत्र है। यहां किसी भी तरह का बड़ा सैन्य या राजनीतिक तनाव केवल आसपास के देशों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वैश्विक व्यापार, ऊर्जा आपूर्ति और आपूर्ति श्रृंखला पर भी उसका असर पड़ सकता है। इसी वजह से समुद्री सुरक्षा और नौवहन की स्वतंत्रता क्वाड के एजेंडे में लगातार प्रमुख मुद्दे बने हुए हैं।
अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने भी संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता को लेकर चारों देशों के साझा रुख पर जोर दिया। अमेरिका हिंद-प्रशांत में क्वाड को अपनी महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदारियों में शामिल करता है। मनीला में रुबियो की मौजूदगी इसलिए भी अहम रही क्योंकि उन्होंने इसी दौरान चीन के विदेश मंत्री वांग यी से भी मुलाकात की। दोनों नेताओं के बीच करीब 90 मिनट बातचीत हुई, जिसमें अमेरिका-चीन संबंधों के साथ ताइवान और दक्षिण चीन सागर जैसे संवेदनशील मुद्दों की पृष्ठभूमि भी रही। रुबियो ने चीन के साथ मतभेदों के बावजूद संवाद बनाए रखने की जरूरत बताई।
क्वाड की बैठक में चीन का नाम सीधे तौर पर प्रमुखता से नहीं लिया गया, लेकिन संप्रभुता, क्षेत्रीय अखंडता, अंतरराष्ट्रीय कानून और समुद्री स्थिरता जैसे शब्दों पर जोर को बीजिंग की बढ़ती समुद्री गतिविधियों की पृष्ठभूमि में देखा जा रहा है। चीन दक्षिण चीन सागर के बड़े हिस्से पर अपना दावा करता है। दूसरी ओर फिलीपींस, वियतनाम, मलेशिया, ब्रुनेई और ताइवान के भी अलग-अलग क्षेत्रों पर दावे हैं। इन्हीं परस्पर दावों के कारण यह इलाका लंबे समय से एशिया के सबसे संवेदनशील समुद्री क्षेत्रों में शामिल है।
ताजा विवाद सेकेंड थॉमस शोल के आसपास हुआ है, जिसे फिलीपींस अयुंगिन शोल और चीन रेनआई जियाओ कहता है। यहां फिलीपींस ने वर्षों से अपनी मौजूदगी बनाए रखी है। इलाके में फिलीपींस के मिशनों और चीनी जहाजों के बीच पहले भी कई बार आमना-सामना हो चुका है। इस बार की घटना में दोनों देशों ने एक-दूसरे पर आक्रामक व्यवहार का आरोप लगाया। फिलीपींस का दावा है कि उसके एक नाविक को चोट पहुंची, जबकि चीन का कहना है कि फिलीपींस की ओर से पहले उकसावे की कार्रवाई की गई थी।
इस घटना का समय भी महत्वपूर्ण है। मनीला में आसियान से जुड़े उच्च स्तरीय राजनयिक कार्यक्रम चल रहे हैं और कई देशों के विदेश मंत्री फिलीपींस पहुंचे हैं। ऐसे माहौल में दक्षिण चीन सागर का तनाव स्वाभाविक रूप से बातचीत के केंद्र में आ गया। आसियान देश लंबे समय से चाहते हैं कि दक्षिण चीन सागर में ऐसी आचार संहिता बने जिससे टकराव की संभावना कम की जा सके। हालांकि इस दिशा में बातचीत वर्षों से चल रही है और कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर सहमति बनना अभी बाकी है।
भारत के लिए हिंद-प्रशांत केवल सुरक्षा का मुद्दा नहीं है। नई दिल्ली इसे व्यापार, समुद्री संपर्क, ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक साझेदारी से भी जोड़कर देखती है। भारत का बड़ा हिस्सा समुद्री व्यापार पर निर्भर है और दक्षिण चीन सागर से होकर दुनिया के महत्वपूर्ण व्यापारिक मार्ग गुजरते हैं। किसी भी तरह की अस्थिरता का असर माल ढुलाई, ऊर्जा कीमतों और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला पर पड़ सकता है। यही वजह है कि भारत लगातार नौवहन की स्वतंत्रता, अंतरराष्ट्रीय कानून के सम्मान और विवादों के शांतिपूर्ण समाधान की बात करता रहा है।
क्वाड के भीतर भारत की भूमिका भी पिछले कुछ वर्षों में व्यापक हुई है। यह समूह अब केवल समुद्री या सैन्य सुरक्षा की चर्चाओं तक सीमित नहीं है। महत्वपूर्ण खनिज, नई तकनीक, साइबर सुरक्षा, स्वास्थ्य, आपदा राहत, आपूर्ति श्रृंखला और समुद्री क्षेत्र की निगरानी जैसे विषय भी इसके एजेंडे में शामिल हो चुके हैं। चारों देशों की कोशिश है कि क्वाड को केवल किसी एक देश के खिलाफ बने सुरक्षा समूह के रूप में पेश न किया जाए, बल्कि हिंद-प्रशांत में व्यावहारिक सहयोग के मंच के रूप में आगे बढ़ाया जाए।
मनीला में जयशंकर और मार्को रुबियो के बीच अलग से द्विपक्षीय मुलाकात भी हुई। दोनों नेताओं ने व्यापार, शुल्क, ऊर्जा, रक्षा और क्षेत्रीय सुरक्षा जैसे विषयों पर बातचीत की। महत्वपूर्ण खनिजों और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के क्षेत्र में सहयोग भी चर्चा में रहा। इससे साफ है कि क्वाड के भीतर रणनीतिक सुरक्षा के साथ आर्थिक और तकनीकी साझेदारी भी तेजी से महत्वपूर्ण होती जा रही है। खासकर महत्वपूर्ण खनिजों की आपूर्ति को लेकर चारों देश वैकल्पिक और भरोसेमंद आपूर्ति श्रृंखला तैयार करने पर जोर दे रहे हैं।
क्वाड की रणनीति में आसियान का महत्व भी बार-बार सामने आया। दक्षिण-पूर्व एशिया हिंद-प्रशांत की भौगोलिक और आर्थिक संरचना के केंद्र में है। भारत सहित क्वाड के चारों सदस्य यह कहते रहे हैं कि क्षेत्र में बनने वाली किसी भी सुरक्षा या आर्थिक व्यवस्था में आसियान की केंद्रीय भूमिका बनी रहनी चाहिए। मनीला बैठक में भी इसी नीति को दोहराया गया। इसका राजनीतिक महत्व इसलिए है क्योंकि दक्षिण चीन सागर विवाद में आसियान के कई सदस्य सीधे तौर पर प्रभावित हैं।
फिलीपींस और अमेरिका के बीच रक्षा संधि भी मौजूदा तनाव को ज्यादा संवेदनशील बनाती है। वॉशिंगटन पहले कई बार कह चुका है कि दक्षिण चीन सागर में फिलीपींस के सार्वजनिक जहाजों, विमानों या सशस्त्र बलों पर हमला होने की स्थिति में दोनों देशों की पारस्परिक रक्षा संधि लागू हो सकती है। ताजा तनाव के बीच रुबियो ने भी फिलीपींस के प्रति अमेरिकी प्रतिबद्धता दोहराई है। इससे किसी स्थानीय समुद्री टकराव के बड़े रणनीतिक संकट में बदलने का खतरा हमेशा बना रहता है।
चीन दूसरी ओर क्वाड को संदेह की नजर से देखता रहा है और समय-समय पर ऐसे क्षेत्रीय समूहों की आलोचना करता आया है जिन्हें वह अपने खिलाफ रणनीतिक घेराबंदी से जोड़कर देखता है। क्वाड देश इस व्याख्या को स्वीकार नहीं करते। उनका कहना है कि समूह का उद्देश्य स्वतंत्र, खुला और स्थिर हिंद-प्रशांत सुनिश्चित करना है। इसी वजह से मनीला बैठक में भाषा को सावधानी से रखा गया और किसी देश का नाम लिए बिना नियमों, संप्रभुता और अंतरराष्ट्रीय कानून को केंद्र में रखा गया।
समुद्री सुरक्षा के अलावा मानवीय सहायता और प्राकृतिक आपदाओं के समय आपसी सहयोग भी क्वाड के काम का अहम हिस्सा है। हिंद-प्रशांत क्षेत्र चक्रवात, भूकंप, सुनामी और दूसरी प्राकृतिक आपदाओं के लिहाज से संवेदनशील है। चारों देश राहत सामग्री, आपातकालीन सहायता और तकनीकी संसाधनों को तेजी से उपलब्ध कराने के लिए आपसी तालमेल बढ़ाने पर काम कर रहे हैं। समुद्री क्षेत्र की जानकारी साझा करना भी महत्वपूर्ण क्षेत्र है, जिससे अवैध मछली पकड़ने और संदिग्ध समुद्री गतिविधियों की पहचान में मदद मिल सकती है।
क्वाड के सामने आर्थिक सुरक्षा भी अब बड़ी चुनौती बन रही है। सेमीकंडक्टर, दुर्लभ खनिज, बैटरी तकनीक और दूसरे महत्वपूर्ण संसाधनों की आपूर्ति कुछ चुनिंदा देशों पर अधिक निर्भर है। कोविड महामारी और बाद के भू-राजनीतिक संकटों ने दिखाया कि किसी एक क्षेत्र में संकट आने पर पूरी दुनिया की आपूर्ति व्यवस्था प्रभावित हो सकती है। इसी कारण भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया महत्वपूर्ण खनिजों और तकनीकी आपूर्ति श्रृंखला में सहयोग बढ़ाने की दिशा में काम कर रहे हैं।
मनीला की बैठक में चारों देशों का संदेश इस लिहाज से साफ रहा कि हिंद-प्रशांत में किसी भी विवाद का समाधान दबाव या एकतरफा कार्रवाई के बजाय नियमों और बातचीत के आधार पर होना चाहिए। दक्षिण चीन सागर में फिलीपींस और चीन के बीच ताजा टकराव ने इस संदेश को और महत्वपूर्ण बना दिया है। चीन का नाम सीधे लिए बिना संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता पर बार-बार जोर देना मौजूदा क्षेत्रीय परिस्थितियों से जुड़ा दिखाई देता है। वहीं क्वाड ने आसियान को क्षेत्रीय व्यवस्था के केंद्र में रखने और सुरक्षा के साथ आर्थिक, तकनीकी तथा मानवीय सहयोग को आगे बढ़ाने की प्रतिबद्धता भी दोहराई है।
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