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श्री बरसाना धाम का कीर्ति मंदिर क्यों है पूरी दुनिया में निराला? जानिए इसकी आध्यात्मिक और स्थापत्य विशेषताएँ
डिजिटल डेस्क
राधा रानी के बाल स्वरूप, अद्वितीय वास्तुकला और गहन भावात्मक दर्शन के कारण कीर्ति मंदिर बना वैश्विक आस्था का केंद्र
श्री बरसाना धाम सचमुच दिल को सुकून देने वाली जगह है। यह वही पावन भूमि है जहाँ श्री राधा ने अवतरा लिया था। यहाँ पहुँचते ही ऐसा महसूस होता है मानो हवा में ही राधा नाम की मधुर गूँज घुली हुई हो। चारों ओर फैले हरे भरे खेत, शांत वातावरण, मिट्टी की हल्की सुगंध और ठंडी बहती हवा, सब मिलकर मन को गहरी शांति से भर देते हैं।
बरसाना का प्राकृतिक सौंदर्य इतना प्यारा है कि यहाँ कदम रखते ही भीतर एक अनोखी दिव्य ऊर्जा का संचार होने लगता है। हर मोड़ पर श्री राधा रानी का नाम सुनाई देता है और हर बातचीत में लाड़ली जू का ज़िक्र आता है। यदि आप मन की शांति और राधा कृष्ण भक्ति का अनुभव चाहते हैं, तो बरसाना धाम अवश्य जाएँ।
राधा रानी के दुर्लभ दर्शन
बरसाना के इसी पावन क्षेत्र में स्थित है कीर्ति मंदिर, जो श्री राधा रानी की माता कीर्ति मैया के नाम पर इस युग के पंचम मूल जगद्गुरु, जगद्गुरूत्तम श्री कृपालु जी महाराज द्वारा स्थापित किया गया है। यह मंदिर अपने भाव और निर्माण दोनों में दुनिया भर में अनूठा है और हर यात्री के लिए अवश्य अनुभव करने योग्य स्थान है।
कीर्ति मंदिर की सबसे विशेष बात यह है कि यहाँ श्री राधा रानी लगभग पाँच वर्ष के बाल स्वरूप में अपनी माता कीर्ति मैया की गोद में विराजमान हैं, जो पूरे विश्व में और कहीं देखने को नहीं मिलता। यह दर्शन इतना मनोहारी और वात्सल्य से भरा होता है कि लगता है जैसे भक्त स्वयं राधा रानी के बाल स्वरूप से साक्षात् मिल रहे हों।
शिल्पकला और वास्तुकला की भव्यता
कीर्ति मंदिर भारतीय शिल्पकला का अद्वितीय उदाहरण है। गुलाबी बलुआ पत्थर की महीन नक्काशी, सफेद मार्बल का चमकदार फर्श और दीवारों पर की गई रंग बिरंगी पच्चीकारी मिलकर मंदिर को भव्य एवं दिव्य रूप प्रदान करते हैं। आश्चर्य की बात है कि पूरा मंदिर बिना सीमेंट और लोहे के केवल पारंपरिक भारतीय तकनीकों से बनाया गया है।कीर्ति मंदिर के निर्माण में लगभग बारह वर्ष लगे और पाँच सौ से अधिक कारीगरों ने दिन रात इसके लिए मेहनत की। यहाँ का हर पत्थर एक कहानी कहता है और हर दीवार भक्ति के भाव से भरी प्रतीत होती है।
मंदिर की बाहरी परिधि में बने छत्तीस आकर्षक स्तंभ वर्ष के बारह महीने और दिन के चौबीस घंटे का प्रतीक हैं। यह मानो संकेत देते हैं कि जीवन का हर क्षण राधा कृष्ण के स्मरण में बीतना चाहिए। स्तंभों पर उकेरी गई अष्टमहासखियों की मूर्तियाँ इतनी जीवंत हैं कि लगता है जैसे वे अभी मुस्कुरा देंगी।
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