छत्तीसगढ़ में मिड-डे मील रसोइयों का 22 दिन से आंदोलन: 66 रुपये दिहाड़ी बढ़ाकर 400 करने की मांग पर अड़े कर्मचारी

रायपुर (छ.ग.)

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राजधानी रायपुर में हजारों रसोइए धरने पर, अधिकतर महिलाएं; सरकार से कलेक्टर दर पर भुगतान की मांग

रायपुर। छत्तीसगढ़ के सरकारी स्कूलों में मध्यान्ह भोजन योजना से जुड़े रसोइयों का आंदोलन 22वें दिन में प्रवेश कर गया है। रोजाना 66 रुपये की मजदूरी को बढ़ाकर 400 रुपये प्रतिदिन करने की मांग को लेकर हजारों रसोइए राजधानी रायपुर में लगातार प्रदर्शन कर रहे हैं। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि महंगाई के इस दौर में मौजूदा भुगतान से परिवार का गुजारा संभव नहीं है।

राज्यभर के जिलों से आए रसोइए 29 दिसंबर से अनिश्चितकालीन हड़ताल पर हैं। इनमें बड़ी संख्या में महिलाएं शामिल हैं, जो ग्रामीण और आदिवासी इलाकों से आती हैं। रसोइयों का दावा है कि हड़ताल के चलते कई सरकारी स्कूलों में मध्यान्ह भोजन व्यवस्था प्रभावित हुई है, लेकिन सरकार की ओर से अब तक कोई ठोस आश्वासन नहीं मिला है।

आंदोलन में शामिल कांकेर जिले की रसोइया सविता मानिकपुरी बताती हैं कि उन्होंने 2011 में इस योजना में काम शुरू किया था। उस समय उन्हें मासिक मानदेय के रूप में एक हजार रुपये मिलते थे, जिसे बाद में बढ़ाकर दो हजार किया गया। उनका कहना है कि इतने वर्षों बाद भी मेहनत के अनुपात में मजदूरी नहीं बढ़ी। “हम बच्चों के लिए खाना बनाते हैं, लेकिन अपने बच्चों की पढ़ाई और घर का खर्च उठाना मुश्किल हो रहा है,” उन्होंने कहा।

रसोइया संघ के सचिव मेघराज बघेल के अनुसार, छत्तीसगढ़ में करीब 87 हजार रसोइए मध्यान्ह भोजन योजना से जुड़े हैं। हर दिन छह से सात हजार रसोइए आंदोलन स्थल पर मौजूद रहते हैं, जबकि अन्य लोग बारी-बारी से जिलों से आकर प्रदर्शन में शामिल होते हैं। बघेल ने बताया कि योजना की शुरुआत में मजदूरी 15 रुपये प्रतिदिन थी, जो तीन दशक बाद भी केवल 66 रुपये तक पहुंच पाई है।

संघ का कहना है कि उनकी मांग सीधी और स्पष्ट है—उन्हें कलेक्टर दर के अनुसार भुगतान किया जाए, जो वर्तमान में लगभग 440 रुपये प्रतिदिन है। रसोइयों का तर्क है कि दूसरे राज्यों में इसी काम के लिए कहीं अधिक भुगतान किया जा रहा है, जबकि छत्तीसगढ़ में उन्हें साल में केवल 10 महीने का मानदेय मिलता है।

प्रदर्शनकारी रसोइयों ने यह भी आरोप लगाया कि उनकी नौकरी अस्थायी है और सामाजिक सुरक्षा का कोई प्रावधान नहीं है। कई महिलाओं ने स्वास्थ्य समस्याओं का मुद्दा भी उठाया। उनका कहना है कि ग्रामीण इलाकों में गैस सुविधा न होने के कारण लकड़ी के चूल्हे पर खाना बनाना पड़ता है, जिससे धुएं के कारण बीमारियां बढ़ रही हैं।

रसोइयों ने साफ किया है कि जब तक सरकार उनकी मांगों पर गंभीरता से विचार नहीं करती, आंदोलन जारी रहेगा। फिलहाल राज्य सरकार की ओर से कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है।

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20 Jan 2026 By Nitin Trivedi

छत्तीसगढ़ में मिड-डे मील रसोइयों का 22 दिन से आंदोलन: 66 रुपये दिहाड़ी बढ़ाकर 400 करने की मांग पर अड़े कर्मचारी

रायपुर (छ.ग.)

रायपुर। छत्तीसगढ़ के सरकारी स्कूलों में मध्यान्ह भोजन योजना से जुड़े रसोइयों का आंदोलन 22वें दिन में प्रवेश कर गया है। रोजाना 66 रुपये की मजदूरी को बढ़ाकर 400 रुपये प्रतिदिन करने की मांग को लेकर हजारों रसोइए राजधानी रायपुर में लगातार प्रदर्शन कर रहे हैं। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि महंगाई के इस दौर में मौजूदा भुगतान से परिवार का गुजारा संभव नहीं है।

राज्यभर के जिलों से आए रसोइए 29 दिसंबर से अनिश्चितकालीन हड़ताल पर हैं। इनमें बड़ी संख्या में महिलाएं शामिल हैं, जो ग्रामीण और आदिवासी इलाकों से आती हैं। रसोइयों का दावा है कि हड़ताल के चलते कई सरकारी स्कूलों में मध्यान्ह भोजन व्यवस्था प्रभावित हुई है, लेकिन सरकार की ओर से अब तक कोई ठोस आश्वासन नहीं मिला है।

आंदोलन में शामिल कांकेर जिले की रसोइया सविता मानिकपुरी बताती हैं कि उन्होंने 2011 में इस योजना में काम शुरू किया था। उस समय उन्हें मासिक मानदेय के रूप में एक हजार रुपये मिलते थे, जिसे बाद में बढ़ाकर दो हजार किया गया। उनका कहना है कि इतने वर्षों बाद भी मेहनत के अनुपात में मजदूरी नहीं बढ़ी। “हम बच्चों के लिए खाना बनाते हैं, लेकिन अपने बच्चों की पढ़ाई और घर का खर्च उठाना मुश्किल हो रहा है,” उन्होंने कहा।

रसोइया संघ के सचिव मेघराज बघेल के अनुसार, छत्तीसगढ़ में करीब 87 हजार रसोइए मध्यान्ह भोजन योजना से जुड़े हैं। हर दिन छह से सात हजार रसोइए आंदोलन स्थल पर मौजूद रहते हैं, जबकि अन्य लोग बारी-बारी से जिलों से आकर प्रदर्शन में शामिल होते हैं। बघेल ने बताया कि योजना की शुरुआत में मजदूरी 15 रुपये प्रतिदिन थी, जो तीन दशक बाद भी केवल 66 रुपये तक पहुंच पाई है।

संघ का कहना है कि उनकी मांग सीधी और स्पष्ट है—उन्हें कलेक्टर दर के अनुसार भुगतान किया जाए, जो वर्तमान में लगभग 440 रुपये प्रतिदिन है। रसोइयों का तर्क है कि दूसरे राज्यों में इसी काम के लिए कहीं अधिक भुगतान किया जा रहा है, जबकि छत्तीसगढ़ में उन्हें साल में केवल 10 महीने का मानदेय मिलता है।

प्रदर्शनकारी रसोइयों ने यह भी आरोप लगाया कि उनकी नौकरी अस्थायी है और सामाजिक सुरक्षा का कोई प्रावधान नहीं है। कई महिलाओं ने स्वास्थ्य समस्याओं का मुद्दा भी उठाया। उनका कहना है कि ग्रामीण इलाकों में गैस सुविधा न होने के कारण लकड़ी के चूल्हे पर खाना बनाना पड़ता है, जिससे धुएं के कारण बीमारियां बढ़ रही हैं।

रसोइयों ने साफ किया है कि जब तक सरकार उनकी मांगों पर गंभीरता से विचार नहीं करती, आंदोलन जारी रहेगा। फिलहाल राज्य सरकार की ओर से कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है।

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