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पूर्व महापौर–पुलिस आरक्षक विवाद की जांच STF को सौंपी
जबलपुर (म.प्र.)
हाईकोर्ट का सख्त रुख: अगली सुनवाई में सीलबंद लिफाफे में पेश होगी जांच रिपोर्ट
सितंबर 2025 में वाहन चेकिंग के दौरान पूर्व महापौर और एक पुलिस आरक्षक के बीच हुए विवाद को लेकर मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने एक बार फिर सख्त रुख अपनाया है। मंगलवार को हुई सुनवाई में चीफ जस्टिस की पीठ ने मामले की जांच राज्य स्तरीय विशेष कार्यबल (STF) को सौंपने के निर्देश दिए। अदालत ने स्पष्ट किया कि आगामी सुनवाई, जो 17 फरवरी को निर्धारित है, उसमें जांच रिपोर्ट सीलबंद लिफाफे में प्रस्तुत की जाए।
पुलिस जांच पर अदालत की नाराजगी
यह मामला उस समय सामने आया था, जब जबलपुर के लार्डगंज थाना क्षेत्र में वाहन चेकिंग के दौरान बिना हेलमेट वाहन चला रहे पूर्व महापौर को एक आरक्षक ने रोका था। याचिका के अनुसार, पहचान उजागर होने के बाद विवाद बढ़ गया और मौके पर समर्थकों की भीड़ इकट्ठा हो गई। घटना से जुड़े वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुए, जिनमें पुलिस आरक्षक की वर्दी के साथ अभद्रता के दृश्य दिखाई दिए।
मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने स्थानीय पुलिस की कार्यप्रणाली पर असंतोष जताया। कोर्ट ने कहा कि दोनों पक्षों की ओर से दर्ज मामलों में निष्पक्षता का अभाव दिखता है और मेडिकल रिपोर्ट भी जांच की गुणवत्ता पर सवाल खड़े करती है।
जनहित याचिका में लगाए गए आरोप
जबलपुर निवासी अधिवक्ता मोहित वर्मा ने जनहित याचिका दायर कर आरोप लगाया कि वीडियो साक्ष्य सामने होने के बावजूद पूर्व महापौर और उनके समर्थकों के खिलाफ राजनीतिक दबाव के कारण नामजद कार्रवाई नहीं की गई। याचिका में यह भी कहा गया कि ड्यूटी पर तैनात पुलिसकर्मी के बजाय उसी पर कार्रवाई कर उसे निलंबित किया गया, जबकि घटना में शामिल अन्य लोगों की पहचान स्पष्ट थी।
STF को जांच सौंपने का आदेश
हाईकोर्ट ने लार्डगंज थाने में दर्ज अपराध क्रमांक 525/2025 और 526/2025 की जांच तत्काल प्रभाव से STF जबलपुर को सौंप दी है। अदालत का मानना है कि जब स्थानीय पुलिस पर पहले से पक्षपात और दबाव के आरोप हों, तो उसी एजेंसी से निष्पक्ष जांच की उम्मीद नहीं की जा सकती।
STF को निर्देश दिए गए हैं कि वह वीडियो फुटेज, मेडिकल रिपोर्ट, केस डायरी और प्रत्यक्षदर्शियों के बयानों के आधार पर स्वतंत्र जांच करे।
पहले भी दे चुका है कोर्ट कड़ा संदेश
इससे पहले की सुनवाई में हाईकोर्ट ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा था कि यदि पुलिसकर्मी ही सुरक्षित नहीं हैं, तो आम नागरिकों की सुरक्षा की कल्पना कैसे की जा सकती है। कोर्ट ने लार्डगंज थाना प्रभारी को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर एफआईआर और केस डायरी पेश करने के निर्देश दिए थे, साथ ही पूर्व महापौर और पुलिस अधीक्षक को नोटिस जारी कर जवाब मांगा गया था।
अदालत ने साफ किया है कि अगली सुनवाई में STF की रिपोर्ट के आधार पर आगे की कार्रवाई तय की जाएगी। इस फैसले को प्रदेश में पुलिस–राजनीतिक हस्तक्षेप से जुड़े मामलों में एक अहम कदम माना जा रहा है।
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