छत्तीसगढ़ में SIR प्रक्रिया को लेकर राहत संभव: दावा-आपत्ति की समय-सीमा बढ़ाने का प्रस्ताव केंद्र को भेजा

छत्तीसगढ़

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लाखों लंबित मामलों और नो-मैपिंग मतदाताओं के चलते निर्वाचन आयोग का कदम, मंजूरी के बाद होगी घोषणा

छत्तीसगढ़ में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision–SIR) को लेकर दावा-आपत्ति की समय-सीमा बढ़ाई जा सकती है। राज्य निर्वाचन आयोग ने इस संबंध में केंद्रीय निर्वाचन आयोग को प्रस्ताव भेज दिया है। अब केंद्र से मंजूरी मिलने के बाद इस पर औपचारिक घोषणा होने की संभावना है। यह फैसला राज्य में बड़ी संख्या में लंबित सत्यापन मामलों और नोटिस पेंडिंग होने की स्थिति को देखते हुए किया गया है।

वर्तमान में SIR प्रक्रिया के तहत दावा-आपत्ति दाखिल करने की अंतिम तारीख 22 जनवरी तय है। इसके बाद 22 जनवरी से 21 फरवरी तक विशेष सत्यापन अभियान प्रस्तावित है, जिसमें नए आवेदन स्वीकार नहीं किए जाएंगे। केवल पहले से दाखिल दावों और आपत्तियों की ही जांच की जानी है। हालांकि, मौजूदा हालात को देखते हुए निर्वाचन आयोग इस समय-सीमा में एक सप्ताह की बढ़ोतरी पर विचार कर रहा है।

लाखों मामलों में सत्यापन अधूरा
निर्वाचन आयोग के ताजा आंकड़ों के अनुसार, राज्यभर में लाखों मतदाताओं से जुड़े मामलों में अब तक अंतिम निर्णय नहीं हो पाया है। करीब 6.40 लाख मतदाताओं को ‘नो-मैपिंग’ की श्रेणी में रखा गया है। इसका मतलब है कि बूथ लेवल ऑफिसर (BLO) इन मतदाताओं तक सत्यापन के दौरान नहीं पहुंच पाए। कई मामलों में पते पर ताला लगा होना, पता गलत होना या लंबे समय से निवास न करना इसकी प्रमुख वजह बताई जा रही है।

इन सभी मतदाताओं को नोटिस जारी किए जा चुके हैं। नोटिस मिलने के बाद संबंधित मतदाता को एसडीएम के समक्ष उपस्थित होकर 13 मान्य दस्तावेजों में से कोई एक दस्तावेज प्रस्तुत करना अनिवार्य है। दस्तावेजों की जांच के बाद ही निर्वाचन रजिस्ट्रीकरण अधिकारी (ERO) यह तय करेंगे कि नाम मतदाता सूची में बना रहेगा या नहीं। यदि कोई मतदाता ईआरओ के निर्णय से असंतुष्ट होता है, तो उसे जिला कलेक्टर के पास अपील करने का अधिकार भी दिया गया है।

2003 की सूची बनी आधार
मौजूदा SIR प्रक्रिया में वर्ष 2003 की मतदाता सूची को आधार माना गया है। सत्यापन के दौरान यह देखा जा रहा है कि संबंधित मतदाता का नाम उस सूची में दर्ज था या नहीं। जिन मतदाताओं के नाम 2003 की सूची में नहीं मिल रहे हैं, उनसे रिश्तेदारों के नाम और अन्य संदर्भ मांगे जा रहे हैं। जिन मामलों में यह जानकारी भी उपलब्ध नहीं हो पा रही है, उन्हें ‘सी कैटेगरी’ में रखकर अलग से नोटिस जारी किए गए हैं।

निर्वाचन अधिकारियों का मानना है कि दस्तावेज जुटाने की प्रक्रिया कई मतदाताओं के लिए चुनौतीपूर्ण साबित हो रही है। यही कारण है कि समय-सीमा बढ़ाने की जरूरत महसूस की गई है।

सियासी हलचल भी तेज
SIR प्रक्रिया के दौरान नाम जोड़ने और हटाने को लेकर राजनीतिक हलचल भी बढ़ गई है। कांग्रेस ने दावा-आपत्ति की अवधि बढ़ाने की मांग को लेकर मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी से मुलाकात की है। पार्टी का आरोप है कि कई जगहों पर ईआरओ और बीएलओ स्तर पर फॉर्म स्वीकार नहीं किए जा रहे, जिससे योग्य मतदाताओं के नाम छूटने का खतरा है।

इन तमाम परिस्थितियों को देखते हुए राज्य निर्वाचन आयोग ने केंद्र को प्रस्ताव भेजा है। अब केंद्रीय निर्वाचन आयोग के निर्णय के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि दावा-आपत्ति की समय-सीमा औपचारिक रूप से बढ़ेगी या नहीं।

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21 Jan 2026 By ANKITA

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छत्तीसगढ़ में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision–SIR) को लेकर दावा-आपत्ति की समय-सीमा बढ़ाई जा सकती है। राज्य निर्वाचन आयोग ने इस संबंध में केंद्रीय निर्वाचन आयोग को प्रस्ताव भेज दिया है। अब केंद्र से मंजूरी मिलने के बाद इस पर औपचारिक घोषणा होने की संभावना है। यह फैसला राज्य में बड़ी संख्या में लंबित सत्यापन मामलों और नोटिस पेंडिंग होने की स्थिति को देखते हुए किया गया है।

वर्तमान में SIR प्रक्रिया के तहत दावा-आपत्ति दाखिल करने की अंतिम तारीख 22 जनवरी तय है। इसके बाद 22 जनवरी से 21 फरवरी तक विशेष सत्यापन अभियान प्रस्तावित है, जिसमें नए आवेदन स्वीकार नहीं किए जाएंगे। केवल पहले से दाखिल दावों और आपत्तियों की ही जांच की जानी है। हालांकि, मौजूदा हालात को देखते हुए निर्वाचन आयोग इस समय-सीमा में एक सप्ताह की बढ़ोतरी पर विचार कर रहा है।

लाखों मामलों में सत्यापन अधूरा
निर्वाचन आयोग के ताजा आंकड़ों के अनुसार, राज्यभर में लाखों मतदाताओं से जुड़े मामलों में अब तक अंतिम निर्णय नहीं हो पाया है। करीब 6.40 लाख मतदाताओं को ‘नो-मैपिंग’ की श्रेणी में रखा गया है। इसका मतलब है कि बूथ लेवल ऑफिसर (BLO) इन मतदाताओं तक सत्यापन के दौरान नहीं पहुंच पाए। कई मामलों में पते पर ताला लगा होना, पता गलत होना या लंबे समय से निवास न करना इसकी प्रमुख वजह बताई जा रही है।

इन सभी मतदाताओं को नोटिस जारी किए जा चुके हैं। नोटिस मिलने के बाद संबंधित मतदाता को एसडीएम के समक्ष उपस्थित होकर 13 मान्य दस्तावेजों में से कोई एक दस्तावेज प्रस्तुत करना अनिवार्य है। दस्तावेजों की जांच के बाद ही निर्वाचन रजिस्ट्रीकरण अधिकारी (ERO) यह तय करेंगे कि नाम मतदाता सूची में बना रहेगा या नहीं। यदि कोई मतदाता ईआरओ के निर्णय से असंतुष्ट होता है, तो उसे जिला कलेक्टर के पास अपील करने का अधिकार भी दिया गया है।

2003 की सूची बनी आधार
मौजूदा SIR प्रक्रिया में वर्ष 2003 की मतदाता सूची को आधार माना गया है। सत्यापन के दौरान यह देखा जा रहा है कि संबंधित मतदाता का नाम उस सूची में दर्ज था या नहीं। जिन मतदाताओं के नाम 2003 की सूची में नहीं मिल रहे हैं, उनसे रिश्तेदारों के नाम और अन्य संदर्भ मांगे जा रहे हैं। जिन मामलों में यह जानकारी भी उपलब्ध नहीं हो पा रही है, उन्हें ‘सी कैटेगरी’ में रखकर अलग से नोटिस जारी किए गए हैं।

निर्वाचन अधिकारियों का मानना है कि दस्तावेज जुटाने की प्रक्रिया कई मतदाताओं के लिए चुनौतीपूर्ण साबित हो रही है। यही कारण है कि समय-सीमा बढ़ाने की जरूरत महसूस की गई है।

सियासी हलचल भी तेज
SIR प्रक्रिया के दौरान नाम जोड़ने और हटाने को लेकर राजनीतिक हलचल भी बढ़ गई है। कांग्रेस ने दावा-आपत्ति की अवधि बढ़ाने की मांग को लेकर मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी से मुलाकात की है। पार्टी का आरोप है कि कई जगहों पर ईआरओ और बीएलओ स्तर पर फॉर्म स्वीकार नहीं किए जा रहे, जिससे योग्य मतदाताओं के नाम छूटने का खतरा है।

इन तमाम परिस्थितियों को देखते हुए राज्य निर्वाचन आयोग ने केंद्र को प्रस्ताव भेजा है। अब केंद्रीय निर्वाचन आयोग के निर्णय के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि दावा-आपत्ति की समय-सीमा औपचारिक रूप से बढ़ेगी या नहीं।

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