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‘तेरे इश्क में’ फिल्म रिव्यू: शानदार अभिनय, कमजोर कहानी, धनुष-कृति ने संभाला मोर्चा
digital desk
आनंद एल राय की नई रोमांटिक ड्रामा फिल्म ‘तेरे इश्क में’ में भावनात्मक सीन और शानदार अभिनय हैं, लेकिन कहानी और संगीत ‘रांझणा’ के स्तर तक नहीं पहुँचते।
आनंद एल राय की नई फिल्म ‘तेरे इश्क में’ बुधवार को सिनेमाघरों में रिलीज़ हुई। यह फिल्म गहरी प्रेम कहानी पर आधारित है, जिसमें प्यार, दर्द और भावनाओं का मिश्रण है। फिल्म का पहला हिस्सा दर्शकों को बांधने में सफल है, लेकिन दूसरा हिस्सा कमजोर और लंबा लगने के कारण अपेक्षित प्रभाव नहीं डाल पाता।
कहानी क्या है?
फिल्म की शुरुआत शंकर गुरुक्कल (धनुष) से होती है, जो कॉलेज का गुस्सैल और अनियंत्रित छात्र नेता है। दूसरी ओर मुक्ति बेनीवाल (कृति सैनन) एक समझदार शोध छात्रा हैं। एक घटना के बाद उनकी राहें टकराती हैं और मुक्ति शंकर को बदलने का फैसला करती है। धीरे-धीरे शंकर में बदलाव आता है और वह मुक्ति से प्यार करने लगता है, लेकिन यह परिवर्तन मुक्ति की पढ़ाई का हिस्सा था, उसके दिल का नहीं। सात साल बाद दोनों की मुलाकात होती है, लेकिन अब प्रेम नहीं, बल्कि अधूरे घाव और विश्वासघात का सामना करना पड़ता है।
अभिनय और तकनीकी पहलू
फिल्म का सबसे मजबूत पक्ष अभिनय है। धनुष ने शंकर के गुस्से, टूटन और भावनात्मक उतार-चढ़ाव को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया है। कृति सैनन ने मुक्ति के किरदार में नाजुकता और मजबूती दोनों को सहजता से दिखाया। सहायक कलाकारों में प्रकाश राज और प्रियांशु पैन्यूली ने भी अपना असर छोड़ा।
निर्देशन के मामले में फिल्म का पहला हिस्सा मजबूत है, जबकि दूसरा हिस्सा बिखरी कहानी और जरूरत से ज्यादा सिनेमाई घटनाओं के कारण कमजोर लगता है। कैमरा वर्क और प्रोडक्शन डिजाइन यथार्थपूर्ण हैं, लेकिन 169 मिनट की लंबाई और कुछ धीमे सीन फिल्म की गति को प्रभावित करते हैं।
रांझणा’ जैसी यादगारता नहीं
ए. आर. रहमान का संगीत फिल्म में सुंदर है, लेकिन ‘रांझणा’ जैसी यादगारता नहीं देता। “जिगर ठंडा” और “चिन्नावेरे” कुछ प्रभाव छोड़ते हैं, लेकिन टाइटल ट्रैक का सीमित इस्तेमाल और कुछ गानों की प्लेसमेंट कहानी की गति को धीमा कर देती है।
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कहानी क्या है?
फिल्म की शुरुआत शंकर गुरुक्कल (धनुष) से होती है, जो कॉलेज का गुस्सैल और अनियंत्रित छात्र नेता है। दूसरी ओर मुक्ति बेनीवाल (कृति सैनन) एक समझदार शोध छात्रा हैं। एक घटना के बाद उनकी राहें टकराती हैं और मुक्ति शंकर को बदलने का फैसला करती है। धीरे-धीरे शंकर में बदलाव आता है और वह मुक्ति से प्यार करने लगता है, लेकिन यह परिवर्तन मुक्ति की पढ़ाई का हिस्सा था, उसके दिल का नहीं। सात साल बाद दोनों की मुलाकात होती है, लेकिन अब प्रेम नहीं, बल्कि अधूरे घाव और विश्वासघात का सामना करना पड़ता है।
अभिनय और तकनीकी पहलू
फिल्म का सबसे मजबूत पक्ष अभिनय है। धनुष ने शंकर के गुस्से, टूटन और भावनात्मक उतार-चढ़ाव को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया है। कृति सैनन ने मुक्ति के किरदार में नाजुकता और मजबूती दोनों को सहजता से दिखाया। सहायक कलाकारों में प्रकाश राज और प्रियांशु पैन्यूली ने भी अपना असर छोड़ा।
निर्देशन के मामले में फिल्म का पहला हिस्सा मजबूत है, जबकि दूसरा हिस्सा बिखरी कहानी और जरूरत से ज्यादा सिनेमाई घटनाओं के कारण कमजोर लगता है। कैमरा वर्क और प्रोडक्शन डिजाइन यथार्थपूर्ण हैं, लेकिन 169 मिनट की लंबाई और कुछ धीमे सीन फिल्म की गति को प्रभावित करते हैं।
रांझणा’ जैसी यादगारता नहीं
ए. आर. रहमान का संगीत फिल्म में सुंदर है, लेकिन ‘रांझणा’ जैसी यादगारता नहीं देता। “जिगर ठंडा” और “चिन्नावेरे” कुछ प्रभाव छोड़ते हैं, लेकिन टाइटल ट्रैक का सीमित इस्तेमाल और कुछ गानों की प्लेसमेंट कहानी की गति को धीमा कर देती है।
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