डॉक्टर क्यों पहनते हैं सफेद कोट? जानिए इसके पीछे का वैज्ञानिक और ऐतिहासिक कारण

Lifestyle

डॉक्टरों को अक्सर सफेद लंबा कोट पहने देखा जाता है। यह केवल एक ड्रेस कोड नहीं, बल्कि चिकित्सा पेशे की गरिमा, जिम्मेदारी और विश्वास का प्रतीक भी है। 1 जुलाई को राष्ट्रीय चिकित्सक दिवस (Doctors' Day) के अवसर पर आइए जानते हैं कि डॉक्टर सफेद कोट क्यों पहनते हैं और इसके पीछे की सोच क्या है।

डॉक्टरों की पहचान क्यों बना सफेद कोट?

सफेद कोट, जिसे 'लैब कोट' भी कहा जाता है, न केवल डॉक्टरों को पहचानने में मदद करता है, बल्कि यह स्वच्छता, विश्वास और वैज्ञानिक सोच का प्रतीक भी है। यह मरीजों को यह भरोसा देता है कि सामने खड़ा व्यक्ति योग्य, प्रशिक्षित और जिम्मेदार है।

'वाइट कोट सेरेमनी' की परंपरा

डॉक्टर बनने की पढ़ाई पूरी करने के बाद मेडिकल छात्र को औपचारिक रूप से सफेद कोट पहनाया जाता है। इसे वाइट कोट सेरेमनी कहा जाता है। इस परंपरा की शुरुआत अमेरिका के डॉ. अर्नोल्ड पी. गोल्ड ने की थी, जो यह मानते थे कि चिकित्सा एक पवित्र जिम्मेदारी है और सफेद कोट इसका प्रतीक बन सकता है।

पहले डॉक्टर काले कपड़े पहनते थे

19वीं सदी से पहले डॉक्टर काले कपड़े पहनते थे, क्योंकि उस समय चिकित्सा को गंभीर और अंतिम विकल्प के रूप में देखा जाता था। काला रंग गंभीरता और शोक का प्रतीक माना जाता था। लेकिन जैसे-जैसे चिकित्सा विज्ञान में विकास हुआ, डॉक्टरों की छवि भी बदलने लगी।

सफेद रंग का महत्व

सफेद रंग को हमेशा से शुद्धता, ईमानदारी और निस्वार्थ सेवा से जोड़ा गया है। यह रंग साफ-सफाई का भी प्रतीक है, जो चिकित्सा क्षेत्र में अत्यंत आवश्यक है। डॉक्टरों द्वारा सफेद कोट पहनना यह दर्शाता है कि वे अपने कार्य में पारदर्शिता और ईमानदारी बरतते हैं।

सभी डॉक्टर नहीं पहनते सफेद कोट

हालांकि अधिकांश डॉक्टर सफेद कोट पहनते हैं, लेकिन कुछ विशेषताएं ऐसी हैं जहां यह जरूरी नहीं समझा जाता। जैसे बाल रोग विशेषज्ञ या मनोचिकित्सक अक्सर सफेद कोट नहीं पहनते क्योंकि इससे छोटे बच्चों या मानसिक रोगियों में डर पैदा हो सकता है। इंग्लैंड और डेनमार्क जैसे देशों में भी यह बाध्यकारी नहीं है।

मेडिकल पेशे में पहचान और सम्मान का प्रतीक

20वीं सदी की शुरुआत में सफेद कोट चिकित्सा पेशे की गरिमा का प्रतीक बन गया। यह न केवल मरीजों के विश्वास को मजबूत करता है, बल्कि डॉक्टरों को भी अपने कर्तव्यों की याद दिलाता है कि वे विज्ञान और सेवा दोनों के प्रतिनिधि हैं।

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01 Jul 2025 By दैनिक जागरण

डॉक्टर क्यों पहनते हैं सफेद कोट? जानिए इसके पीछे का वैज्ञानिक और ऐतिहासिक कारण

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डॉक्टरों की पहचान क्यों बना सफेद कोट?

सफेद कोट, जिसे 'लैब कोट' भी कहा जाता है, न केवल डॉक्टरों को पहचानने में मदद करता है, बल्कि यह स्वच्छता, विश्वास और वैज्ञानिक सोच का प्रतीक भी है। यह मरीजों को यह भरोसा देता है कि सामने खड़ा व्यक्ति योग्य, प्रशिक्षित और जिम्मेदार है।

'वाइट कोट सेरेमनी' की परंपरा

डॉक्टर बनने की पढ़ाई पूरी करने के बाद मेडिकल छात्र को औपचारिक रूप से सफेद कोट पहनाया जाता है। इसे वाइट कोट सेरेमनी कहा जाता है। इस परंपरा की शुरुआत अमेरिका के डॉ. अर्नोल्ड पी. गोल्ड ने की थी, जो यह मानते थे कि चिकित्सा एक पवित्र जिम्मेदारी है और सफेद कोट इसका प्रतीक बन सकता है।

पहले डॉक्टर काले कपड़े पहनते थे

19वीं सदी से पहले डॉक्टर काले कपड़े पहनते थे, क्योंकि उस समय चिकित्सा को गंभीर और अंतिम विकल्प के रूप में देखा जाता था। काला रंग गंभीरता और शोक का प्रतीक माना जाता था। लेकिन जैसे-जैसे चिकित्सा विज्ञान में विकास हुआ, डॉक्टरों की छवि भी बदलने लगी।

सफेद रंग का महत्व

सफेद रंग को हमेशा से शुद्धता, ईमानदारी और निस्वार्थ सेवा से जोड़ा गया है। यह रंग साफ-सफाई का भी प्रतीक है, जो चिकित्सा क्षेत्र में अत्यंत आवश्यक है। डॉक्टरों द्वारा सफेद कोट पहनना यह दर्शाता है कि वे अपने कार्य में पारदर्शिता और ईमानदारी बरतते हैं।

सभी डॉक्टर नहीं पहनते सफेद कोट

हालांकि अधिकांश डॉक्टर सफेद कोट पहनते हैं, लेकिन कुछ विशेषताएं ऐसी हैं जहां यह जरूरी नहीं समझा जाता। जैसे बाल रोग विशेषज्ञ या मनोचिकित्सक अक्सर सफेद कोट नहीं पहनते क्योंकि इससे छोटे बच्चों या मानसिक रोगियों में डर पैदा हो सकता है। इंग्लैंड और डेनमार्क जैसे देशों में भी यह बाध्यकारी नहीं है।

मेडिकल पेशे में पहचान और सम्मान का प्रतीक

20वीं सदी की शुरुआत में सफेद कोट चिकित्सा पेशे की गरिमा का प्रतीक बन गया। यह न केवल मरीजों के विश्वास को मजबूत करता है, बल्कि डॉक्टरों को भी अपने कर्तव्यों की याद दिलाता है कि वे विज्ञान और सेवा दोनों के प्रतिनिधि हैं।

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