विदेशों का ड्रैगन फ्रूट अब रीवा में: शिवपाल सिंह के खेत बने आकर्षण का केंद्र

Special News

कभी सिर्फ विदेशों में पहचाने जाने वाला ड्रैगन फ्रूट अब मध्यप्रदेश के रीवा जिले में अपनी जड़ें जमाने लगा है।

यह फल आज रीवा से लगभग 50 किलोमीटर दूर बसेड़ा गांव में लहलहा रहा है, और उसकी खेती करने वाले किसान शिवपाल सिंह लोगों के आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं। लगभग 600 पौधों वाला यह खेत न केवल पारम्परिक खेती छोड़ने का एक सफल उदाहरण है, बल्कि यह यह बताने में भी सहायक है कि अगर तकनीक और मेहनत का मेल बैठ जाए तो किस्मत बदलने में देर नहीं लगती।

विदेशी फल, मिट्टी रीवा की

ड्रैगन फ्रूट मूलतः मध्य अमेरिका का फल है, जो अपनी सुंदर संरचना और पौष्टिकता के लिए विश्वभर में जाना जाता है। इसे गुजरात में ‘कमलम’ नाम से भी पहचाना जाता है, क्योंकि यह कमल के फूल जैसा आकर्षक दिखता है। यह फल अंदर से रसीला और गूदेदार होता है और इसके पोषण और औषधीय गुण इसे बाजार में विशेष स्थान दिलाते हैं।

चुनौतीपूर्ण राह में मिला मुकाम

किसान शिवपाल सिंह बताते हैं कि यह फल उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में पाया जाता है, इसलिए रीवा जैसे क्षेत्र में इसे उगाने का प्रयास चुनौतीपूर्ण रहा। लगभग 14–16 महीनों में पौधे फल देना शुरू कर देते हैं, और यह मिट्टी और मौसम के विशेष मेल से संभव हुआ है। शिवपाल सिंह ने इसके लिए करीब 7 लाख रुपये खर्च किए, जो अब अच्छा मुनाफा दे रहा है।

तकनीक का सहारा, मिट्टी का विशेष उपयोग

ड्रैगन फ्रूट में सबसे बड़ा खतरा फंगस है, जो फल को खराब कर सकती है। इससे बचने के लिए शिवपाल सिंह ने चीन से विशेष मिट्टी मंगवाई और उसमें चूने का उपयोग किया, जिससे मिट्टी का तापमान नियंत्रण में रहता है और पौधों को सूखने से बचाया जाता है। इसके अलावा मिट्टी का भुरभुरा होना बेहद जरूरी है। अगर मिट्टी सख्त हो तो इसे विशेष तकनीक से तैयार किया जाता है, क्योंकि यह पौधा जमीनी पानी या अधिक नमी सहन नहीं कर पाता। यह सुखे स्थानों में अच्छा उत्पादन देता है और गर्मियों में भी यह विशेष मिट्टी तापमान सहने में सहायक रहती है।

बाजार में ऊंचे दाम, किसानों के लिए वरदान

ड्रैगन फ्रूट का वजन औसतन 200 से 250 ग्राम तक होता है और यह बाजार में 100 से लेकर 200 रुपये प्रति फल तक बिकता है। शिवपाल सिंह की मेहनत से आज यह फल पूरे प्रदेश में लोकप्रिय हो गया है और कई जिलों से इसके लिए मांग आने लगी है। यह फल न केवल एक आकर्षक व्यावसायिक अवसर है, बल्कि उन किसानों के लिए प्रेरणा है जो पारम्परिक फसलों से आगे बढ़कर कुछ नया करने का सपना देखते हैं।

बसेंड़ा गांव का बदलता हुआ चेहरा

बसेंड़ा गांव में ड्रैगन फ्रूट की खेती से एक नई राह खुली है। अब गांव और जिले के दूसरे किसान भी इसे अपनाने का मन बनाने लगे हैं। यह फल आने वाले वर्षों में रीवा और आसपास के जिलों में एक प्रमुख व्यावसायिक फसल के तौर पर उभरने का दमखम रखता है।

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25 Jun 2025 By दैनिक जागरण

विदेशों का ड्रैगन फ्रूट अब रीवा में: शिवपाल सिंह के खेत बने आकर्षण का केंद्र

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यह फल आज रीवा से लगभग 50 किलोमीटर दूर बसेड़ा गांव में लहलहा रहा है, और उसकी खेती करने वाले किसान शिवपाल सिंह लोगों के आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं। लगभग 600 पौधों वाला यह खेत न केवल पारम्परिक खेती छोड़ने का एक सफल उदाहरण है, बल्कि यह यह बताने में भी सहायक है कि अगर तकनीक और मेहनत का मेल बैठ जाए तो किस्मत बदलने में देर नहीं लगती।

विदेशी फल, मिट्टी रीवा की

ड्रैगन फ्रूट मूलतः मध्य अमेरिका का फल है, जो अपनी सुंदर संरचना और पौष्टिकता के लिए विश्वभर में जाना जाता है। इसे गुजरात में ‘कमलम’ नाम से भी पहचाना जाता है, क्योंकि यह कमल के फूल जैसा आकर्षक दिखता है। यह फल अंदर से रसीला और गूदेदार होता है और इसके पोषण और औषधीय गुण इसे बाजार में विशेष स्थान दिलाते हैं।

चुनौतीपूर्ण राह में मिला मुकाम

किसान शिवपाल सिंह बताते हैं कि यह फल उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में पाया जाता है, इसलिए रीवा जैसे क्षेत्र में इसे उगाने का प्रयास चुनौतीपूर्ण रहा। लगभग 14–16 महीनों में पौधे फल देना शुरू कर देते हैं, और यह मिट्टी और मौसम के विशेष मेल से संभव हुआ है। शिवपाल सिंह ने इसके लिए करीब 7 लाख रुपये खर्च किए, जो अब अच्छा मुनाफा दे रहा है।

तकनीक का सहारा, मिट्टी का विशेष उपयोग

ड्रैगन फ्रूट में सबसे बड़ा खतरा फंगस है, जो फल को खराब कर सकती है। इससे बचने के लिए शिवपाल सिंह ने चीन से विशेष मिट्टी मंगवाई और उसमें चूने का उपयोग किया, जिससे मिट्टी का तापमान नियंत्रण में रहता है और पौधों को सूखने से बचाया जाता है। इसके अलावा मिट्टी का भुरभुरा होना बेहद जरूरी है। अगर मिट्टी सख्त हो तो इसे विशेष तकनीक से तैयार किया जाता है, क्योंकि यह पौधा जमीनी पानी या अधिक नमी सहन नहीं कर पाता। यह सुखे स्थानों में अच्छा उत्पादन देता है और गर्मियों में भी यह विशेष मिट्टी तापमान सहने में सहायक रहती है।

बाजार में ऊंचे दाम, किसानों के लिए वरदान

ड्रैगन फ्रूट का वजन औसतन 200 से 250 ग्राम तक होता है और यह बाजार में 100 से लेकर 200 रुपये प्रति फल तक बिकता है। शिवपाल सिंह की मेहनत से आज यह फल पूरे प्रदेश में लोकप्रिय हो गया है और कई जिलों से इसके लिए मांग आने लगी है। यह फल न केवल एक आकर्षक व्यावसायिक अवसर है, बल्कि उन किसानों के लिए प्रेरणा है जो पारम्परिक फसलों से आगे बढ़कर कुछ नया करने का सपना देखते हैं।

बसेंड़ा गांव का बदलता हुआ चेहरा

बसेंड़ा गांव में ड्रैगन फ्रूट की खेती से एक नई राह खुली है। अब गांव और जिले के दूसरे किसान भी इसे अपनाने का मन बनाने लगे हैं। यह फल आने वाले वर्षों में रीवा और आसपास के जिलों में एक प्रमुख व्यावसायिक फसल के तौर पर उभरने का दमखम रखता है।

https://www.dainikjagranmpcg.com/state/madhya-pradesh/dragon-fruit-abroad-now-becomes-the-center-of-attraction-of/article-25504

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